बजट 2018- 19

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बजट 2018- 19

सरकारी बजट के घटक

    भारत में प्रत्येक वित्तीय वर्ष ,सरकार की अनुमानित प्राप्तियों और व्ययों का विवरण संसद के समक्ष प्रस्तुत करना एक संवैधानिक अनिवार्यता है .इस वार्षिक वित्तीय विवरण से मुख्य बजट दस्तावेज बनता है .इसके अतिरिक्त बजट में राजस्व लेखा पर व्यय और अन्य प्रकार के व्यय में अवश्य ही अंतर होना चाहिए .अतः बजट दो प्रकार के होते है : (i) राजस्व बजट (ii) पूंजीगत बजट . जैसा की नीचे दिए गए चित्र में दिया गया है

राजस्व लेखा
राजस्व बजट में सरकार की चालू प्राप्तियां और उन प्राप्तियों से किए जाने वाले व्यय के विवरण को दर्शाया जाता है .
राजस्व प्राप्तियां – राजस्व प्राप्तियां सरकार की वह प्राप्तियां है जो गैर – प्रतिदेय हैं अर्थात इसे पाने के लिए सरकार से पुनः दावा नहीं किया जा सकता है.इसे कर और गैर कर राजस्व में विभक्त किया जाता है .

कर राजस्व में कर की प्राप्तियां और सरकार द्वारा लगाए गए अन्य शुल्क शामिल होते है .कर राजस्व जो की राजस्व प्राप्तियों का एक महत्वपूर्ण घटक है , में मुख्य रूप से प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष कर होते है.

  • प्रत्यक्ष कर- ऐसा कर जिसका बोझ प्रत्यक्ष रूप से व्यक्ति (व्यक्तिगत आयकर ) और फर्म (निगम कर ) पर पड़ता है . अन्य प्रत्यक्ष करों जैसे संपत्ति कर , उपहार कर और सम्पदा शुल्क आदि का राजस्व में होने वाली आय में कभी बहुत महत्व नहीं रहा है .इसीलिए इसे बहुधा ‘कागजी कर’ ही कहा जाता है .
  • बजट 2018-19 में प्रत्यक्ष कर घटते हुए क्रम में – निगम कर > आयकर > STT
  • अप्रत्यक्ष कर- ऐसा कर जो एक व्यक्ति पर लगे जाते है पर उनका भुगतान अन्य के द्वारा किया जाता है जैसे – उत्पाद शुल्क (देश के भीतर उत्पादित वस्तुओं पर लगाए गए शुल्क), सीमा शुल्क (भारत में आयत किए जाने वाली अथवा भारत में निर्यात की जाने वाली वस्तुओं पर लगाए गए कर ) और सेवा शुल्क शामिल होते है .
  • बजट 2018-19 में प्रत्यक्ष कर घटते हुए क्रम में – CGST > संघ उत्पाद शुल्क > सीमा शुल्क > जीएसटी मुआवजे सेस(GST compensation Cess)> आईजीएसटी

गैर – कर राजस्व
केंद्र सरकार के गैर – कर राजस्व के अन्तर्गत मुख्य रूप से आते है—

  • ब्याज प्राप्तियां – यह केंद्र सरकार के द्वारा राज्य सरकार एवं अन्य सरकारी संस्थान को दिए गए ऋण से प्राप्त ब्याज है . गैर कर राजस्व से सबसे ज्यादा आय राजस्व प्राप्ति से होता है .
  • सरकार के निवेश से प्राप्त लाभांश और लाभ – यह केंद्र सरकार के , सरकारी ,अर्धसरकारी एवं निजी कंपनियों में निवेश से प्राप्त आय है .जब अर्धसरकारी एवं निजी कंपनियों के शेयर से आय होता है तो इसे लाभांश (dividend)कहते है ,और जब सरकारी कंपनियों के शेयर से आय होता है तो इसे लाभ(profit) कहते है .
  • सरकार द्वारा प्रदान की गई सेवाओं से प्राप्त शुल्क .
  • नकद सहायता अनुदान -इसके अन्तर्गत विदेशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा प्रदान किए जाने वाले नकद सहायता अनुदान को शामिल किया जाता है .
  • राजस्व प्राप्ति के आकलन में वित्त विधेयक में किए गए कर प्रस्ताव के प्रभावों पर विचार किया जाता है .

राजस्व व्यय

    राजस्व व्यय केंद्र सरकार का भौतिक या वित्तीय परिसम्पतियों के सृजन के अतिरिक्त अन्य उद्देश्यों के लिए किया जाता है .राजस्व व्यय का सम्बन्ध सरकारी विभागों के सामान्य कार्यों तथा विविध सेवाओं ,सरकार द्वारा उपगत ऋण ब्याज अदायगी ,राज्य सरकारों और अन्य दलों से प्रदत्त अनुदान (यद्यपि कुछ अनुदानों से परिसम्पतियों का सृजन भी हो सकता है ) आदि पर किए गए व्यय होता है .
    बजटीय दस्तावेज में कुल राजस्व व्यय को योजनागत और गैर योजनागत मदों में बनता जाता है .

  • योजनागत राजस्व व्यय का सम्बन्ध केंद्रीय योजनाओं (पंचवर्षीय योजनाओं ) और राज्यों और संघ शासित प्रदेशों की योजना के लिए केंद्रीय सहायता है .
  • गैर योजनागत व्यय राजस्व व्यय.गैर योजनागत व्यय के मुख्य मदों में ब्याज अदायगी , प्रतिरक्षा सेवाएं ,उपदान ,वेतन और पेंशन आते है .
  • बाजार ऋणों , बाह्य ऋणों और विभिन्न आरक्षित निधियों पर ब्याज अदायगी गैर योजनागत राजस्व व्यय का एक सबसे बड़ा घटक होता है .
  • प्रतिरक्षा व्यय गैर योजनागत व्यय का दूसरा सबसे बड़ा घटक है और इस अर्थ में यह एक प्रतिबद्ध व्यय है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से सम्बंधित इस मद में अधिक कटौती का क्षेत्र अत्यल्प है .
  • उपदान एक महत्वपूर्ण नीतिगत उपकरण है ,जिसका उद्देश्य कल्याण में वृद्धि करना है . सार्वजनिक वस्तुओं और शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसी सेवाओं का अल्पमूल्यन के माध्यम अव्यक्त उपदान प्रदान करने के अतिरिक्त सरकार निर्यात , ऋण पर ब्याज , खाद्य पदार्थ और उर्वरक जैसे मदों पर व्यक्त रूप उपदान प्रदान करती है .

पूंजीगत लेखा

पूंजीगत बजट केंद्रीय सरकार की परिसंपत्तियों के साथ साथ दायित्वों से सम्बंधित राशियों का वह लेखा है , जो पूंजी में होने वाले परिवर्तनों का ध्यान रखता है . इसके अन्तर्गत सरकार की पूंजीगत प्राप्तियां एवं पूंजीगत व्यय शामिल होती है .यह सरकार की वित्तीय आवश्यकताओं तथा उनके वित्तीय प्रबंधन को दर्शाते हैं.
पूंजीगत प्राप्तियां –
सरकार की वे सभी प्राप्तियां जो दायित्वों का सृजन या वित्तीय परिसंपत्तियों को काम करती हैं पूंजीगत प्राप्तियां कहलाती हैं.
ऋण पूंजी प्राप्तियां – यह मुख्य रूप से उधार और अन्य देनदारियों को शामिल करता है।

    सार्वजनिक कर्ज – पूंजीगत प्राप्तियों की मुख्य मदें सार्वजनिक कर्ज हैं ,जिसे सरकार द्वारा जनता से लिए जाता हैं .इसे बाजार ऋण कहते हैं . इसके अन्तर्गत ट्रेजरी बिल की बिक्री के द्वारा रिज़र्व बैंक और व्यवसायिक बैंकों तथा अन्य वित्तीय संस्थानों से सरकार द्वारा ऋण ग्रहण ,विदेशी सरकारों तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों से प्राप्त कर्ज और केंद्र सरकार द्वारा प्रदत्त ऋणों की वसूली आदि शामिल हैं .

गैर-ऋण पूंजी प्राप्तियां – इसके अन्तर्गत लघु बचतें (डाकघर बचत खाता,राष्ट्रीय बचत प्रमाण पत्र आदि शामिल हैं ), भविष्य निधि और सार्वजनिक उपक्रम (पी. एस. यू.)के शेयरों की बिक्री से प्राप्त निवल प्राप्तियां शामिल हैं . इसे सार्वजनिक क्षेत्रक उपक्रम या विनिवेश कहा जाता हैं .
पूंजीगत व्यय

    ये सरकार के वे व्यय हैं जिसके परिणामस्वरूप भौतिक या वित्तीय परिसम्पतियों का सृजन या वित्तीय दायित्वों में कमीं होती हैं . पूंजीगत व्यय के अन्तर्गत भूमि अधिग्रहण , भवन निर्माण , मशीनरी , उपकरण शेयरों में निवेश और केंद्र सरकार के द्वारा राज्य सरकारों एवं संघ शासित प्रदेशों , सार्वजनिक उपक्रमों तथा अन्य पक्षों को प्रदान किए गए ऋण और अग्रिम संबंधी व्ययों को शामिल किया जाता हैं .पूंजीगत व्यय को भी बजट दस्तावेज में योजना और गैर योजनागत व्यय के रूप में वर्गीकृत किया जाता हैं .वित्त व्यय के अन्तर्गत योजना एवं गैर – योजना में अंतर स्थापित किया जाता हैं .इस वर्गीकरण के अनुसार ,योजनागत पूंजीगत व्यय का सम्बन्ध राजस्व व्यय के समान,केंद्रीय योजना और राज्य तथा संघ शासित प्रदेशों की योजनाओं के लिए केंद्रीय सहायता से होता हैं .गैर योजनागत पूंजीगत व्यय में सरकार द्वारा प्रदत्त विविध सामान्य,सामाजिक और आर्थिक सेवाओं पर व्यय शामिल होते हैं .

रुपया कहाँ से आता है (बजट 2018 – 19)

रुपया कहाँ जाता है (बजट 2018 – 19)

बजटीय घाटा

    जब सरकार राजस्व प्राप्ति से अधिक व्यय करती है, तो इस स्थिति को बजटीय घाटा कहते है.इस घाटे की पूर्ति के लिए कई उपाए किए जाते है, जिनका किसी अर्थव्यवस्था पर अलग अलग प्रभाव पड़ता है.

बजट 2018 -19

  • Revenue Deficit (राजस्व घाटा) – Revenue Expenditure – Revenue Receipt = 2.2 %
  • Effective Revenue Deficit (प्रभावी राजस्व घाटा) = Revenue deficit – Grants used for creation of capital assets = 1.2 %
  • Fiscal Deficit (राजकोषीय घाटा)= Total Reciept – Total expenditure + Market Borrowing = 3.3 %
  • Primary Deficit (प्राथमिक घाटा)- Fiscal Deficit – Interest Payment on old loans = 0.3 %

राजस्व घाटा :

  • राजस्व घाटा सरकार की राजस्व प्राप्तियों के ऊपर राजस्व व्यय के अधिशेष को बताता है .
  • राजस्व घाटा = राजस्व व्यय – राजस्व प्राप्तियां
  • राजस्व घाटे में केवल उन्हीं लेन देनों को शामिल किया जाता है , जिनसे सरकार के वर्तमान आय और व्यय पर प्रभाव पड़ता है.
  • जब सरकार को राजस्व घाटा प्राप्त होता है ,तो इससे संकेत मिलता है की सरकार निर्बचत कर रही है और अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों की बचतों का उपयोग अपने उपभोग संबंधी व्यय के कुछ हिस्सो को पूरा करने के लिए कर रही है.
  • इस स्थिति में ,सरकार को न केवल अपने निवेश के लिए अपनी उपभोग संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भी ऋण ग्रहण करना पड़ेगा.
  • इससे ऋणों और ब्याज दायित्वों का निर्माण होगा और सरकार को अंततोगत्वा अपने व्यय में भी कटौती करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा .
  • चूँकि राजस्व व्यय का एक बड़ा भाग व्यय के लिए प्रतिबद्ध होता है ,इसीलिए इसमें कटौती नही की जाएगी .
  • बहुधा सरकार उत्पादक पूंजीगत व्यय अथवा कल्याण संबंधी व्यय में कटौती करती है .
  • इसके परिणामस्वरूप विकास की गति धीमी होती है और कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है .
  • प्रभावी राजस्व घाटा = राजस्व घाटा – पूंजी परिसंपत्तियों के निर्माण के लिए इस्तेमाल अनुदान

राजकोषीय घाटा

  • राजकोषीय घाटा सरकार के कुल व्यय और ऋण – ग्रहण को छोड़कर कुल प्राप्तियों का अंतर है .
  • सकल राजकोषीय घाटा = कुल व्यय – कुल प्राप्तियाँ + बाजार उधार
  • गैर ऋण से सृजित पूंजीगत प्राप्तियां ऐसी प्राप्तियां है , जो ऋण ग्रहण के अन्तर्गत नही आती हैं,इसीलिए इससे ऋण में वृद्धि नही होती हैं . इसके उदाहरण हैं – ऋणों की वसूली और सार्वजनिक उपक्रमों की बिक्री से प्राप्त राशि .
  • राजकोषीय घाटे का वित्त पोषण ऋण ग्रहण के द्वारा ही किया जाएगा . अतः इससे सभी स्रोतों से सरकार के ऋण ग्रहण संबंधी आवश्यकताओं का पता चलता हैं .वित्तीय पक्ष से —
  • सकल राजकोषीय घाटा = निवल घरेलू ऋण – ग्रहण + भारतीय रिज़र्व बैंक से ऋण – ग्रहण + विदेशों से ऋण – ग्रहण
  • निवल घरेलू ऋण ग्रहण के अन्तर्गत ऋण उपकरणों (उदाहरणार्थ , विविध लघु बचत योजनाएं ) के माध्यम से सीधे जनता से प्राप्त ऋण और वैधानिक तरलता अनुपात (एस एल आर) के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप में व्यवसायिक बैंकों से प्राप्त ऋण आते हैं .
  • सकल राजकोषीय घाटा अर्थव्यवस्था के स्थायित्व और सार्वजनिक क्षेत्र की सुदृढ़ वित्तीय व्यवस्था के लिए एक निर्णायक चर हैं . इस प्रकार सकल राजकोषीय घाटा को मापा जा सकता हैं ,जैसा की देखा गया हैं कि राजस्व घाटा राजकोषीय घाटा का एक भाग हैं .
  • राजकोषीय घाटा = राजस्व घाटा + पूंजीगत व्यय – गैर ऋण से सृजित पूंजीगत प्राप्तियां .
  • राजकोषीय घाटे में राजस्व घाटे का एक बड़ा अंश यह दर्शाता हैं कि उधार का एक बड़ा हिस्सा उपभोग व्यय के लिए उपयोग किया जाता हैं न कि निवेश के लिए .

प्राथमिक घाटा

  • सरकार की ऋण ग्रहण आवश्यकताओं में संचित ऋण पर दायित्व शामिल होते हैं. प्राथमिक घाटे के माप का लक्ष्य वर्तमान राजकोषीय असुंतलन पर प्रकाश डालना है. वर्तमान व्यय के राजस्व से अधिक होने के कारण होने वाले ऋण – ग्रहण के आकलन के लिए हम प्राथमिक घाटे का परिकलन करते है . सरल भाषा में यह वह शेष है , जो राजकोषीय घाटे में से ब्याज अदायगी करने पर शेष राशि आती है .
  • सकल प्राथमिक घाटा = सकल राजकोषीय घाटा – निवल ब्याज दायित्व
  • निवल ब्याज दायित्वों में निवल घरेलू परिदाय पर सरकार द्वारा प्राप्त ब्याज प्राप्तियों से ब्याज अदायगी करने पर शेष राशि आती है, घाटे की वित्त व्यवस्था बजटीय घाटे के लिए वित्त पोषण या तो करारोपण या ऋण अथवा नोट छापकर किया जाना चाहिए .
  • सरकार प्रायः ऋण ग्रहण पर आश्रित रहती है ,जिसे सरकारी ऋण कहते हैं.घाटे और ऋण की संकल्पनाओं में निकट सम्बन्ध होता हैं .घाटा को एक प्रवाह के रूप में समझा जा सकता हैं ,जिससे ऋण के स्टॉक में वृद्धि होती हैं .
  • यदि सरकार का ऋण ग्रहण एक वर्ष के बाद दूसरे वर्ष भी जारी रहता हैं,तो इससे ऋण का संचय होता हैं और सरकार को ब्याज के रूप में अधिक से अधिक भुगतान करना पड़ता हैं .

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