समसामयिकी अक्टूबर : CURRENT AFFAIRS OCTOBER :8-15

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अमेरिका ने यूनेस्को से बाहर होने की घोषणा की:

  • अमेरिका ने यूनेस्को से बाहर होने की 12 अक्टूबर 2017 को घोषणा की। उसने संयुक्त राष्ट्र की इस सांस्कृतिक संस्था पर इस्राइल विरोधी रुख अपनाने का आरोप लगाया है।
  • पेरिस स्थित यूनेस्को ने 1946 में काम करना शुरू किया था और यह विश्व धरोहर स्थल को नामित करने को लेकर मुख्य रूप से जाना जाता है। यूनेस्को से बाहर होने का अमेरिका का फैसला 31 दिसंबर 2018 से प्रभावी होगा। हालांकि, अमेरिका उस वक्त तक यूनेस्को का एक पूर्णकालिक सदस्य बना रहेगा।
  • विदेश विभाग की प्रवक्ता हीथर नाउर्ट ने कहा, ‘यह फैसला यूं ही नहीं लिया गया है। बल्कि यह यूनेस्को पर बढ़ती बकाया रकम की चिंता और यूनेस्को में इस्राइल के खिलाफ बढ़ते पूर्वाग्रह को जाहिर करता है। संस्था में मूलभूत बदलाव करने की जरूरत है।’

भारतीय नौसेना के दो प्रमुख युद्धपोत आईएनएस सतपुड़ा और कदमत जापानी नौसेना के पैसेज अभ्यास में हिस्सा लेंगे:

  • नौसेना के दो प्रमुख युद्धपोत आईएनएस सतपुड़ा और कदमत चार दिन (12 से 15 अक्टूबर) की जापान यात्रा पर रवाना हो गए हैं। इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाना और भारत की पूर्व की ओर देखो नीति के तहत इंडो-प्रशांत क्षेत्र में शांति व स्थिरता कायम करने की प्रतिबद्धता को बरकरार रखना है।
  • इस यात्रा के दौरान दोनों युद्धपोत जापान के बंदरगाह ससीबो पहुंचेंगे। दोनों देशों के बीच में द्विपक्षीय संबंधों का दायरा सुरक्षात्मक के अलावा धार्मिक, सांस्कृतिक व आर्थिक संबंधों से भी जुड़ा हुआ है।
  • इसके बाद दोनों युद्धपोत जापान के मुरूसामे श्रेणी के जंगी युद्धपोत जेएस क्रिसमे के साथ पैसेज अभ्यास (पीएएसएसईएक्स) में हिस्सा लेंगे। दोनों नौसेनाओं के बीच में तकनीक के आदान-प्रदान से लेकर, वाइट शिपिंग, ट्रेनिंग, खुफिया जानकारी साझा करने, प्राकृतिक आपदा के समय मानवीय सहायता प्रदान करने जैसे क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देने पर जोर दिया जाएगा।

संयुक्त राष्ट्र ने नए एचआईवी संक्रमणों में कटौती करने के लिए अभिनव योजना की शुरूआत की:

  • महामारी के चरमोत्कर्ष के बाद से एड्स से संबंधित मौतों में 50% की गिरावट के बावजूद, नए एचआईवी संक्रमित वयस्कों की संख्या में गिरावट तो आ रही लेकिन कमी का स्तर बढ़ नहीं रहा हैं, इस स्थिति से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने एक 10 बिंदु की योजना को लॉन्च किया है। इस योजना को अपनाकर देश तत्काल, ठोस कदम उठाते हुए प्रगति को गति देने के लिए अग्रसर हो सकते हैं।
  • जबकि वर्ष 2010 से बच्चों के बीच नए एचआईवी संक्रमणों में 47% की कमी आई है, लेकिन वयस्कों में नए एचआईवी संक्रमणों में केवल 11 प्रतिशत की गिरावट आई है।
  • एचआईवी रोकथाम 2020 रोड मैप में एक 10-बिंदु कार्य योजना है जोकि देशों को तत्काल, ठोस कदम जैसे कि अधिकतम प्रभाव के अवसरों का अनुमान लगाने के लिए अप-टू-डेट विश्लेषण आयोजित करना; कमियों की पहचान करने के लिए मार्गदर्शन विकसित करना और तेजी से आगे बढ़ने के लिए कार्रवाई करना और युवा लोगों और महत्वपूर्ण आबादी सहित एचआईवी से प्रभावित लोगों तक पहुंचने के लिए कानूनी और नीतिगत बाधाओं पर ध्यान देना।

एचआईवी की रोकथाम में तेजी लाने के लिए दस सूत्रीय योजना:

  • रोकथाम की महत्वपूर्ण जरूरतों के रणनीतिक मूल्यांकन का संचालन करें और प्रगति के लिए नीतियों और कार्यक्रम अवरोधों की पहचान करें।
  • एचआईवी रोकथाम 2020 के लिए राष्ट्रीय लक्ष्य को विकसित करें या उनकी समीक्षा करें और रोड मैप्स तैयार करें।
  • राष्ट्रीय रोकथाम नेतृत्व को मजबूत करना और एचआईवी निवारण निरीक्षण और प्रबंधन को बढ़ाने के लिए संस्थागत परिवर्तन करना।
  • निवारण कार्यक्रमों के लिए एक सक्षम वातावरण बनाने के लिए आवश्यक नीति और कानूनी परिवर्तनों को प्रारम्भ करना।
  • मार्गदर्शन विकसित करना, हस्तक्षेप पैकेज तैयार करना और सेवा वितरण प्लेटफार्मों की पहचान करना और परिचालन योजनाओं को अद्यतन करना।
  • समेकित रोकथाम क्षमता निर्माण और तकनीकी सहायता योजना विकसित करना।
  • नागरिक समाज कार्यान्वयनकर्ताओं के लिए सामाजिक अनुबंध तंत्र को स्थापित करना या उसे मजबूत करना और समुदाय आधारित कार्यक्रम को विस्तार देना।
  • रोकथाम के लिए संसाधन का आकलन करना और वित्तपोषण अंतर को बंद करने के लिए एक रणनीति विकसित करना।
  • एचआईवी रोकथाम कार्यक्रम की निगरानी प्रणाली को स्थापित करना या उसे मजबूत करना।
  • रोकथाम के लिए जवाबदेही को मजबूत करना।

आईएनएस किलटन भारतीय नौसेना में शामिल किया जाएगा:

  • रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण 16 अक्टूबर को पनडुब्बी को मार गिराने में सक्षम युद्धपोत आईएनएन किलटन को भारतीय नौसेना में शामिल करेंगी। कमोरटा क्लास श्रेणी के चार युद्धपोत में से यह तीसरा है। इसका निर्माण प्रोजेक्ट 28 के तहत हुआ है।
  • नौसेना के आधिकारिक बयान में कहा गया है कि डायरेक्टोरेट ऑफ नेवल डिजाइन ने इसे आकार दिया है। कोलकाता के गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स ने इसका निर्माण कराया है। इस युद्धपोत में घातक हथियारों के साथ ही सेंसर भी लगाए गए हैं।
  • यह देश का पहला ऐसा युद्धपोत है जिसके विशाल ढांचे में कार्बन फाइबर लगा है। इस मटेरियल के इस्तेमाल से जहाज का भार कम होता है और रखरखाव का खर्च भी कम हो जाता है। इस युद्धपोत को भारी-भरकम टारपीडो के साथ ही एएसडब्लू रॉकेटों से लैस किया गया है।
  • इसमें 76 एमएम कैलिबर की मीडियम रेंज की बंदूक और दो मल्टी-बैरल 30 एमएम गन भी इसकी शस्त्र प्रणाली में शामिल हैं। इसे अग्नि नियंत्रण प्रणाली, मिसाइल तैनाती रॉकेट, एडवांस इलेक्ट्रानिक सपोर्ट मेजर सिस्टम सोनार और रडार रेवती से भी लैस किया गया है।
  • इस जहाज में जल्दी ही कम दूरी की सैम प्रणाली और एएसडब्लू हेलिकॉप्टर भी तैनात किए जाएंगे। इस युद्धपोत का नाम अमिनिदिवि समूह के द्वीपों में से एक से लिया गया है।

बैंकों के ‘बैड लोन्स’ में हुई वृद्धि
प्रस्तावना

    जून, 2017 तक भारतीय बैंकों के ‘बैड लोन्स’ के स्तर में रिकॉर्ड तोड़ 146 बिलियन डॉलर यानीकि 9.5 ट्रिलियन रुपए की वृद्धि दर्ज़ की गई है। इससे यह पता चलता है कि एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में अभी भी बैड लोन्स संबंधी समस्या पर नियंत्रण रखने के लिये कोई उचित व्यवस्था नहीं की गई है।

प्रमुख बिंदु

    • दरअसल, सूचना के अधिकार के आवेदनों के माध्यम से रिज़र्व बैंक के आँकड़ों की समीक्षा करने के उपरान्त यह पता चला कि वर्ष 2017 के प्रथम छह महीनों में कुल ‘स्ट्रेस्ड ऋणों’ (stressed loans) में 4.5% की वृद्धि हुई है, जबकि वर्ष 2016 के अंतिम छह महीनों में इसकी वृद्धि दर 5.8% थी।
    • ध्यातव्य है कि स्ट्रेस्ड ऋणों में गैर- निष्पादित परिसंपत्तियों (Non Performing Assets-NPA) और पुनर्गठित (restructured) अथवा डूबते हुए ऋणों (rolled over loans) को शामिल किया जाता है।
    • यद्यपि भारत की कंपनियों के लिये फंडिंग का मुख्य स्रोत बैंक ही हैं, परन्तु खराब ऋणों की समस्या के चलते बैंकों के लाभों में गिरावट आई है तथा उन्होंने मुख्यतः उन छोटी फर्मों को ऐसे समय में नई उधारियाँ देने से इनकार कर दिया है, जब उन पर निर्भर भारतीय अर्थव्यवस्था धीमी गति से प्रगति कर रही है।
    • विगत तीन वर्षों में अप्रैल-जून माह के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था वृद्धि दर काफी सुस्त रही है । अतः यह भारत सरकार के लिये चिंता का विषय बन गया है।
    • विश्लेषक मानते हैं कि छोटी फर्मों के लिये बैड लोन में होने वाली वृद्धि और रिटेल उधारियाँ चिंताजनक हैं तथा ये अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने के लिये नए ऋणों को प्रोत्साहित करने में अपेक्षाकृत अल्प भूमिका ही निभाएंगे।
    • वस्तुतः कॉर्पोरेट क्षेत्र में यह एक रिकग्निशन चक्र (recognition cycle) है, जो कि शीघ्र ही समाप्त होने वाला है, क्योंकि इससे बैंक, रिज़र्व बैंक और अन्य नियामकों के दबाव में आ जाएंगे।
    • सार्वजनिक क्षेत्र के देनदारों में शामिल वरिष्ठ बैंकर (जिनका योगदान भारतीय बैंकिंग संपत्ति के तीन-चौथाई भाग में है) भी इस बात पर सहमत हैं कि बैंकिंग व्यवस्था के लिये आने वाले माह काफी तनावग्रस्त होंगे।
    • स्ट्रेस्ड लोन्स वर्ष 2017 के जून माह तक कुल ऋणों का 12.6% हो गए हैं। विदित हो कि यह विगत 15 वर्षों में स्ट्रेस्ड लोन्स का सबसे उच्चतम स्तर है।

‘बैड लोन्स’ क्या है?

    • ऐसे ऋण जहाँ लिये गए ऋणों का पुनर्भुगतान देनदार और लेनदार के मध्य पूर्व सहमति से किये गए समझौते के अनुरूप नहीं किया जाता तथा जिनका भुगतान कभी नहीं होता, उन्हें ‘बैड लोन्स’ (Bad loans) कहा जाता है।
    • जब कोई व्यक्ति ऋण लेता है तथा उसका पुनः भुगतान नहीं करता है तो उसे भविष्य में आसानी से ऋण प्राप्त नहीं हो पाता तथा बैंक उसे दिये गए ऋण को ‘बैड लोन’ की श्रेणी में शामिल कर देता है, जिसका तात्पर्य यह है कि वह ऋण देनदार के लिए एक जोखिम है।
    • परन्तु यदि व्यक्ति के ऋण को ‘बैड लोन्स’ की श्रेणी में रखा गया हैं और वह पुनः नया ऋण लेना चाहता है तो वह इसे उन देनदारों से प्राप्त कर सकता है, जो ऋण देने के लिये उसके द्वारा लिये गए पूर्व ऋणों की जाँच ही नहीं करते।
    • ‘बैड संपत्ति’ (bad asset) को उसकी समयावधि के आधार पर खराब संपत्ति (substandard asset) संदिग्ध संपत्ति (doubtful asset) और नुकसानदायक संपत्ति (loss assets) में वर्गीकृत किया जाता है।

‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ द्वारा बच्चों के संबंध में जारी नए दिशा-निर्देश
प्रस्तावना

    हाल ही में ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ द्वारा बच्चों में बढ़ती जा रही मोटापे की समस्या पर चिंता व्यक्त करते हुए इसके नियंत्रण हेतु नए दिशा-निर्देश जारी किये गए हैं। दरअसल, इस समस्या ने एक वैश्विक महामारी का रूप धारण कर लिया है, क्योंकि अब गरीब राष्ट्र भी इससे अछूते नहीं रहे हैं।

प्रमुख बिंदु

    • विदित हो कि विश्व स्तर पर चीन के बाद भारत में ही मोटापे से ग्रस्त बच्चों की संख्या सबसे अधिक है। चिकित्सकों का कहना है कि इस समस्या का एक प्रमुख कारण अभिभावकों की यह सोच है कि मोटा बच्चा ही स्वस्थ्य होता है।
    • विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा-निर्देश जिनका शीर्षक “कुपोषण के दोहरे बोझ के संदर्भ में बच्चों के अधिक वज़न और मोटापे का मूल्यांकन करने के लिये प्राथमिक स्तर पर उपलब्ध कराई जाने वाली सुविधाओं तक पहुँच बनाना और उनका प्रबंधन करना” था, ने ‘बच्चों की बीमारी के एकीकृत प्रबंधन’(Integrated Management of Childhood Illness – IMCI) के लिये अद्यतन सूचनाएँ उपलब्ध कराई। ध्यातव्य है कि इन दिशा-निर्देशों में सामान्य भार और ऊँचाई के साथ ही खाने की आदतों के मूल्यांकन को भी शामिल किया गया है।
    • दरअसल, वर्ष 2016 में विश्व के लगभग आधे वज़नी अथवा मोटे बच्चे एशिया तथा अफ्रीका (एक चौथाई भाग में) में थे। विडंबना यह है कि अधिक वज़न और मोटापा बच्चों की उस आबादी में अधिक पाया गया है, जहाँ कुपोषण सामान्य है। इस प्रकार की स्थितियों का उल्लेख करने के लिये कभी-कभी ‘कुपोषण का दोहरा बोझ’ (double-burden of malnutrition) जैसे पदों का प्रयोग किया जाता है।
    • हालाँकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के इन दिशा-निर्देशों में प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं में कमज़ोर (stunted), सामान्य भार वाले शिशुओं और बच्चों को रोज़ाना उपलब्ध कराए जाने वाले ‘अनुपूरक खाद्य पदार्थों’ (supplementry food) की अनुशंसा नहीं की गई है। स्पष्ट है कि इस समय पूरी पीढ़ी को हृदय संबंधी रोगों, उच्च रक्तचाप और मधुमेह संबंधी जटिलताओं से बचाने के लिये पूर्व सावधानी बरतना आवश्यक होगा।
    • भारतीय चिकित्सा संघ (Indian Medical Association -IMA) अपने सभी सदस्यों तक विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा-निर्देशों का प्रसार कर रहा है। बच्चों में मोटापे का बढ़ता स्तर उनके द्वारा किये जाने वाले गैर-स्वास्थ्यवर्धक भोजन और उनकी शारीरिक निष्क्रियता को प्रतिबिंबित करता है।
    • एक अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2025 तक भारत में अधिक भार युक्त बच्चों की संख्या 17 मिलियन से अधिक हो जाएगी।
    • वर्तमान में बच्चों में मोटापे की पहचान करना एक बड़ी चुनौती बन गया है। अभिभावक अपने बच्चों को चिकित्सक के पास तभी ले जाना उचित समझते हैं, जब उनके बच्चों को अधिक समस्या होने लगती है। ध्यातव्य है कि अधिकांश बच्चे शीघ्र ही यौवनावस्था में आ जाते हैं तथा इस दौरान उनके जोड़ों में दर्द होना स्वाभाविक है, जिस कारण वे व्यायाम करने में असहज महसूस करते हैं। फलतः उनमें उपापचयी लक्षण विकसित होता है और वे ‘टाइप-2 मधुमेह’(Type 2 diabetes) से ग्रस्त हो जाते हैं।

आईएमएफ ने घटाया भारत की वृद्धि दर का अनुमान
प्रस्तावना

    • अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने वित्त वर्ष 2018 के लिये भारत की अनुमानित विकास दर कम कर दी है। विदित हो कि आईएमएफ ने इसका कारण नोटबंदी और जीएसटी को माना है।
    • हालाँकि, आईएमएफ ने यह भी कहा है कि इन आर्थिक सुधारों की वज़ह से ही भारतीय अर्थव्यवस्था फिर से रफ्तार पकड़ेगी और दुनिया की सबसे तेज़ गति से वृद्धि करने वाली अर्थव्यवस्था बन जाएगी।

आईएमएफ के अनुमानों से संबंधित महत्त्वपूर्ण बिंदु

    • आईएमएफ के ‘वर्ल्ड इकॉनमिक आउटलुक’ के हवाले से कहा गया है कि वर्ष 2017 में भारत की आर्थिक वृद्धि दर 6.7 प्रतिशत रहेगी| उल्लेखनीय है कि आईएमएफ का भारत के लिये यह अनुमान उसके पहले लगाए गए अनुमानों की तुलना में 0.5 प्रतिशत कम है|
    • साथ ही वित्त वर्ष 2018 में भारत की अर्थव्यवस्था की रफ्तार का अनुमान 6.7 प्रतिशत रखा है, जो कि पहले 7.2 प्रतिशत था। इतना ही नहीं वित्त वर्ष 2019 में भी आईएमएफ ने भारत की वृद्धि दर का अनुमान 7.7 प्रतिशत से घटाकर 7.2 प्रतिशत कर दिया है |
    • वहीं यदि वैश्विक अर्थव्यवस्था की बात करें तो इसकी वृद्धि दर 2017 में 3.6 प्रतिशत और 2018 में 3.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। यह अनुमान आईएमएफ के पिछले अनुमान से 0.1 प्रतिशत अधिक है।
    • ध्यातव्य है कि इस वर्ष जून तिमाही में भारत की वृद्धि दर 3 साल के निचले स्तर 5.7 प्रतिशत पर पहुँच गई थी, जिससे वित्त वर्ष के अनुमानों में भी गिरावट आई है। इससे पहले विश्व बैंक भी भारत की अनुमानित विकास दर को 7.2 प्रतिशत से कम कर 7 प्रतिशत कर चुका है।
    • आईएमएफ ने यह भी कहा है कि आवश्यक आर्थिक सुधारों से अर्थव्यवस्था में तेज़ी आएगी। जीएसटी जैसे सुधारों से विकास दर में बाद में तेज़ी आएगी और यह 8 प्रतिशत को पार कर जाएगी।
    • आईएमएफ ने अन्य लंबित सुधारों की ओर इंगित करते हुए कहा है कि निवेश के माकूल माहौल बनाने के लिये श्रम सुधार और भूमि सुधार कानूनों को भी लागू करना होगा।

5/20 नियम
प्रस्तावना

    हाल ही में जारी की गई अपनी रिपोर्ट में भारत के ‘एशिया प्रशांत विमानन केंद्र’ (Centre for Asia Pacific Aviation India) ने भारतीय अर्थव्यवस्था में विमानन के योगदान को अधिकतम करने हेतु सरकार से तथाकथित 5/20 नियम (5/20 rule) पर पुनर्विचार करने की सिफारिश की है।

5/20 नियम क्या है?

    • दरअसल, इस नियम में यह अनुबंधित है कि एक घरेलू वाहक (domestic carrier) में 20 विमानों का एक बेड़ा (a fleet of 20 aircraft) होना चाहिये तथा अंतर्राष्ट्रीय उड़ान भरने योग्य बनने से पूर्व इन विमानों को भारतीय आकाश में संचालित किया जाना चाहिये।
    • विदित हो कि 30 दिसंबर, 2004 को केंद्र सरकार ने इस 5/20 नियम को मंज़ूरी प्रदान की थी।
    • यद्यपि इस विषय में कुछ भी स्पष्ट नहीं है कि इस नियम को लागू करने का निर्णय क्यों लिया गया था। परन्तु तत्कालीन अधिकारी वर्ग का कहना था कि यदि देश की कोई नई एयरलाइन विदेशों के लिये उड़ान भरते समय दुर्घटनाग्रस्त हो जाए तो भारत उस स्थिति का सामना करने में सक्षम नहीं होगा। वस्तुतः इससे भारतीय विमानन उद्योग की प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिन्ह लग जाएगा। अतः यदि उक्त नियम को लागू कर लिया जाए तो यह पाँच वर्षीय ट्रैक रिकॉर्ड अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों में अधिक सुरक्षा को सुनिश्चित कराएगा।

यह क्यों महत्त्वपूर्ण है?

    • इस नियम के प्रभाव में आने के साथ ही ‘जेट एयरवेज’ और ‘एयर सहारा’ को भी अंतर्राष्ट्रीय उड़ानें भरने की अनुमति प्राप्त हो गई और अब भारत से अंतर्राष्ट्रीय गंतव्यों तक की उड़ानों के संचालन पर केवल ‘एयर इंडिया’ और ‘इंडियन एयरलाइन्स’ का ही एकाधिकार नहीं रह गया है।
    • परंतु वास्तविकता तो यह है कि ‘एयर इंडिया’ और ‘इंडियन एयरलाइन्स’ को भी 5/20 नियम से काफी लाभ पहुँचा, क्योंकि ये ऐसे भारतीय वाहक हैं जिन्हें भारत से खाड़ी देशों (जैसे-संयुक्त अरब अमीरात, कतर, ओमान, बहरीन, कुवैत तथा सऊदी अरब) में पाँच वर्षों तक उड़ानों का संचालन करने की अनुमति प्राप्त हो गई थी। संभवतः उस समय राज्य स्वामित्व वाले इन दोनों एयरलाइनों के लिये ‘खाड़ी मार्ग’ ही सबसे लाभकारी मार्ग था।
    • आज दो नए वाहक ‘एयर एशिया’ और ‘विस्तारा’ भी विदेशों में उड़ान भरने के लिये स्वयं को तैयार कर रहे हैं।
    • ध्यातव्य है कि वर्ष 2004 से ‘वायु सेवा द्विपक्षीय समझौतों के आदान प्रदान’ (exchange of air services bilateral agreements -ASA) के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय विमानों को भी भारत में उड़ान भरने की अनुमति प्रदान कर दी गई थी।
    • दुबई आधारित ‘अमीरात’ (Dubai-based Emirates) नामक एयरलाइन्स को वर्ष 1985 में शुरू किया गया था तथा मुंबई ऐसा पहला मार्ग था जिससे इसको जोड़ा गया था।
    • हालाँकि भारत में 70 से अधिक एयरलाइनों का संचालन होता है, परंतु वर्तमान में मात्र ‘जेट एयर इंडिया, ‘स्पाइस जेट’ और ‘इंडिगो’ ही विदेशों में उड़ान भरती हैं।
    क्या होगा प्रभाव
    • नियमों में थोड़े बदलाव से अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों हेतु भारतीय यात्रियों के लिये दो नई एयरलाइन्सों (विस्तारा और एयरएशिया इंडिया) के विकल्प खुल जाएंगे| परन्तु प्रतिद्वंदिता में तब और अधिक वृद्धि हो जाएगी, जब छोटे खिलाड़ी (जैसे ‘एयरकोस्टा’ और ‘इज़िजेट’) भी अंतर्राष्ट्रीय उड़ान भरने के लिये तैयार हो जाएंगे।

लैंड-पूलिंग के माध्यम से छह हवाईअड्डों का विकास
प्रस्तावना

    उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार भूमि अधिग्रहण हेतु एक लैंड-पूलिंग मॉडल (land-pooling model) अपनाकर सार्वजनिक-निजी भागीदारी (public-private partnership -PPP) के माध्यम से तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों में हवाईअड्डों का निर्माण करने की योजना बना रही है।

प्रमुख बिंदु

    • इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार ने उक्त राज्यों के चेन्नई, कोलकाता, बागडोगरा, पुणे, वाराणसी और नालंदा शहरों में एक-एक ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे (greenfield airport) को विकसित करने का भी प्रस्ताव रखा है।
    • विदित हो कि ‘भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण’ (Airports Authority of India -AAI) अपने हवाई अड्डों के विस्तार के लिये अगले चार वर्षों में 18,000 करोड़ रुपए व्यय करेगा।
    • सरकार ने उन स्थानों पर लैंड-पूलिंग अपनाने की योजना बनाई है, जहाँ भूमि की कमी है। ध्यातव्य है कि इससे फंड की आवश्यकता और भू-स्वामियों का प्रतिरोध आदि अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करने में सहायता मिलेगी।
    • ध्यान देने योग्य है कि इस प्रकार के मॉडल को अभी तक विमानन क्षेत्र में नहीं अपनाया गया है।
    • इस मॉडल के अंतर्गत विभिन्न लोगों द्वारा खरीदी गई भूमि को एक साथ पूल कर लिया जाएगा तथा उनके स्वामियों को किसी विकसित क्षेत्र में भूमि का एक निश्चित भाग दे दिया जाएगा, जिसकी कीमत उनकी वास्तविक भू-जोत से अधिक होगी।
    • भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण ने इस मॉडल के अध्ययन के लिये देश के पर्यावरणीय योजना और प्रौद्योगिकी केंद्र का सहयोग प्राप्त किया है।
    • इस मॉडल के तहत तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और बिहार की राज्य सरकारों को उनके राज्यों में हवाईअड्डों के विकास के लिये भूमि की पहचान करने को कहा गया है।
    • सरकार का कहना है कि वे अपने राज्यों में न्यूनतम 2,500 एकड़ भूमि की पहचान करें। उसके पश्चात् सरकार इन स्थलों की तकनीकी व्यवहार्यता की जाँच करेगी।
    • इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए केंद्र सरकार पहले ही तमिलनाडु राज्य में चेन्नई के लिये एक दूसरे हवाई अड्डे के विकास हेतु भूमि की पहचान करने के लिये दो बैठकें कर चुकी है।
    • हालाँकि पश्चिम बंगाल सरकार ने केंद्र सरकार को इस बात से अवगत करा दिया है कि दुर्गापुर के अंडल हवाईअड्डे को कोलकाता के लिये दूसरे हवाई अड्डे के रूप में विकसित किया जा सकता है।
    • स्रोतों के मुताबिक, केंद्र सरकार देश में हवाई अड्डों की क्षमता में वृद्धि करने के निम्नलिखित क्षेत्रों पर ही मुख्य रूप से ध्यान केन्द्रित कर रही हैं –
    ♦ मौजूदा टर्मिनलों का विकास
    ♦ नए टर्मिनलों का निर्माण
    ♦ नए हवाईअड्डों के निर्माण की आवश्यकता
    • यद्यपि पिछले वर्ष नागरिक विमानन राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने यह कहा था कि अगले 10 से 15 वर्षों में हवाईअड्डों की क्षमता को दोगुना करने के लिये केंद्र सरकार को 3 लाख करोड़ रुपए की आवश्यकता होगी।
    • नागरिक विमानन मंत्रालय के आतंरिक पर्यवेक्षणों से यह स्पष्ट हुआ है कि अगले 10-15 वर्षों में देश के 200 हवाईअड्डों में उड़ानों का उचित प्रकार से संचालन करने की अभूतपूर्व क्षमता विकसित हो जाएगी।

छोटे व मध्यम उद्यमियों को जीएसटी की उच्च दरों से राहत
प्रस्तावना

    हाल ही में छोटे एवं मध्यम श्रेणी के व्यवसाइओं और निर्यातकों को नई कर व्यवस्था में राहत देने के उद्देश्य से ‘वस्तु एवं सेवा कर परिषद’ (GST Council) ने ‘रिलैक्सेशन मानकों’ (relaxation measures) को अंतिम रूप दे दिया है। इसके अंतर्गत परिषद् ने 27 वस्तुओं के लिये जीएसटी की दरों में भी कमी कर दी है।

प्रमुख बिंदु

    • दरअसल अभी तक लंबित रखे गए ‘एक्सपोर्ट्स टैक्स रिफंड्स’ (Exporters’ tax refunds) को भी अगले दो सप्ताहों में मंज़ूरी दे दी जाएगी। 31 मार्च तक होने वाले निर्यातों को जीएसटी में पूर्व की भाँति ही छूट दी जाएगी| तात्पर्य यह है कि इनके लिये अग्रिम प्राधिकरण (advance authorization) तथा ईपीसीजी (EPCG) उसी प्रकार जारी रहेंगे।
    • इन मानकों के तहत मात्र 0.1% का आईजीएसटी (I-GST) उन व्यापारियों द्वारा किये जाने वाले निर्यात पर लगाया जाएगा, जो घरेलू विनिर्माताओं से वस्तुएं खरीदते हैं।
    • खाद्य सामग्रियों जैसे-खाकरा, कटे हुए सूखे आम, समेकित बाल विकास सेवा के फ़ूड पैकेट्स, गैर-ब्रांडेड नमकीन और गैर-ब्रांडेड दवाओं की दरों में भी 5% की कमी कर दी गई है।
    • इसी प्रकार ज़री के कामगारों (Zari workers) द्वारा मुहैया कराई गई रोज़गार कार्य सेवाओं, नकली आभूषणों, मुद्रण और खाद्य सामग्री पर भी लगने वालीजीएसटी की दर में 5% की कमी कर दी गई है।
    • ई-वे बिल (e-way bill) की शुरुआत 1 जनवरी और 1अप्रैल 2018, से होगी। 1 अप्रैल 2018 से निर्यातकों के लिये एक ई-वॉलेट (e-wallet) सुविधा भी उपलब्ध रहेगी
    • इसी प्रकार छोटे और मध्यम स्तर के व्यवसायों पर अनुपालन दबाव को कम करने के लिये ‘कम्पोजीशन स्कीम’ (composition scheme) के लिये वार्षिक टर्न ओवर की न्यूनतम सीमा 1 करोड़ कर दी गई है, जबकि इससे पूर्व यह सीमा 75 लाख थी।
    • इसके अतिरिक्त, त्रैमासिक रिटर्न को जमा करने की सुविधा केवल उन व्यवसाइयों को प्राप्त होगी, जिनका वार्षिक टर्नओवर 1.5 करोड़ रुपए है। विदित हो कि ये छूट केवल उन रिटर्न्स पर ही मिलेगी, जिन्हें अक्टूबर माह से जमा किया जाएगा।
    • रेस्टोरेंटों में कर के स्वरूप की जाँच करने तथा इसका बात का पता लगाने कि यदि वे आगत कर ऋण (input tax credit) के बावजूद अपने मूल्यों में कमी नहीं करते हैं तो क्या किया जाना चाहिये, राज्य वित्त मंत्रियों के समूह का गठन किया जाएगा।
    • इस वर्ष की पहली तिमाही में कम आर्थिक वृद्धि दर से अवगत होने के पश्चात इन मानकों पर विचार-विमर्श होना चाहिये।

फ्लू से बचाव हेतु एक नई वैक्सीन का विकास
प्रस्तावना

    उल्लेखनीय है कि मौसमी फ्लू के उपचार हेतु ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के जेंनर इंस्टिट्यूट (Jenner Institute) द्वारा वैसीटेक (जो जेंनर इंस्टिट्यूट की बायोटेक कंपनी है) के सहयोग से एक नई वैक्सीन को विकसित किया गया है। इस वैक्सीन का चिकित्सकीय परीक्षण ब्रिटेन के बर्कशायर और ऑक्सफोर्डशायर नामक शहरों के 65 वर्ष से अधिक आयुवर्ग के लगभग 2,000 लोगों पर किया जाएगा। विदित हो कि इस नई वैक्सीन से ‘ए’, ‘बी’ व ‘सी’ प्रकार के फ्लू वायरसों से बचाव किया जा सकता है।

क्या है इन्फ्लुएंजा?

    • इन्फ्लुएंजा अथवा फ्लू एक वायरल मौसमी श्वसन रोग (viral seasonal respiratory disease) है, जिसके प्रति वृद्ध और युवा अधिक संवेदनशील होते हैं।
    • वस्तुतः इन्फ्लुएंजा वायरसों को ए, बी, सी, व डी चार श्रेणियों में विभाजित किया गया है। ‘ए’ और ‘बी’ प्रकार के वायरसों से मौसमी महामारियाँ होती हैं जबकि ‘सी’ से श्वसन संबंधी हल्की बीमारी होती है, परन्तु महामारी नहीं होती। इन्फ्लुएंजा ‘डी’ मवेशियों को प्रभावित करता है।
    • दरअसल, विश्व भर में प्रतिवर्ष लगभग एक बिलियन लोग इन्फ्लुएंजा वायरस से पीड़ित होते हैं तथा इसके कारण प्रतिवर्ष 250,000 से 500,000 लोगों की मृत्यु होती है। इसका शिकार मुख्यतः 65 वर्ष से अधिक आयुवर्ग के लोग होते हैं।
    इस प्रोजेक्ट पर कितने समय तक कार्य किया गया?
    • इस वैक्सीन को विकसित करने के लिये 10 वर्षों तक कार्य किया गया। वैसीटेक के अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने 150 से अधिक विषयों पर पाँच अध्ययन भी किये हैं, जिनमें से लगभग सभी प्रख्यात पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हो चुके हैं।

यह नई वैक्सीन क्यों महत्त्वपूर्ण है?

    • शोधकर्त्ताओं का विश्वास है कि नई वैक्सीन की “डिफरेंट मैकेनिज्म” (Different Mechanism) फ्लू से बचाव करने में मददगार साबित होगी तथा इसकी गंभीरता और समयावधि को कम कर देगी।
    • शोधकर्त्ताओं का प्रयास है कि विश्व स्तर पर इन्फ्लुएंजा नामक रोग के प्रभाव को कम किया जाए, क्योंकि यह विश्व भर में प्रतिवर्ष लाखों लोगों की मृत्यु का कारण बनता है। यदि यह वैक्सीन उचित तरीके से कार्य करती है तो इन्फ्लुएंजा से होने वाली मौतों के आँकड़ों में निश्चित तौर पर गिरावट आएगी।
    • अब तक वैज्ञानिक इस वैक्सीन का परीक्षण उन सभी क्षेत्रों में कर चुके हैं, जहाँ वर्तमान में कथित लाभों के कारण इन्फ्लुएंजा के लिये टीकाकरण उपलब्ध नहीं है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह वैक्सीन विश्व की एक बड़ी आबादी के स्वास्थ्य के लिये एक वरदान अथवा गेमचेंजर साबित होगी।

‘डिफरेंट मैकेनिज्म’ (different mechanism) क्या है?

    • सूक्ष्मदर्शी से देखने पर यह फ्लू वायरस एक ‘गोलाकार पिन कुशन’ (a spherical pin cushion) के समान दिखाई देता है, जिसके चारों ओर अनेक पिन लगे होते हैं।
    • दरअसल, वर्तमान में फ्लू के लिये जितनी भी वैक्सीन उपलब्ध हैं वे प्रतिरक्षा तंत्र को उत्तेजित करने के लिये फ्लू कोशिकाओं के बाहर मौजूद ‘सतही प्रोटीनों’ (surface proteins ) का उपयोग करती हैं, जिसके कारण स्वयं ही एंटीबॉडी उत्पन्न हो जाती हैं। परन्तु इनकी एक कमी यह है कि प्रतिवर्ष जैसे ही फ्लू का वायरस बदलता है, सतही प्रोटीन (hemagglutinin और neuraminidase) भी बदल जाते हैं।
    • वर्तमान में उपलब्ध वैक्सीन 65 वर्ष से अधिक आयुवर्ग के लोगों में केवल 30% से 40% ही प्रभावी हैं, क्योंकि उनका प्रतिरक्षा तंत्र उम्र के बढ़ने के साथ-साथ कमज़ोर होता जाता है।

भारत में इन्फ्लुएंजा की स्थिति

    • केन्द्रीय अनुसंधान संस्थान (सी.आर.आई) भारत में विश्व स्वास्थ्य संगठन के राष्ट्रीय इन्फ्लुएंजा केंद्रों में से एक है।
    • भारत में फ्लू से काफी अधिक संख्या में लोग पीड़ित होते हैं। इस वर्ष 1 अक्टूबर, 2017 तक ही इसके 36,000 मामले प्रकाश में आ चुके हैं, जबकि इस रोग से पीड़ित 2,000 से अधिक लोगों की मौत भी हो चुकी है।
    • यह नई वैक्सीन प्रतिरक्षा तंत्र को उत्तेजित करेगी, ताकि एंटीबॉडी के बजाय इन्फ्लुएंजा विशिष्ट टी-कोशिकाओं (शरीर की स्वतः रक्षा करने वाली कोशिकाएँ) में वृद्धि की जा सके। प्रत्येक मनुष्य में पहले से ही कुछ इन्फ्लुएंजा विशिष्ट टी-कोशिकाएँ होती हैं, परन्तु उनकी संख्या काफी कम होती है। अतः वे शरीर का बचाव करने में सक्षम नहीं होती हैं।
    • पूर्व के शोधों में यह पाया गया है कि टी-कोशिकाएँ एक से अधिक प्रकार के फ्लू वायरस से लड़ने में सहायता कर सकती हैं और इससे अधिक लोगों का बचाव किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त इससे फ्लू की समयावधि और गंभीरता को भी कम किया जा सकता है।
    • यद्यपि मानक वैक्सीन का प्रभाव केवल 4-6 महीनों के लिये ही रहता है तथापि यह नई वैक्सीन कुछ वर्षों तक अवश्य प्रभावी रहेगी।

उदय कोटक समिति की सिफारिशें

    • भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) की कंपनियों के कामकाज के संचालन पर एक उच्चस्तरीय समिति ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को उनके प्रशासनिक मंत्रालय से स्वतंत्र करने का सुझाव दिया है।
    • सूचीबद्ध कंपनियों के लिये कामकाज के संचालन संबंधीनियमों में बदलाव के संबंध में समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के लिये पारदर्शी कामकाज तय करना चाहिये। साथ ही उनके उद्देश्य और प्रतिबद्धताओं का भी खुलासा करना चाहिये।
    • रिपोर्ट कहती है, सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की उनके प्रशासनिक मंत्रालय से स्वतंत्रता सुनिश्चित करनी चाहिये, जिससे उनकी निर्णय प्रक्रिया तेज़ हो सकेगी और उनके परिचालन में स्वायत्तता आ सकेगी। इससे सार्वजनिक उपक्रम बेहतर वाणिज्यिक लक्ष्य हासिल कर सकेंगे और वे प्रतिस्पर्धी बाज़ार में प्रतिभाओं को आकर्षित कर सकेंगी।

निष्कर्ष

    • समिति ने कई अहम सुझाव दिये हैं जिनकी मदद से छोटे शेयरधारकों को बचाया जा सकता है। समिति ने यह भी कहा है कि किसी कंपनी का चेयरमैन कम-से-कम गैर कार्यकारी निदेशक होना चाहिये, ताकि प्रबंधन में स्वायत्तता सुनिश्चित की जा सके। सूचना साझा करने जैसे सवालों को लेकर भी समिति ने महत्त्वपूर्ण सुझाव दिये हैं।
    • देश का कारोबारी जगत लंबे समय से कारोबारी संचालन की दिक्कतों से दो-चार है। इसकी वज़ह से पर्यवेक्षकों के मन में बोर्ड की निगरानी और अंकेक्षण की गुणवत्ता को लेकर भरोसा कम हो गया है। ऐसे में सेबी के लिये उचित यही होगा कि वह जितनी जल्दी हो सके समिति की अधिक से अधिक अनुशंसाओं को क्रियान्वित करने की दिशा में आगे बढ़े।
    • दरअसल, जिन सुधारों की अनुशंसा प्राप्त हुई है उन्हें लागू तो हमें ही करना है। इन परिस्थितियों में यदि राजनीतिक इच्छा-शक्ति का अभाव दिखा तो इन सुधारों को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सकता। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिये कि नई अनुशंसाएँ लागू होने के बाद कोटक समिति की रिपोर्ट के अनुरूप उनकी मूल भावना का भी ध्यान रखा जाए।

इलेक्ट्रॉनिक-अपशिष्ट प्रबंध मानदंडों का महत्त्व
प्रस्तावना

    हाल ही में स्मार्टफोन, लैपटॉप तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामानों का निर्माण करने वाली 225 कंपनियों को इलेक्ट्रॉनिक-अपशिष्ट प्रबंध मानदंडों (electronic-waste procurement norms) का पालन न करने के लिये केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसी) द्वारा नोटिस जारी किया गया है।

इलेक्ट्रॉनिक-अपशिष्ट प्रबंध मानदंड क्या हैं?

    • वर्ष 2016 में पर्यावरण, वन तथा जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा इन नियमों को अधिसूचित किया गया था।
    • इसके तहत ई-कचरा नियमों में कंपैक्ट फ्लोरेसेंट लैम्प (सीएफएल) तथा मरकरी वाले अन्य लैम्प और ऐसे उपकरण शामिल किये गए थे।
    • इन मानदंडों के तहत उत्पादकों को ई–कचरा इकट्ठा करना होगा और अधिकृत रूप से रिसाइक्लिंग करनी होगी।
    • हालाँकि इस प्रकार के नियम वर्ष 2011 से ही लागू हैं, लेकिन वर्ष 2016 में इन मानदंडों को और मज़बूत बनाते हुए ई-कचरा इकट्ठा करने वाले श्रमिकों की सुरक्षा, स्वास्थ्य तथा कौशल विकास सुनिश्चित करने की भूमिका राज्य सरकारों को दे दी गई।
    • साथ ही नियमों के उल्लंघन की स्थिति में दण्ड का भी प्रावधान किया गया और केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को पूरे देश में एकल प्राधिकार दिया गया।
    • ई-कचरे में शामिल जहरीले तत्त्व तथा उनके निष्पादन के तौर-तरीकों से मानव स्वास्थ्य पर असर पड़ता है और तरह-तरह की बीमारियाँ होती हैं।

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