समसामयिकी सितम्बर : CURRENT AFFAIRS SEPTEMBER PART I

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‘प्रोजेक्ट इनसाइट’

‘प्रोजेक्ट इनसाइट’

    वित्त मंत्रालय के अंतर्गत आने वाला आयकर विभाग अक्टूबर 2017 से ‘प्रोजेक्ट इनसाइट’ शुरू करने जा रहा है। इसके तहत विभाग बड़े पैमाने पर डेटा विश्लेषण और सोशल साइटों पर मौजूद सूचनाओं को मिलाएगा, जिससे किसी व्यक्ति के खर्च के तरीके और घोषित आमदनी के बीच अंतर का पता लगाया जा सके।

प्रमुख तथ्य:

  • कर विभाग कर चोरी और काले धन को पकड़ने के लिए आय घोषणा तथा खर्च के तरीके में अंतर का विश्लेषण करेगा। किसी व्यक्ति की आय और संपत्ति का पता लगाने के लिए आयकर विभाग ने पैन को आधार से जोड़ना भी अनिवार्य कर दिया है।
  • कर विभाग ने पिछले साल प्रोजेक्ट इनसाइट के क्रियान्वयन के लिए एलएंडटी इन्फोटेक के साथ करार किया था। इसका मकसद कर अनुपालन में सुधार के लिए सूचनाओं को जुटाना है।
  • प्रोजेक्ट के तहत एक ऐसा वर्चुअल हाउस बनाने की तैयारी हो रही है, जिसके जरिए लोगों की खर्च करने की सीमा को बैंक अकाउंट के साथ-साथ सोशल मीडिया जैसे कि फेसबुक, इंस्टाग्राम से मैच किया जाएगा।

प्रोजेक्ट इनसाइट के लाभ:

  • सूचना प्रौद्योगिकी आधारित प्रोजेक्ट इनसाइट परियोजना से सूचना आधारित रुख को मजबूत करने में मदद मिलेगी और कर अनुपालन में सुधार होगा। ऊंची कीमत वाले खर्चों, लेनदेन का पता लगाने और कालेधन के प्रवाह पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी।
  • इस नए तकनीकी ढांचे का इस्तेमाल विदेशी खाता कर अनुपालन कानून (फाटका) और सामान्य रिपोर्टिंग मानक (सीआरएस) के लिए भी किया जाएगा। प्रोजेक्ट इनसाइट के तहत एक नया अनुपालन प्रबंधन केंद्रीयकृत प्रसंस्करण केंद्र (सीएमसीपीसी) स्थापित किया जाएगा।

सबसे बड़ा डेटाबेस:

  • ये प्रोजेक्ट पिछले सात सालों से तैयार हो रहा था। केंद्र सरकार ने इस पर 10 बिलियन (1000 करोड़) रुपये खर्च किए हैं। सरकार का मकसद इस प्रोजेक्ट के जरिए विश्व का सबसे बड़ा बॉयोमेट्रिक डाटाबेस तैयार कर रही है।
  • इस डाटाबेस से इनकम टैक्स, ईडी, बैंक, एनआईए को भी टैक्स चोरी रोकने में मदद मिलेगी। सरकार का मानना है कि काफी लोग अभी भी अपनी कमाई की सही तरह से जानकारी नहीं दे रहे हैं। वहीं लोग अपने घूमने-फिरने, घर-बाइक, कार खरीदने पर सबसे पहले सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं, जिससे अन्य लोगों को पता चल सके। अब सरकार के इस कदम से लोगों को काफी सावधानी बरतनी पड़ेगी।

अंतरिक्ष में कचरे को साफ करने के लिए विशेष यान का निर्माण कार्य जल्द पूरा होगा

  • अमेरिकी वैज्ञानिक अंतरिक्ष में मौजूद कचरे और मलबे को साफ करने के लिए विशेष यान विकसित करने में जुटे हैं। बाल से भी पतले इस यान में लगे अत्याधुनिक उपकरण अंतरिक्ष के कचरे को नष्ट करने में सक्षम होंगे। एयरोस्पेस कॉरपोरेशन की इस परियोजना को इनोवेटिव एडवांस्ड कॉनसेप्ट्स प्रोग्राम के तहत आर्थिक मदद दी जा रही है।
  • कृत्रिम उपग्रह और विभिन्न मिशन पर गए कुछ यान अभियान पूरा होने के बाद यूं ही पृथ्वी की कक्षा में चक्कर लगा रहे हैं। ये अंतरिक्ष यात्रियों और सेटेलाइट के लिए बेहद खतरनाक हैं। एयरोस्पेस कॉरपोरेशन इससे निपटने के लिए ब्रेने क्राफ्ट नामक नया यान विकसित कर रहा है। लचीले यान की मोटाई बाल से भी आधी है।
  • ‘यान को बुलेटप्रूफ बनाना पड़ेगा क्योंकि पांच माइक्रॉन व्यास वाले कणों के सिर्फ 10 माइक्रॉन मोटे यान में घुसने की आशंका रहेगी।’
  • इसमें लगे माइक्रोप्रोसेसर और डिजिटल उपकरण को इस तरह से विकसित किया जा रहा है कि एक के क्षतिग्रस्त होने पर दूसरा काम करता रहे। यह यान सौर सेल्स से चलेंगे। कंपनी एक साथ कई ब्रेने क्राफ्ट को अंतरिक्ष में भेजना चाहती है ताकि लागत को कम किया जा सके।

अंतरिक्ष में कचरे का खतरा:

  • विज्ञान की प्रगति के साथ एक के बाद एक देश अंतरिक्ष में अपने उपग्रह भेजने लगे हैं। इसके साथ ही वहां कूड़ा कचरा भी बढ़ने लगा है। इस समय कचरे का जो घनत्व है, उससे पांच साल में एक बार इन ऑर्बिट टक्कर होने की संभावना है। लेकिन जर्मनी में ईएसए के एक सम्मेलन में पेश की गई रिपोर्ट के अनुसार कचरे के बढ़ने से इस तरह की दुर्घटनाओं की संभावना बहुत बढ़ जाएगी।
  • इस शोध रिपोर्ट के अनुसार हर साल अंतरिक्ष से पांच से दस बड़ी वस्तुओं को हटाने की जरूरत है ताकि टक्कर के खतरे को कम करने के अलावा उससे पैदा होने वाले छोटे छोटे टुकड़ों के अंतरिक्ष में फैलने के जोखिम को भी कम किया जा सके। ये टुकड़े ज्यादा नुकसान कर सकते हैं।
  • वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 10 सेंटीमीटर से बड़े 29,000 टुकड़े पृथ्वी का चक्कर काट रहे हैं। ये टुकड़े 25,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से पृथ्वी की कक्षा में घूम रहे हैं जो यात्री विमानों की रफ्तार से 40 गुना ज्यादा है। इस रफ्तार पर छोटे से छोटा टुकड़ा भी विमान या उपग्रह जैसी चीज को नष्ट कर सकता है।
  • घूम रहे कचरे में इंसान द्वारा अंतरिक्ष में छोड़कर आया गया कचरा, रॉकेट लॉन्चरों के टुकड़े और निष्क्रिय पड़े उपग्रह और पिछली टक्करों में टूटे कल पुर्जे हैं। अंतरिक्ष के कचरे पर चल रही रिसर्च में विश्व भर की अंतरिक्ष एजेंसियां सहयोग कर रही हैं। यूरोपीय स्पेस एजेंसी ने 2012 में क्लीन स्पेस मुहिम शुरू की थी, जिसका लक्ष्य अंतरिक्ष से कचरे को हटाने और सुरक्षा बढ़ाने के लिए तकनीकी का विकास करना था।
  • हाल ही में जापान का अंतरिक्ष के कचरे को साफ करने का एक प्रयोग विफल हो चुका है। जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी के वैज्ञानिकों ने एक उपकरण से प्रयोग किया था। मछली पकड़ने वाले जाल बनाने वाली कंपनी की मदद से एक जाल बनाया गया था। वैज्ञानिक इस इलेक्ट्रोडायनमिक जाल की मदद से कूडे की गति को धीमा करके उसे निचली कक्षा में लाना चाहते थे। उम्मीद यह की जा रही थी कि पांच दशक की मानवीय गतिविधियों से अंतरिक्ष में जो भी कचरा जमा हुआ है उसे धीरे धीरे नीचे लाया जाए। जब वह पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करेगा तो जलकर नष्ट हो जाएगा।

वायु गुणवत्ता में सुधार होने से भारतीय जी सकते हैं लंबा जीवन

  • दिल्ली में यदि अशुद्ध हवा शुद्ध हो जाए और विश्व स्वास्थ्य संगठन के संबंधित मानकों को पूरा कर लिया जाए तो शहर के निवासियों की आयु में औसतन नौ साल की वृद्धि हो सकती है। यह बात एक अध्ययन में कही गई है।
  • यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में एनर्जी एंड पॉलिसी इंस्टिट्यूट द्वारा विकसित वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक (एक्यूएलआई) के अनुसार भारत में यदि राष्ट्रीय स्तर पर वायु गुणवत्ता के विश्व स्वास्थ्य संगठन मानकों को पूरा कर लिया जाए तो भारतीयों की आयु में औसतन चार साल की बढ़ोतरी हो सकती है।

प्रमुख तथ्य:

  • अध्ययन में हवा जनित कणीय पदार्थ प्रदूषण – पीएम 2.5 का संज्ञान लिया गया और देखा गया कि इसकी मात्रा में कमी से लोगों के जीवन चक्र पर क्या असर पड़ सकता है।
  • इसमें कहा गया कि यदि दिल्ली की हवा में पीएम 2.5 के संदर्भ में विश्व स्वास्थ्य संगठन के सालाना 10 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर (ug/m3) के मानक को पूरा कर लिया जाता है तो शहर के लोग नौ साल अधिक जी सकते हैं और यदि राष्ट्रीय राजधानी में 40 ug/m3 के राष्ट्रीय मानक को पूरा किया जाता है तो तब दिल्ली के लोग छह साल अधिक जी सकते हैं।
  • वाहनों और उद्योगों के प्रदाह से उत्पन्न पीएम 2.5 अत्यंत महीन पदार्थ कण होते हैं जिनका आकार 2.5 माइक्रोन से कम होता है। यह मानव की श्वसन प्रणाली और फिर रक्त प्रवाह में प्रवेश कर अपूरणीय क्षति पहुंचा सकते हैं।
  • एक्यूएलआई के अनुसार यदि भारत विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के वायु गुणवत्ता मानकों को पूरा करने के लिए अपने वायु प्रदूषण में कमी करता है तो देश के लोग औसतन लगभग चार साल अधिक और संयुक्त रूप से 4.7 अरब जीवन वर्ष से ज्यादा जी सकते हैं।
  • अध्ययन में कहा गया है, ‘‘दिल्ली जैसे बड़े शहरों में कुछ बड़े लाभ दिखेंगे। यदि देश अपने राष्ट्रीय मानकों को पूरा करता है तो लोग छह साल अधिक जी सकते हैं और यदि डब्ल्यूएचओ के मानकों को पूरा किया जाता है तो लोग नौ साल अधिक जी सकते हैं।’’ एनर्जी एंड पॉलिसी इंस्टिट्यूट के निदेशक माइकल ग्रीनस्टोन ने कहा कि एक्यूएलआई बताता है कि प्रदूषण कण मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा मौजूदा पर्यावरणीय जोखिम हैं। इनसे विश्व के कई हिस्सों में जीवन प्रत्याशा पर उसी तरह का असर पड़ता है जैसे दशकों तक सिगरेट पीने से पड़ता है।
  • विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों की सूची में दिल्ली का नंबर बहुत ऊपर है। शहर प्रदूषण से निपटने की तैयारी कर रहा है जो सर्दियों में खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है।

इको फ्रेंडली सीमेंट की जांच पूरी :

इको फ्रेंडली सीमेंट की जांच पूरी:

  • क्लाइमेट चेंज से लड़ते हुए इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी (आईआईटी) ने पहली बार एक सीमेंट इंडस्ट्री से साथ ऐसे खास सीमेंट का फुलस्केल प्रोडक्शन किया है, जो एनर्जी इमिशन 30% तक कम कर सकता है। आईआईटी की सिविल इंजिनियरिंग की टीम के इस सीमेंट का नाम है लाइमस्टोन कैल्साइंड क्ले सीमेंट (LC3)।
  • इस शोध में भारत को स्विट्ज़रलैंड ने सहयोग प्रदान किया है। वैश्विक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के लिए निर्माण क्षेत्र एक प्रमुख योगदानकर्ता है। हालांकि यह ज्ञात है कि, लगातार हो रहे निर्माण को कम करना मुश्किल है, खासकर भारत जैसे विकासशील देशों में अधिक बेहतर स्थितियों की स्थापना के लिए यही एक प्रमुख जरिया है। इसलिए उत्सर्जन कम करने के लिए लाइमस्टोन कैल्साइंड क्ले एक बेहतर विकल्प है।
  • शोध में सहयोगी संस्थाएं:

    • स्विट्जरलैंड के लुसाने शहर में स्थित स्विस फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (ईपीएफएल) में कैरन स्क्रीवेनेर प्रयोगशाला में दस वर्षों तक इस पर शोध किया गया। इस शोध में भागीदार आईआईटी दिल्ली, आईआईटी मद्रास और तारा (टेक्नोलॉजी एंड एक्शन फॉर रूरल डेवलपमेंट) हैं।
    • आईआईटी दिल्ली इस सीमेंट को लेकर जेके लक्ष्मी सीमेंट के साथ काम कर रहा है। इंस्टिट्यूट की टीम के रिसर्च वर्क पर कंपनी ने पिछले साल अपनी झज्जर यूनिट में सीमेंट का प्रोडक्शन किया था। यह कंपनी दुनिया की पहली कंपनी बन गई है, जिसने सीमेंट का फुलस्केल प्लांट ट्रायल प्रोडेक्शन किया है।

    किस प्रकार है लाभप्रद?

    • सीमेंट प्रोडक्शन के दौरान फ्यूल जलता है और लाइमस्टोन ऑक्साइड में बदलता है। इससे कार्बन डाइऑक्साइड बड़ी मात्रा में निकलती है। इस इमिशन से एनवायरनमेंट को काफी खतरा रहता है मगर आईआईटी एक्सपर्ट्स का कहना है कि LC3 इस इमिशन को काफी कम कर सकता है।
    • इस खास सीमेंट पर आईआईटी के इस प्रोजेक्ट को लीड कर रहे सिविल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के डॉ. शशांक बिश्नोई ने कहा, ‘यह एनवायरनमेंट के लिए काफी जरूरी मटीरियल है। इंडस्ट्री के साथ डायरेक्ट जुड़कर हमारी रिसर्च को काफी मजबूती मिली है। लाइमस्टोन कैल्साइंड क्ले सीमेंट बिल्डिंग मटीरियल के ट्रायल से साबित हुआ है कि इसके इस्तेमाल से कार्बन डाइऑक्साइड का इमिशन 30% तक कम हुआ है।’
    • किसी अकैडमिक इंस्टिट्यूशन और सीमेंट कंपनी के बीच यह पहला जॉइंट वेंचर है। इसके इस्तेमाल से दीवार, वॉल प्लास्टर, रोड पेवर्स में कीमत कम लगेगी। इंस्टिट्यूट कोशिश में है कि सरकार के साथ 2022 तक कम कीमत वाले और एनवायरमेंट फ्रेंडली घर बनाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाए।
    • इस सीमेंट पर काम करते हुए आईआईटी का कंक्रीट के लिए नया एडिटिव भी मिला है, जो मजबूती 20% बढ़ाएगा। इससे कंक्रीट में महंगा सीमेंट मिलाने की जरूरत कम होगी, जिससे कीमत भी कम आएगी।

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