प्रथम विश्वयुद्ध : FIRST WORLD WAR

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प्रथम विश्वयुद्ध (1914-18)

प्रस्तावना
प्रथम विश्वयुद्ध, विश्व स्तर पर लड़ा जाने वाला प्रथम प्रलयंकारी युद्ध था. इसमें विश्व के लगभग सभी प्रभावशाली राष्ट्रों ने भाग लिया. यह युद्ध मित्र राष्ट्रों (इंग्लैंड, फ्रांस, रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका, इटली, रूमानिया तथा उनके सहयोगी राष्ट्रों) और केंद्रीय शक्तियों (जर्मनी, ऑस्ट्रिया – हंगरी, तुर्की, बुल्गारिया इत्यादि) के बीच हुआ. प्रथम विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों की विजय और केंद्रीय शक्तियों की पराजय हुई.

प्रथम विश्व युद्ध के कारण

प्रथम विश्वयुद्ध के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे | इनमे निम्न्न्लिखित महत्वपूर्ण हैं:-
युरोपीय शक्ति – संतुलन का बिगड़ना-

    1871 में जर्मनी के एकीकरण के पूर्व युरोपीय राजनीती में जर्मनी की महत्वपूर्ण भूमिका नहीं थी, परन्तु बिस्मार्क के नेतृत्व में एक शक्तिशाली जर्मन राष्ट्र का उदय हुआ. इससे युरोपीय शक्ति – संतुलन गड़बड़ा गया. इंग्लैंड और फ्रांस के लिए जर्मनी एक चुनौती बन गया. इससे युरोपीय राष्ट्रों में प्रतिस्पर्धा की भावना बढ़ी.

गुप्त संधिया एवं गुटों का निर्माण-

    जर्मनी के एकीकरण के पश्चात वहां के चांसलर बिस्मार्क ने अपने देश को युरोपीय राजनीती में प्रभावशाली बनाने के लिए तथा फ्रांस को यूरोप की राजनीती में मित्रविहीन बनाए रखने के लिए गुप्त संधियों की नीतियाँ अपनायीं. उसने ऑस्ट्रिया- हंगरी (1879) के साथ द्वैत संधि (Dual Alliance) की. रूस (1881 और 1887) के साथ भी मैत्री संधि की गयी. इंग्लैंड के साथ भी बिस्मार्क ने मैत्रीवत सम्बन्ध बनाये. 1882 में उसने इटली और ऑस्ट्रिया के साथ मैत्री संधि की. फलस्वरूप , यूरोप में एक नए गुट का निर्माण हुआ जिसे त्रिगुट संधि (Triple Alliance) कहा जाता है. इसमें जर्मनी , ऑस्ट्रिया- हंगरी एवं इटली सम्मिलित थे. इंगलैंड और फ्रांस इस गुट से अलग रहे.

जर्मनी और फ्रांस की शत्रुता-

    जर्मनी एवं फ्रांस के मध्य पुरानी दुश्मनी थी. जर्मनी के एकीकरण के दौरान बिस्मार्क ने फ्रांस के धनी प्रदेश अल्सेस- लौरेन पर अधिकार कर लिया था. मोरक्को में भी फ़्रांसिसी हितो को क्षति पहुचाई गयी थी. इसलीये फ्रांस का जनमत जर्मनी के विरुद्ध था. फ्रांस सदैव जर्मनी को नीचा दिखलाने के प्रयास में लगा रहता था. दूसरी ओर जर्मनी भी फ्रांस को शक्तिहीन बनाये रखना चाहता था. इसलिए जर्मनी ने फ्रांस को मित्रविहीन बनाये रखने के लिए त्रिगुट समझौते किया| बदले में फ्रांस ने भी जर्मनी के विरुद्ध अपने सहयोगी राष्ट्रों का गुट बना लिया. प्रथम विश्वयुद्ध के समय तक जर्मनी और फ्रांस की शत्रुता इतनी बढ़ गयी की इसने युद्ध को अवश्यम्भावी बना दिया.

साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा

  • साम्राज्यवादी देशों का साम्राज्य विस्तार के लिए आपसी प्रतिद्वंदिता एवं हितों की टकराहट प्रथम विश्वयुद्ध का मूल कारण माना जा सकता है.
  • औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप कल-कारखानों को चलाने के लिए कच्चा माल एवं कारखानों में उत्पादित वस्तुओं की खपत के लिए बाजार की आवश्यकता पड़ी. फलस्वरुप साम्राज्यवादी शक्तियों इंग्लैंड फ्रांस और रूस ने एशिया और अफ्रीका में अपने-अपने उपनिवेश बनाकर उन पर अधिकार कर लिए थे.
  • जर्मनी और इटली जब बाद में उपनिवेशवादी दौड़ में सम्मिलित हुए तो उन के विस्तार के लिए बहुत कम संभावना थी. अतः इन देशों ने उपनिवेशवादी विस्तार की एक नई नीति अपनाई. यह नीति थी दूसरे राष्ट्रों के उपनिवेशों पर बलपूर्वक अधिकार कर अपनी स्थिति सुदृढ़ करने की.
  • प्रथम विश्वयुद्ध आरंभ होने के पूर्व तक जर्मनी की आर्थिक एवं औद्योगिक स्थिति अत्यंत सुदृढ़ हो चुकी थी. अतः जर्मन सम्राट धरती पर और सूर्य के नीचे जर्मनी को समुचित स्थान दिलाने के लिए व्यग्र हो उठा. उसकी थल सेना तो मजबूत थी ही अब वह एक मजबूत जहाजी बेड़ा का निर्माण कर अपने साम्राज्य का विकास तथा इंग्लैंड के समुद्र पर स्वामित्व को चुनौती देने के प्रयास में लग गया.
  • 1911 में आंग्ल जर्मन नाविक प्रतिस्पर्धा के परिणाम स्वरुप अगादिर का संकट उत्पन्न हो गया. इसे सुलझाने का प्रयास किया गया परंतु यह विफल हो गया. 1912 में जर्मनी में एक विशाल जहाज इमपरेटर बनाया गया जो उस समय का सबसे बड़ा जहाज था.फलतः जर्मनी और इंग्लैंड में वैमनस्य एवं प्रतिस्पर्धा बढ़ गई.
  • इसी प्रकार मोरक्को तथा बोस्निया संकट ने इंग्लैंड और जर्मनी की प्रतिस्पर्धा को और बढ़ावा दिया.
  • अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने के लिए जब पतनशील तुर्की साम्राज्य की अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से जर्मनी ने वर्लीन बगदाद रेल मार्ग योजना बनाई तो इंग्लैंड फ्रांस और रूस ने इसका विरोध किया. इससे कटुता बढ़ी.

सैन्यवाद

    साम्राज्यवाद के समान सैन्यवाद ने भी प्रथम विश्वयुद्ध को निकट ला दिया. प्रत्येक राष्ट्र अपनी सुरक्षा एवं विस्तारवादी नीति को कार्यान्वित करने के लिए अस्त्र शस्त्रों के निर्माण एवं उनकी खरीद बिक्री में लग गया. अपने अपने उपनिवेशों की सुरक्षा के लिए भी सैनिक दृष्टिकोण से मजबूत होना आवश्यक हो गया. फलतः युद्ध के नए अस्त्र-शस्त्र बनाए गए. राष्ट्रीय आय का बहुत बड़ा भाग अस्त्र शस्त्रों के निर्माण एवं सैनिक संगठन पर खर्च किया जाने लगा. उदाहरण के लिए फ्रांस जर्मनी और अन्य प्रमुख राष्ट्र अपनी आय का 85% सैन्य व्यवस्था पर खर्च कर रहे थे. अनेक देशों में अनिवार्य सैनिक सेवा लागू की गई. सैनिकों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि की गई. सैनिक अधिकारियों का देश की राजनीति में वर्चस्व हो गया. इस प्रकार पूरा यूरोप का बारूद के ढेर पर बैठ गया. बस विस्फोट होने की देरी थी यह विस्फोट 1914 में हुआ.

उग्र राष्ट्रवाद

  • उग्र अथवा विकृत राष्ट्रवाद भी प्रथम विश्वयुद्ध का एक मौलिक कारण बना.
  • यूरोप के सभी राष्ट्रों में इसका समान रूप से विकास हुआ. यह भावना तेजी से बढ़ती गई की समान जाति, धर्म, भाषा, और ऐतिहासिक परंपरा के व्यक्ति एक साथ मिल कर रहे और कार्य करें तो उनकी अलग पहचान बनेगी और उनकी प्रगति होगी.
  • पहले भी इस आधार पर जर्मनी और इटली का एकीकरण हो चुका था. बाल्कन क्षेत्र में यह भावना अधिक बलवती थी. बाल्कन प्रदेश तुर्की साम्राज्य के अंतर्गत था. तुर्की साम्राज्य के कमजोर पड़ने पर इस क्षेत्र में स्वतंत्रता की मांग जोर पकड़ने लगी. तुर्की साम्राज्य तथा ऑस्ट्रिया हंगरी के अनेक क्षेत्रों में स्लाव प्रजाति के लोगों का बाहुल्य था. वह अलग स्लाव राष्ट्र की मांग कर रहे थे.
  • रूस का यह मानना था कि ऑस्ट्रिया-हंगरी एवं तुर्की से स्वतंत्र होने के बाद स्लाव रूस के प्रभाव में आ जाएंगे. इसलिए रूस ने अखिल स्लाव अथवा सर्वस्लाववाद आंदोलन को बढ़ावा दिया. इससे रूस और ऑस्ट्रिया – हंगरी के संबंध कटु हुए.
  • इसी प्रकार सर्वजर्मन आंदोलन भी चला. सर्व, चेक तथा पोल प्रजाति के लोग भी स्वतंत्रता की मांग कर रहे थे. इससे यूरोपीय राष्ट्रों में कटुता की भावना बढ़ती गई

अंतर्राष्ट्रीय संस्था का अभाव

    प्रथम विश्व युद्ध के पूर्व ऐसी कोई संस्था नहीं थी जो साम्राज्यवाद सैन्यवाद और उग्र राष्ट्रवाद पर नियंत्रण लगाकर विभिन्न राष्ट्रों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखें. प्रत्येक राष्ट्र स्वतंत्र रुप से अपनी मनमानी कर रहा था इससे यूरोप राजनीति में एक प्रकार की अराजक स्थिति व्याप्त गई.

जनमत एवं समाचार पत्र

    प्रथम विश्वयुद्ध के लिए तत्कालीन जनमत भी कम उत्तरदाई नहीं था. प्रत्येक देश के राजनीतिज्ञ दार्शनिक और लेखक अपने लेखों में युद्ध की वकालत कर रहे थे. पूंजीपति वर्ग भी अपने स्वार्थ में युद्ध का समर्थक बन गया युद्धोन्मुखी जनमत तैयार करने में सबसे अधिक महत्वपूर्ण भूमिका समाचार पत्रों की थी. प्रत्येक देश का समाचार पत्र दूसरे राष्ट्र के विरोध में झूठा और भड़काऊ लेख प्रकाशित करता था. इससे विभिन्न राष्ट्रों एवं वहां की जनता में कटुता उत्पन्न हुई. समाचार पत्रों के झूठे प्रचार ने यूरोप का वातावरण विषाक्त कर युद्ध को अवश्यंभावी बना दिया.

तत्कालीन कारण

    प्रथम विश्वयुद्ध का तात्कालिक कारण बना ऑस्ट्रिया की युवराज आर्क ड्यूक फ्रांसिस फर्डिनेंड की बोस्निया की राजधानी सेराजेवो में हत्या. 28 जून 1914 को एक आतंकवादी संगठन काला हाथ से संबंध सर्व प्रजाति के एक बोस्नियाई युवक ने राजकुमार और उनकी पत्नी की गोली मारकर हत्या कर दी. इससे सारा यूरोप स्तब्ध हो गया. ऑस्ट्रिया ने इस घटना के लिए सर्विया को उत्तरदाई माना. ऑस्ट्रिया ने सर्बिया को धमकी दी कि वह 48 घंटे के अंदर इस संबंध में स्थिति स्पष्ट करें तथा आतंकवादियों का दमन करे. सर्बिया ने ऑस्ट्रिया की मांगों को ठुकरा दिया. परिणामस्वरूप 28 जुलाई 1914 को ऑस्ट्रिया ने सर्बिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी. इसके साथ ही अन्य राष्ट्र भी अपने अपने गुटों के समर्थन में युद्ध में सम्मिलित हो गए. इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध आरंभ हुआ.

प्रथम विश्वयुद्ध का उत्तरदायित्व

  • प्रथम विश्वयुद्ध का उत्तरदायित्व किस पर था यह निश्चित करना कठिन है. युद्ध में सम्मिलित कोई भी पक्ष युद्ध के लिए अपने को उत्तरदाई नहीं मानता था .इसके विपरीत सभी का तर्क था कि उन्होंने शांति व्यवस्था बनाए रखने की चेष्टा की परंतु शत्रु राष्ट्र की नीतियों के कारण युद्ध हुआ. वर्साय संधि की एक धारा में यह उल्लेख किया गया था कि युद्ध के लिए उत्तरदाई जर्मनी और उसके सहयोगी राष्ट्र थे. यह मित्र राष्ट्रों का एक पक्षीय निर्णय था.
  • वस्तुतः प्रथम विश्वयुद्ध के लिए सभी राष्ट्र उत्तरदाई थे सिर्फ जर्मनी ही इसके लिए जवाब देह नहीं था. सर्बिया ने ऑस्ट्रिया की जायज़ मांगों को ठुकराकर युद्ध का आरंभ करवा दिया. ऑस्ट्रिया ने युद्ध की घोषणा कर रूस को सैनिक कार्रवाई के लिए बाध्य कर दिया.
  • सर्बिया के प्रश्न पर रूस ने भी जल्दबाजी की. सर्बिया की समस्या को कूटनीतिक स्तर पर हल करने की विपरीत उसने इसका समाधान सैनिक कार्यवाही द्वारा करने का निर्णय किया. जर्मनी की मजबूरी यह थी कि वह अपने मित्र राष्ट्र ऑस्ट्रिया का साथ नहीं छोड़ सकता था. रूस, फ्रांस और इंग्लैंड जर्मनी के घोर शत्रु थे. रूस द्वारा सैनिक कार्यवाही आरंभ होने पर जर्मनी शांत बैठा नहीं रह सकता था.
  • फ्रांस और रूस पर नियंत्रण रखना उसके लिए आवश्यक था. फ्रांस ने अपनी ओर से रूस को रोकने का प्रयास नहीं किया. बल्कि इसके विपरीत ऑस्ट्रिया विरोधी अभियान में रूस को पूरा समर्थन देने का आश्वासन दिया. इससे सर्विया जैसा छोटा राष्ट्र ऑस्ट्रिया, जर्मनी से युद्ध करने को तत्पर हो उठा.
  • इंग्लैंड ने भी युद्ध की स्थिति को टालने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया. उसने अपने सहयोगी राष्ट्रों को भी युद्ध से अलग रहने के लिए नहीं कहा. फलतः दोनों गुटों के राष्ट्र युद्ध में सम्मिलित होते गए. कोई यह अनुमान नहीं लगा सका की एक छोटा युद्ध विश्व युद्ध में परिणत हो जाएगा.
    इस प्रकार प्रथम विश्वयुद्ध के लिए सभी राष्ट्र उत्तरदायी थे इसके लिए किसी एक राष्ट्र को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता है.

प्रथम विश्वयुद्ध की प्रमुख घटनाएं

युद्ध का आरंभिक चरण

    28 जुलाई 1914 को ऑस्ट्रिया द्वारा सर्बिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा होते ही युद्ध का बिगुल बज गया. रूस ने सर्बिया के समर्थन में और जर्मनी ने ऑस्ट्रिया के समर्थन में सैनिक कारवाई आरंभ कर दी. रूस के समर्थन में इंग्लैंड और फ्रांस आ गए. जापान ने भी जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी. जर्मन सेना बेल्जियम को रौंदते हुए फ्रांस की राजधानी पेरिस के निकट पहुंच गई. इसी समय जर्मनी और ऑस्ट्रिया पर रूसी आक्रमण हुआ. इससे जर्मनी ने अपनी सेना की एक टुकड़ी पूर्वी मोर्चे पर रूस के प्रसार को रोकने के लिए भेज दिया. इससे फ्रांस सुरक्षित हो गया और पेरिस नगरी बच गई. पश्चिम एशिया में फिलिस्तीन, मेसोपोटामिया और अरब राष्ट्रों में तुर्की और जर्मनी के विरुद्ध अभियान हुए. सुदूरपूर्व में जापान ने जर्मनी अधिकृत क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया.इंग्लैंड तथा फ्रांस ने अफ्रीका के अधिकांश जर्मन उपनिवेशों पर अधिकार कर लिया.

संयुक्त राज्य अमेरिका का युद्ध में सम्मिलित होना

    1917 तक संयुक्त राज्य अमेरिका मित्र राष्ट्रों से सहानुभूति रखते हुए भी युद्ध में तथस्त रहा. 1915 में जर्मनी के एक ब्रिटिश जहाज लुसितानिया को डुबो दिया जिससे अमेरिकी यात्री भी सवार थे. इस घटना के बाद अमेरिका शांत नहीं रह सका. उसने 6 अप्रैल 1917 को जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी. अमेरिका द्वारा युद्ध में शामिल होने से युद्ध का पासा पलट गया.

सोवियत संघ का युद्ध से अलग होना-

    1917 में जहां अमेरिका युद्ध में शामिल हुआ, वहीं सोवियत संघ युद्ध से अलग हो गया. 1917 की बोल्शेविक क्रांति के बाद लेनिन के नेतृत्व वाली सरकार ने युद्ध से अलग होने का निर्णय ले लिया. सोवियत संघ ने जर्मनी से संधि कर ली और युद्ध से अलग हो गया.

युद्ध का निर्णायक चरण-

    अप्रैल 1917 में अमेरिका प्रथम विश्व युद्ध में सम्मिलित हुआ. इसके साथ ही घटनाचक्र तेजी से चला. केंद्रीय शक्तियों की पराजय और मित्र राष्ट्रों की विजय की श्रृंखला आरंभ हुई. बाध्य होकर अक्टूबर-नवंबर 1918 में क्रमशः तुर्की और ऑस्ट्रिया ने आत्मसमर्पण कर दिया. जर्मनी अकेला पड़ गया. युद्ध में पराजय और आर्थिक संकट से जर्मनी में विद्रोह की स्थिति उत्पन्न हो गई. इस स्थिति में जर्मन सम्राट कैज़र विलियम द्वितीय को गद्दी त्यागनी पड़ी. वह भाग कर हालैंड चला गया. जर्मनी में वेमर गणतंत्र की स्थापना हुई. नई सरकार ने 11 नवंबर 1918 को युद्धविराम के घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किया. इसके साथ ही प्रलयंकारी प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त हुआ.

प्रथम विश्वयुद्ध की विशेषताएं-

1914-18 के युद्ध को अनेक कारणों से प्रथम विश्वयुद्ध कहा जाता है| इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित थी-

  • यह प्रथम युद्ध था जिसमें विश्व के लगभग सभी शक्तिशाली राष्ट्रों ने भाग लिया| यह यूरोप तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि एशिया अफ्रीका और सुदूर पूर्व में भी लड़ा गया ऐसा व्यापक युद्ध पहली बार हुआ था| इसलिए 1914 -18 का युद्ध प्रथम विश्वयुद्ध कहलाया
  • यह युद्ध जमीन के अतिरिक्त आकाश और समुद्र में भी लड़ा गया
  • इस युद्ध में नय मारक और विध्वंसक अस्त्र-शस्त्रों एवं युद्ध के अन्य साधनों का उपयोग किया गया था| इसमें मशीन गन तथा तरल अग्नि का पहली बार व्यवहार किया गया बम बरसाने के लिए हवाई जहाज का उपयोग किया गया इंग्लैंड में टैंक और जर्मनी ने यू बोट पनडुब्बियों का बड़े स्तर पर व्यवहार किया|
  • प्रथम विश्वयुद्ध में सैनिकों के अतिरिक्त सामान्य जनता ने भी सहायक सेना के रूप में युद्ध में भाग लिया|
  • इस युद्ध में सैनिकों और नागरिकों का जितने बड़े स्तर पर संहार हुआ वैसा पहले के किसी युद्ध में नहीं हुआ था
  • इस युद्ध में स्पष्ट रूप से यह दिखा दिया कि वैज्ञानिक आविष्कारों का दुरुपयोग मानवता के लिए कितना घातक हो सकता है.

इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध को विश्व इतिहास में एक युगांतकारी घटना माना जा सकता है.

पेरिस शांति सम्मेलन

    नवंबर 1918 में विश्वयुद्ध की समाप्ति के पश्चात विजित राष्ट्रों ने पेरिस में एक शांति सम्मेलन का आयोजन जनवरी 1919 में किया. इसके पूर्व जनवरी 1918 में अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने अपना 14 सूत्री योजना प्रस्तुत किया. इसमें विश्वशांति स्थापना के तत्व निहित थे.

    • इसमें गुप्त संधियों को समाप्त करने,
    • समुद्र की स्वतंत्रता को बनाए रखने,
    • आर्थिक प्रतिबंधों को समाप्त करने,
    • अस्त्र-शस्त्रों को कम करने,
    • शांति स्थापना के लिए विभिन्न राष्ट्रों का संगठन बनाने,
    • रूसी क्षेत्र को मुक्त करने फ्रांस को अल्सेस- लॉरेन देने,
    • सर्बिया को समुद्र तक मार्ग देने,
    • तुर्की साम्राज्य के गैर तुर्कों को स्वायत्त शासन का अधिकार देने,
    • स्वतंत्र पोलैंड का निर्माण, करने जैसे सुझाव दिए गए.

    पेरिस शांति सम्मेलन में इन्हें स्थान दिया गया. पेरिस शांति सम्मेलन में सभी विजय राष्ट्रों के राजनयिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया रूस और पराजित राष्ट्रों को इस सम्मेलन में आमंत्रित नहीं किया गया. सम्मेलन में 27 देशों ने भाग लिया सम्मेलन के निर्णयों पर अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन इंग्लैंड के प्रधानमंत्री लॉयड जॉर्ज तथा फ्रांस के प्रधानमंत्री जॉर्ज क्लिमेंसू का प्रभाव था.
    इस सम्मेलन में पराजित राष्ट्रों के साथ अलग-अलग पांच संधियाँ की गई. यह संधियाँ थी—

      (1) सेंट जर्मन की संधि
      (2) त्रियानो की संधि
      (3) निऊली की संधि
      (4) वर्साय की संधि तथा
      (5) सेवर्स की संधि |

    पहली संधि ऑस्ट्रिया के साथ दूसरी हंगरी के साथ तीसरी बुल्गेरिया के साथ चौथी जर्मनी और अंतिम तुर्की के साथ की गई इन संधियों ने यूरोप का मानचित्र बदल दिया.

सेंट जर्मेन की संधि
1919 के द्वारा ऑस्ट्रिया को अपना औद्योगिक क्षेत्र बोहेमिया तथा मोराविया चेकोस्लोवाकिया को बोस्निया और हर्जेगोविना सर्बिया को देना पड़ा. इसके साथ मांटिनिग्रो को मिलाकर युगों स्लोवाकिया का निर्माण किया गया. पोलैंड का पुनर्गठन हुआ. ऑस्ट्रिया का कुछ क्षेत्र इटली को भी दिया गया.

त्रियानो की संधि 1920 के अनुसार स्लोवाकिया तथा रुथेनिया, चेकोस्लोवाकिया को दिया गया. युगोस्लाविया तथा रोमानिया को भी अनेक क्षेत्र दिए गए. इन संधियों के परिणामस्वरुप ऑस्ट्रिया हंगरी की राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिति अत्यंत दुर्बल हो गई.

निऊली की संधि 1919 ने बुल्गेरिया का अनेक क्षेत्र यूनान, युगोस्लाविया और रोमानिया को दे दिया.

सेवर्स की संधि 1920 के द्वारा ऑटोमन साम्राज्य विखंडित कर दिया गया. इसके अनेक क्षेत्र यूनान और इटली को दे दिए गए. फ्रांस को सीरिया तथा पैलेस्तीन, इराक और ट्रांसजॉर्डन को ब्रिटिश मैंडेट के अंतर्गत कर दिया गया. इससे तुर्की में विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी. इन सभी संधियों में सबसे अधिक व्यापक और प्रभावशाली वर्साय की संधि 1919 थी जो जर्मनी के साथ की गई

वर्साय की संधि
इस संधि में 440 धाराएं थी. इसने जर्मनी को राजनीतिक सैनिक और आर्थिक दृष्टिकोण से पंगु बना दिया. संधि के मुख्य प्रावधान अग्रलिखित थे —-

  • जर्मनी और उसके सहयोगी राष्ट्रों को युद्ध के लिए दोषी मानकर उनकी घोर निंदा की गई. साथ ही, मित्र राष्ट्रों को युद्ध में जो क्षति उठानी पड़ी थी उसके लिए हर्जाना देने का भार जर्मनी पर थोपा गया.
  • 1870 में जर्मनी द्वारा फ्रांस के विजित अलसेस और लॉरेन प्रांत फ्रांस को वापस दे दिए गए. इसके अतिरिक्त जर्मनी का सार प्रदेश जो लोहे और कोयले की खानों से भरा था, 15 वर्षों के लिए फ्रांस को दिया गया.
  • जर्मनी की पूर्वी सीमा पर का अधिकांश भाग पोलैंड को दे दिया गया. समुद्र तट तक पोलैंड को पहुंचने के लिए जर्मनी के बीचोबीच एक विस्तृत भू भाग निकालकर पोलैंड को दिया गया. यह क्षेत्र पोलिस गलियारा कहलाया.
  • डाजिंग और मेमेल बंदरगाह राष्ट्र संघ के अधीन कर दिए गए. कुल मिलाकर जर्मनी को अपने 13 प्रतिशत भू-भाग और 10% आबादी से हाथ धोना पड़ा.
  • जर्मनी के निरस्त्रीकरण की व्यवस्था की गई. जर्मन सेना की अधिकतम सीमा एक लाख निश्चित की गई. युद्ध उपयोगी सामानों के उत्पादन पर प्रतिबंध लगा दिया गया.
  • जर्मनी के सभी नौसैनिक जहाज जप्त कर उसे सिर्फ छह युद्ध पोत रखने का अधिकार दिया गया. पनडुब्बियों और वायुयान रखने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया.
  • राइन नदी के बाएं किनारे पर 31 मिल तक के भू भाग का पूर्ण असैनिकीकरण कर इसे 15 वर्षों के लिए मित्र राष्ट्रों के नियंत्रण में दे दिया गया.
  • जर्मनी के सारे उपनिवेश मित्र राष्ट्रों ने आपस में बांट लिए. दक्षिण पश्चिम अफ्रीका और पूर्वी अफ्रीका की उपनिवेशों को इंग्लैंड, बेल्जियम, पुर्तगाल और दक्षिण अफ्रीका को दे दिया गया. तोगोलैंड और कैमरून पर फ्रांस में अधिकार कर लिया. प्रशांत महासागर क्षेत्र तथा चीन के जर्मन अधिकृत क्षेत्र जापान को मिले.

वर्साय की संधि जर्मनी के लिए अत्यंत कठोर और अपमानजनक थी. इसकी शर्तें विजय राष्ट्रों द्वारा एक विजित राष्ट्र पर जबरदस्ती और धमकी देकर लादी गई थी. जर्मनी ने इसे विवशता में स्वीकार किया उसने इस संधि को अन्यायपूर्ण कहा जर्मनी को संधि पर हस्ताक्षर करने को विवश किया गया. चूँकि उसने स्वेच्छा से इसे कभी भी स्वीकार नहीं किया. इसलिए वर्साय की संधि को आरोपित संधि कहते हैं जर्मन नागरिक इसे कभी स्वीकार नहीं कर सके. संधि के विरुद्ध जर्मनी में प्रबल जनमत बन गया. हिटलर और नाजी दल ने वर्साय की संधि के विरुद्ध जनमत को अपने पक्ष में कर सत्ता हथिया ली. शासन में आते ही उसने संधि की व्यवस्था को नकार कर अपनी शक्ति बढ़ानी आरंभ कर दी इसकी परिणति द्वितीय विश्व युद्ध में हुई इसलिए कहा जाता है कि वर्साय की संधि में द्वितीय विश्वयुद्ध के बीज निहित थे

प्रथम विश्व युद्ध के परिणाम

परिणामों के दृष्टिकोण से प्रथम विश्वयुद्ध को विश्व इतिहास का एक परिवर्तन बिंदु माना गया है. इसके अनेक तत्कालीन और दूरगामी परिणाम हुए. इस युद्ध का प्रभाव राजनीतिक, सैनिक, सामाजिक और अर्थव्यवस्था पर पड़ा—

राजनीतिक परिणाम

साम्राज्य का अंत

  • प्रथम विश्वयुद्ध में जिन बड़े साम्राज्य में केंद्रीय शक्तियों के साथ भाग लिया था उनका युद्ध के बाद पतन हो गया.
  • पेरिस शांति सम्मेलन के परिणाम स्वरुप ऑस्ट्रिया हंगरी सम्राज्य बिखर गया.
  • जर्मनी में होहेंज्जोर्लन और ऑस्ट्रिया हंगरी में हप्स्वर्ग राजवंश का शासन समाप्त हो गया. वहां गणतंत्र की स्थापना हुई.
  • इसी प्रकार 1917 में रूसी क्रांति के परिणाम स्वरुप रूस में रोमोनोव राजवंश की सत्ता समाप्त हो गई एवं गणतंत्र की स्थापना हुई.
  • तुर्की का ऑटोमन साम्राज्य भी समाप्त हो गया उसका अधिकांश भाग यूनान और इटली को दे दिया गया.

विश्व मानचित्र में परिवर्तन

  • प्रथम विश्वयुद्ध के बाद विश्व मानचित्र में परिवर्तन आया. साम्राज्यों के विघटन के साथ ही पोलैंड ,चेकोस्लोवाकिया, युगोस्लाविया जैसे नए राष्ट्रों का उदय हुआ.
  • ऑस्ट्रिया, जर्मनी, फ्रांस और रूस की सीमाएं बदल गई.
  • बाल्टिक साम्राज्य, रूसी साम्राज्य से स्वतंत्र कर दिए गए.
  • एशियाई और अफ्रीकी उपनिवेशों पर मित्र राष्ट्रों का अधिकार करने से वहां भी परिस्थिति बदली. इसी प्रकार जापान को भी अनेक नए क्षेत्र प्राप्त हुए. इराक को ब्रिटिश एवं सीरिया को फ्रांसीसी संरक्षण में रख दिया गया.
  • फिलिस्तीन, इंग्लैंड को दे दिया गया.

सोवियत संघ का उदय

    प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान रूस में 1917 में बोल्शेविक क्रांति हुई. इसके परिणाम स्वरुप रूसी साम्राज्य के स्थान पर सोवियत संघ का उदय हुआ. जारशाही का स्थान समाजवादी सरकार ने ले लिया.

उपनिवेशों में जागरण

    युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों ने घोषणा की थी की युद्ध समाप्त होने पर अंतिम निर्णय के सिद्धांत को लागू किया जाएगा. इससे अनेक उपनिवेशों और पराधीन देशों में स्वतंत्रता प्राप्त करने की भावना बलवती हुई.प्रत्येक उपनिवेश में राष्ट्रवादी आंदोलन आरंभ हो गए. भारत में भी महात्मा गांधी के नेतृत्व में 1917 से स्वतंत्रता संग्राम का निर्णायक चरण आरंभ हुआ.

विश्व राजनीति पर से यूरोप का प्रभाव कमजोर पड़ना

    युद्ध के पूर्व तक विश्व राजनीति में यूरोप का अग्रणी भूमिका थी. जर्मनी, फ्रांस, इंग्लैंड और रूस के इर्द-गिर्द विश्व राजनीति घूमती थी. परंतु 1918 के बाद यह स्थिति बदल गई योधोत्तर काल में अमेरिका का दबदबा बढ़ गया.

अधिनायकवाद का उदय

  • प्रथम विश्व युद्ध के परिणाम स्वरुप अधिनायकवाद का उदय हुआ.
  • वर्साय की संधि का सहारा लेकर जर्मनी में हिटलर और उसकी नाजी पार्टी ने सत्ता हथिया ली.
  • नाजीवाद ने एक नया राजनीतिक दर्शन दिया इससे सारी सत्ता एक शक्तिशाली नेता के हाथों में केंद्रित कर दी गई.
  • जर्मनी के समान इटली में भी मुसोलिनी के नेतृत्व में फासीवाद का उदय हुआ. इटली भी पेरिस सम्मेलन से असंतुष्ट था. अतः मित्र राष्ट्रों के प्रति इटली की कटुता बढ़ती गई. हिटलर के सामान और मुसोलिनी में भी सारी सत्ता अपने हाथों में केंद्रित कर ली.

द्वितीय विश्वयुद्ध का बीजारोपण

    प्रथम विश्वयुद्ध ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बीच भी बो दिए. पराजित राष्ट्रों के साथ जिस प्रकार का व्यवहार किया गया इससे वह अपने को अपमानित समझने लगे. उन राष्ट्रों में पुनः उग्र राष्ट्रीयता प्रभावी बन गई प्रत्येक राष्ट्र एक बार फिर से अपने को संगठित कर अपनी शक्ति बढ़ाने लगा एक एक कर संधि की शर्तों को जोड़ा जाने लगा. इससे विश्व एक बार फिर से बारूद के ढेर पर बैठ गया इसकी अंतिम परिणति द्वितीय विश्वयुद्ध में हुई.

विश्व शांति की स्थापना का प्रयास प्रथम

    विश्वयुद्ध में जन्मदिन की भारी क्षति को देखकर भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति को रोकने के लिए तत्कालीन राजनीतिज्ञों ने प्रयास आरंभ कर दिए अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन कि इसमें प्रमुख भूमिका थी फलतः 1919 में राष्ट्र संघ की स्थापना की गई इसका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय विवादों का शांतिपूर्ण ढंग से समाधान कर युद्ध की विभीषिका को रोकने का प्रयास करना था दुर्भाग्यवश राष्ट्र संघ अपने उद्देश्यों में विफल रहा.

सैन्य परिणाम

    पेरिस सम्मेलन में पराजित राष्ट्र की सैन्य शक्ति को कमजोर करने के लिए निरस्त्रीकरण की व्यवस्था की गई. इस नीति का सबसे बड़ा शिकार जर्मनी हुआ .विजित राष्ट्रों ने अपनी सैन्य शक्ति में वृद्धि करनी आरंभ कर दी इस से पराजित राष्ट्रों में भय की भावना जगी. अतः वे भी अपने को मजबूत करने के प्रयास में लग गए इससे हथियारबंदी की होड़ आरंभ हो गई जिसका विश्व शांति पर बुरा प्रभाव पड़ा.

आर्थिक परिणाम

जन धन की अपार क्षति
प्रथम विश्वयुद्ध एक प्रलयंकारी युद्ध था. इसमें लाखों व्यक्ति मारे गए.अरबों की संपत्ति नष्ट हुई. इसका सामाजिक आर्थिक व्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ा. हजारों कल कारखाने बंद हो गए. कृषि उद्योग और व्यापार नष्ट प्राय हो गए. बेकारी और भुखमरी की समस्या उठ खड़ी हुई.

आर्थिक संकट
प्रथम विश्वयुद्ध ने विश्व में आर्थिक संकट उत्पन्न कर दिया. वस्तुओं के मूल्य बढ़ गए मुद्रा स्थिति की समस्या उठ खड़ी हुई. फलतः संपूर्ण विश्व में आर्थिक अव्यवस्था व्याप्त गई ऋण का भाड़ बढ़ने से जनता पर करो का बोझ बढ़ गया

सरकारी आर्थिक नीतियों में परिवर्तन

    तत्कालीन परिस्थितियों के वशीभूत होकर प्रत्येक राष्ट्र ने अपनी आर्थिक नीति में परिवर्तन किया. नियोजित अर्थव्यवस्था लागू की गई. सरकारी अनुमति के बिना कोई नया व्यवसाय आरंभ नहीं किया जा सकता था. घाटे में चल रहे उद्योगों विशेषता युद्ध उपयोगी सामान बनाने वाले उद्योगों को राजकीय संरक्षण देने की नीति अपनाई गई. विदेशी व्यापार पर राज्य का एकाधिकार स्थापित किया गया. प्रत्येक राष्ट्र को विशेषतः जर्मनी को आर्थिक आत्मनिर्भरता की नीति अपनानी पड़ी. गैर-यूरोपीय राष्ट्र में लगाई जाने वाली पूजी में भारी कमी की गई

सामाजिक परिणाम

नस्लों की समानता
युद्ध के पूर्व यूरोपियन नस्लभेद अथवा काला गोरा के विभेद पर अधिक बल देते थे. वह एशिया अफ्रीका के काले लोगों को अपने से ही मानते थे. परंतु युद्ध में उनकी वीरता देखकर उन्हें अपनी धारणा बदलनी पड़ी. धीरे धीरे काला गोरा का भेद कम होने लगा.

जनसंख्या की क्षति

    युद्ध में लाखों लोग मरे तथा घायल हुए. इनमे ज्यादा संख्या पुरुषों की थी. इसलिए पुरुष स्त्री लिंग अनुपात में भारी कमी आई. युद्ध के दौरान जनसंख्या की बढ़ोतरी दर में कमी आई. परंतु युद्ध के बाद इस में तेजी से वृद्धि हुई.

स्त्रियों की स्थिति में सुधार

    विश्वयुद्ध के दौरान अधिकांश पुरुषों के सेना में भर्ती होने से स्त्रियों को घर से बाहर आकर काम करने का अवसर मिला. वह कारखानों, दुकानों, अस्पतालों, स्कूलों और दफ्तर में काम करने लगी. अतः उन में नवजागरण आया. वे अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो गई. अपने अधिकारों के लिए महिलाओं ने आंदोलन चलाए, फलतः उन्हें सीमित मताधिकार मिला. 1918 में इंग्लैंड ने पहली बार महिलाओं को सीमित मताधिकार दिया.

मजदूरों की स्थिति में सुधार

    युद्ध काल में युद्ध सामग्री के उत्पादन में मजदूरों की महत्वपूर्ण भूमिका थी. इसलिए उनका महत्व बढ़ गया. उन्हें उचित मजदूरी और आवश्यक सुविधाएं देने की व्यवस्था की गई. इससे मजदूरों की स्थिति में सुधार हुआ अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की स्थापना की गई.

सामाजिक मान्यताओं में बदलाव

    प्रथम विश्व युद्ध के परिणाम स्वरुप प्रचलित सामाजिक मान्यताओं में भी परिवर्तन आया. वर्ग और संपत्ति का विभेद कमजोर हुआ. मुनाफा खोर और चोर बाजारी करने वाले घृणा और तिरस्कार के पात्र बने. उच्च मध्यम वर्ग के लिए अपनी सुविधाओं को प्रदर्शित करना लज्जाजनक माना गया. कम खाना और पुराने कपड़े पहनना देशभक्ति का प्रतीक बन गया. इसी प्रकार आयुध कारखानों में काम करना भी देशभक्ति माना गया.

वैज्ञानिक प्रगति

    प्रथम विश्वयुद्ध ने वैज्ञानिक खोजों को गति दी. युद्ध के दौरान नए अस्त्र-शस्त्र बनाए गए. विशाल जलयानों पनडुब्बियों और वायुयानों के निर्माण का युद्ध और विश्व पर गहरा प्रभाव पड़ा.

इस प्रकार कहा जा सकता है कि प्रथम विश्वयुद्ध के कुछ सुखद परिणाम हुए परंतु अधिकांश परिणाम दुखदाई ही थे

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