भारतीय मानसून की प्रकृति

Bookmark and Share




भारतीय मानसून की प्रकृति

    दक्षिण एशियाई क्षेत्र में वर्षा के कारणों का व्यवस्थित अध्ययन मानसून के कारणों को समझने में सहायता करता है इसके कुछ विशेष पक्ष इस प्रकार हैं-

  • मानसून का आरंभ तथा उसका स्थल की ओर बढ़ना
  • वर्षा लाने वाले तंत्र (उदाहरणत: उष्णकटिबंधीय चक्रवात) तथा मानसूनी वर्षा की आवृति एवं वितरण के बीच संबंध.
  • मानसून में विच्छेद

मानसून का आरंभ

  • गर्मी के महीने में स्थल और समुद्र का विभेदी तापन ही मानसून पवनों के उपमहाद्वीप की ओर चलने के लिए मंच तैयार करता है.
  • अप्रैल और मई के महीने में जब सूर्य कर्क रेखा पर लंबवत चमकता है तो हिंद महासागर के उत्तर में स्थित विशाल भूखंड अत्यधिक गर्म हो जाता है, इसके परिणाम स्वरुप उपमहाद्वीप के उत्तर पश्चिमी भाग पर एक गहन न्यून दाब क्षेत्र विकसित हो जाता है, क्योंकि भूखंड के दक्षिण में हिंद महासागर अपेक्षतया धीरे-धीरे गर्म होता है.
  • निम्न वायुदाब केंद्र विषुवत रेखा के उस पार से दक्षिण पूर्वी सन्मार्ग पवनों को आकर्षित कर लेता है. इन दशाओं में अंतःउष्ण कटिबंधीय अभिसरन क्षेत्र उत्तर की ओर स्थानांतरित हो जाता है.
  • इस प्रकार दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी पवनों को दक्षिण पूर्वी सन्मार्ग पवनों के विस्तार के रूप में देखा जा सकता है, जो भूमध्य रेखा को पार करके भारतीय उपमहाद्वीप की ओर विक्षेपित हो जाती है.
  • यह पवन भूमध्य रेखा को 40 डिग्री पूर्वी तथा 16 डिग्री पूर्वी देशांतर रेखाओं के बीच पार करती है.
  • अंतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र की स्थिति में परिवर्तन का संबंध हिमालय के दक्षिण में उत्तरी मैदान के ऊपर से पश्चिमी जेट प्रवाह द्वारा अपनी स्थिति के प्रत्यावर्तन से भी है क्योंकि पश्चिमी जेट प्रवाह के इस क्षेत्र से खिसकते ही दक्षिणी भारत मैं 15 डिग्री उत्तरी अक्षांश पर पूर्वी जेट प्रवाह विकसित हो जाता है. इसी पूर्वी जेट प्रवाह को भारत में मानसून के प्रस्फोट के लिए जिम्मेदार माना जाता है.
  • मानसून का भारत में प्रवेश दक्षिणी पश्चिमी मानसून केरल तट पर 1 जून को पहुंचता है और शीघ्र ही 10 और 13 जून के बीच ये आर्द पवनें मुंबई व कोलकाता तक पहुंच जाती है. मध्य जुलाई तक संपूर्ण उपमहाद्वीप दक्षिण पश्चिम मानसून के प्रभावाधीन हो जाता है.
  • वर्षावाही तंत्र तथा मानसूनी वर्षा का वितरण भारत में वर्षा लाने वाले दो तंत्र प्रतीत होते हैं. पहला तंत्र उष्णकटिबंधीय अवदाब है जो बंगाल की खाड़ी या उससे भी आगे पूर्व में दक्षिणी चीन सागर में पैदा होता है तथा उत्तरी भारत के मैदानी भाग में वर्षा करता है.
  • दूसरा तंत्र अरब सागर में उठने वाले दक्षिण पश्चिम मानसून धारा है जो भारत के पश्चिमी तट पर वर्षा करती है. पश्चिमी घाट के साथ साथ होने वाली अधिकतर वर्षा पर्वतीय है क्योंकि यह आर्द्र हवाओं से अवरुद्ध हो कर घाट के सहारे जबरदस्ती ऊपर उठने से होती है.
  • भारत के पश्चिमी तट पर होने वाली वर्षा की तीव्रता दो कारकों से संबंधित है–
    • समुद्र तट से दूर घटित होने वाली मौसमी दशाएं तथा
    • अफ्रीका के पूर्वी तट के साथ भूमध्यरेखीय जेट प्रवाह की स्थिति.
  • बंगाल की खाड़ी में उत्पन्न होने वाली उष्णकटिबंधीय अवदाबो की बारंबारता हर साल बदलती रहती है. भारत के ऊपर उनके मार्ग का निर्धारण भी मुख्यत: अंत:उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र जिसे मानसून श्रेणी भी कहा जाता है कि स्थिति द्वारा होता है.
  • जब भी मानसून द्रोणी का अक्ष दोलायमान होता है विभिन्न वर्षों में इन अवदाबो के मार्ग दिशा वर्षा की गहनता और वितरण में भी पर्याप्त उतार-चढ़ाव आते हैं.
  • वर्षा कुछ दिनों के अंतराल में आती है. भारत के पश्चिमी तट पर पश्चिम से पूर्व, उत्तर पूर्व की ओर तथा उत्तर भारतीय मैदान एवं प्रायद्वीप के उत्तरी भाग में पूर्व दक्षिण पूर्व से उत्तर पश्चिम की ओर वर्षा की मात्रा में घटने की प्रवृत्ति पाई जाती है.

मानसून में विच्छेद
दक्षिण पश्चिम मानसून का काल में एक बार कुछ दिनों तक वर्षा होने के बाद यदि एक दो या कई सप्ताह तक वर्षा ना हो तो इसे मानसून विच्छेद कहा जाता है. यह विच्छेद विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न कारणों से होते हैं जो निम्नलिखित हैं

  • उत्तरी भारत के विशाल मैदान में मानसून का विच्छेद उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की संख्या कम हो जाने से और अंतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र की स्थिति में बदलाव आने से होता है.
  • पश्चिमी तट पर मानसून विच्छेद तब होता है जब आर्द पवनें तट के समानांतर बहने लगे
  • राजस्थान में मानसून विच्छेद तब होता है जब वायुमंडल के निम्न स्तरो पर तापमान की विलोमता वर्षा करने वाली आर्द पवनों को ऊपर उठने से रोक देती है

मानसून का निवर्तन

  • मानसून के पीछे हटने या लौट जाने को मानसून का निवर्तन कहा जाता है.
  • सितंबर के आरंभ से उत्तर-पश्चिमी भारत से मानसून पीछे हटने लगती है और मध्य अक्टूबर तक यह दक्षिणी भारत को छोड़ शेष समस्त भारत से निवर्तित हो जाती है.
  • लौटते हुए मानसून पवनें बंगाल की खाड़ी से जलवाष्प ग्रहण करके उत्तर पूर्वी मानसून के रूप में तमिलनाडु में वर्षा करती हैं.

1 Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*