सार्वजनिक वितरण प्रणाली (public distribution system)

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सार्वजनिक वितरण प्रणाली (public distribution system)
भारत में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति को उचित कीमतों पर तथा उचित समय पर उपलब्ध कराने तथा जनता के पोषण को उचित स्तर पर बनाए रखने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को एक मुख्य उपकरण के रूप में उपयोग किया जाता है |
सार्वजनिक वितरण प्रणाली न केवल खुले बाजार में आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रण में रखती है बल्कि उनके सामाजिक वितरण को सुनिश्चित करने में भी मदद करती है |
भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली समवर्ती सूची के अन्तर्गत आती है इसीलिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली का संचालन केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा सामूहिक रूप से किया जाता है | इन सन्दर्भ में केंद्र सरकार की भूमिका आवश्यक वस्तुओं के अधिग्रहण (procurement), भण्डारण (storage )तथा बड़ी मात्रा में वितरण (bulky distribution)की होती है जबकि राज्य सरकारों की भूमिका आवश्यक वस्तुओं को उठाने उन्हें उचित दर दुकान(fair price shop ) तक पहुँचाने तथा उपभोताओं को वितरित करने की होती है |
सार्वजनिक वितरण प्रणाली में चावल, गेहूं ,चीनी,और केरोसिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण वस्तुएं हैं | कुल वितरण में इनकी भूमिका 86 % पाई गई हैं | मोटे अनाज की भूमिका 1% तथा दालों की भूमिका 0.3% पाई गई हैं |इससे स्पस्ट हैं की सार्वजनिक वितरण प्रणाली लोगों को प्रयाप्त रूप से पोषण की सुरक्षा नही दे पा रही हैं |
भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की मुख्य कमजोरियां
भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली विभिन्न कमजोरियों से ग्रसित रही हैं जिस सन्दर्भ में निम्न बिंदु विचारणीय हैं —

  • भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की लोकप्रियता को लेकर प्रादेशिक असंतुलन देखने को मिलते हैं |उत्तरी भारत की तुलना में यह दक्षिणी भारत में अधिक लोकप्रिय हैं |
  • यह देखा गया हैं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली से निर्धन लोगों को सीमित मात्रा में लाभ मिलता हैं |भारत के निर्धनों के लिए आवंटित खाद्यानों का एक भाग APL परिवारों की ओर मुड़ जाता हैं ,जिसके कारण सार्वजनिक वितरण प्रणाली में प्रतिगामिता उत्पान्न हो जाती हैं | ग्रामीण क्षेत्रों के केवल 46% परिवार ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली से लाभान्वित हो रही हैं |
  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली में खाद्यान्नों के रिसाव की समस्याएं देखने को मिलती हैं | एक अध्ययन में यह पाया गया हैं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में आपूर्ति किए जा रहे चावल का 21 % भाग तथा गेहूं का 26 % भाग खुले बाजार में रिस जाता हैं |
  • भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अन्तर्गत आपूर्ति किए जाने वाले खाद्यानों की गुणवत्ता भी सही नही पाई गई है ,जिसका मुख्य कारन खाद्यानों को खरीदते समय निर्धारित FAQ (fair average quality) को ध्यान में नही रखना ,भण्डारण में असावधानी बरतना आदि है |
  • FCI की कार्यप्रणाली में भी विभिन्न प्रकार की कमियां देखने को मिलती है | इसके काम करने की लागतें लगातार बढ़ती जा रही है , इन लागतों के बढ़ने का मुख्य कारण लगातार बढ़ता हुआ MSP , बैंकों की ऊँची ब्याज दर , राज्य सरकार द्वारा खाद्यानों पर लगाए जाने वाले कर और उपकर आदि है |एक अध्ययन के अनुसार FCI अपनी लागतों के 80 % भाग पर कोई नियंत्रण नहीं कर सकता |
  • यह कहा गया है कि PDS के संचालन से भारत के खाद्यानों के निजी बाजार पर असर पड़ता है | इससे निर्धन लोगों को हानि हो रही है | Indian Council Of Medical Research के अनुसार एक व्यक्ति को पर्याप्त ऊर्जा ग्रहण करने के लिए एक महीने में 11 kg अनाज कि ज़रूरत होती है |इस प्रकार 5 सदस्यों को 55 kg अनाज कि आवश्यकता होगी जबकि PDS में अधिकतम 35 kg अनाज ही दिया जाता है |स्पष्ट है कि एक परिवार को खाद्यानों के लिए निजी बाज़ारों पर भी निर्भर रहना पड़ेगा | यदि निजी बाजार में खाद्यानों की कीमत ऊँची रहेगी तो PDS से मिले लाभ समाप्त हो जायेंगे |इस प्रकार वितरण की दोहरी प्रणाली निर्धन के हितों के विरुद्ध कार्य करती है |
  • IEO द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह पाया गया है PDS में 1 रुपए का अनाज वितरण करने में लगत 3.65 रुपए आती है |
  • PDS के पुनर्संगठन के प्रयास —
    भारत में PDS की कार्यप्रणाली में सुधार करने के लिए इसके ढांचे में कुछ सुधार किए गए है —
    RPDS- Revamped Public Disrtibution System बेहतर सार्वजनिक वितरण प्रणाली

    इसे 1992 में लागू किया गया |इसका मुख्य लक्ष्य दुर्गम स्थानों (जैसे पहाड़ी ,रेगिस्तानों)में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को पर्याप्त रूप में विस्तार करना था |इसके अन्तर्गत दुर्गम स्थानों में खाद्यानों की कीमत अन्य स्थानों की तुलना में 50 रुपए प्रति क्विंटल कम रखा जाता है | यह एक प्रकार से क्षेत्रीय दृष्टिकोण को उजागर करती है |
    TPDS Targeted Public Disrtibution System लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली —
    इसे 1997 में शुरू किया गया | इसके अन्तर्गत BPL परिवारों को CIP (central issue price) की तुलना में 50 % कम कीमत पर 1 महीने में 35 kg अनाज उपलब्ध कराया जाता है |इसे लागु करते समय यह सोचा गया कि APL परिवारों से अनाज कि आर्थिक लागत वसूली जाए और CIP को उसके बराबर रखा जाए |दूसरे शब्दों में APL परिवारों को कोई भी सब्सिडी नही दी जाए |
    अंत्योदय अन्न योजना
    इसे वर्ष 2000 से लागू किया गया |इसके अन्तर्गत निर्धनों में निर्धन परिवारों की पहचान की जाती है और उन्हें 35 kg अनाज प्रति माह उपलब्ध कराई जाती है |
    विकेन्द्रीकृत सार्वजनिक वितरण प्रणाली
    इसे 1997 में लागू किया गया | इसके अन्तर्गत केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों को निर्धारित कीमतों पर खाद्यानों के अधिग्रहण ,भण्डारण और वितरण आदि का कार्य विकेन्द्रित कर दिया | केंद्र सरकार द्वारा यह कहा गया कि इस प्रक्रिया में राज्यों को होने वाली घाटे कि भरपाई केंद्र सरकार करेगी |

    PDS को प्रभावी बनाने के अन्य उपाए —

    नागरिक अधिकार पत्र (citizen charter)
    भारत में सार्वजनिक सेवाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने के लिए इसे लाया गया |इसमें PDS को भी सम्मिलित किया गया |
    PRI पंचायती राज संसथान को PDS से जोड़ना–
    1999 में केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों को यह निर्देश दिया गया कि वे BPL परिवारों की पहचान करने तथा PDS के संचालन पर निगरानी रखने के लिए पंचायती राज संसथान की भूमिका को सुनिश्चित करे |
    PDS सेंट्रल आर्डर 2011
    इसके माध्यम से केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को इस बात के दिशा निर्देश दिए कि वे लगातार BPL परिवारों से जुड़े हुए आंकड़ों में आवश्यक संसोधन करती रहे |
    क्षेत्राधिकारी योजना
    इसे वर्ष 2000 में लागू किया गया | इसके अन्तर्गत केंद्र सरकार राज्यों को अलग अलग क्षेत्रो में बाँट देती है और प्रत्येक क्षेत्र पर निगरानी रहने के लिए एक क्षेत्राधिकारी कि नियुक्ति कर देती है | इस अधिकारी को 3 महीने में कम से कम एक बार अपने क्षेत्र का निरिक्षण करना होता है | इसके द्वारा सौपीं गई रिपोर्ट को केंद्र सरकार द्वारा आवश्यक कार्यवाही के लिए राज्य सरकारों को अग्रेषित कर दिया जाता है |

    सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार की भावी रुपरेखा
    भारत में PDS को कार्य कुशल एवम प्रभावी बनाने के लिए निम्न बातों पर विचार किया आ सकता है —

  • PDS को आधार कार्ड योजना के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए | इससे बोगस राशन कार्डों से छुटकारा मिलेगा |
  • FCI आदि के भंडारों से खाद्यान उठाने से लेकर FPS तक की समस्त प्रक्रिया का कंप्यूटरीकरण होना चाहिए | इसके अलावा FPS के लिए यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि खाद्यानों के वितरण ,उपलब्ध स्टॉक आदि का साप्ताहिक विवरण तैयार करे और उसे विभागीय वेबसाइट पर अपलोड करे |
  • FPS के संचालन का कार्य NGOs ,SHGs ,सहकारी समितियों आदि को दिया जा सकता है |यह छत्तीसगढ़ में किया गया है |
  • FPS की लाभदायकता को बढ़ाने के लिए दूसरे अन्य वस्तुओं को बेचने की छूट दी जा सकती है |
  • नीति आयोग के अनुसार FPS को चलाने वाले लोगों के लिए कमीशन की मात्रा प्रयाप्त होनी चाहिए |यह खाद्यानों की कुल लागत का 2 % होनी चाहिए |
  • प्रवासी श्रम के लिए रोमिंग राशन कार्ड का प्रावधान किया जा सकता है |
  • FPS की संख्या बढ़ानी चाहिए और उन्हें सप्ताह के सभी दिनों के लिए खोला जाना चाहिए |
  • खाद्यानों को किश्तों में देने की छूट होनी चाहिए | केरल में इसे लागू किया गया है |
  • खाद्यानों में स्थानीय पसंदगी को ध्यान में रखा जाना चाहिए |
  • खाद्यानों की door step delivery (राज्य सरकार द्वारा FPS तक खाद्यान पहचान ) को सुनिश्चित किया जाना चाहिए |(इससे रिसाव रुकेगी )|
  • FCI के भंडारों में 6 महीने अग्रिम रूप से खाद्यानों को सुनिश्चित किया जाए तथा FPS में 7 दिन अग्रिम रूप से खाद्यान सुनिश्चित किए जाए |
  • खाद्यानों के परिवहन में GPS प्रणाली का प्रयोग हो |
  • FPS के संचालको को पर्याप्त साख सुविधाएं दी जानी चाहिए |तमिलनाडु में DCCBs (District Central co – Operative Banks )द्वारा ये सुविधाएँ दी जा रही है |
  • FPS पर निगरानी रखने के लिए PRIs के सदस्यों वाली सतर्कता समितियों का गठन किया जाना चाहिए |


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