UPSC MAINS SPECIAL – 2

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एफआरबीएम समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंपी:

पूर्व राजस्व एवं व्यय सचिव और पूर्व सांसद एन. के. सिंह की अध्यक्षता वाली राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) समिति ने 23 जनवरी 2017 को अपनी रिपोर्ट केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली को सौंपी। समिति के अन्य सदस्य भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर डॉ. उर्जित आर. पटेल, पूर्व वित्त सचिव सुमित बोस, मुख्य आर्थिक सलाहकार डॉ. अरविंद सुब्रमण्यम और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी (एनआईपीएफपी) के निदेशक डॉ. रथिन राय भी इस अवसर पर उपस्थित थे।

  • सरकार ने मई, 2016 में पूर्व राजस्व और व्यय सचिव और सांसद एन. के. सिंह की अध्यक्षता में राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) अधिनियम की समीक्षा के लिए इस समिति का गठन किया था।
  • इस समिति के व्यापक विचारणीय विषयों (टीओआर) में समकालीन परिवर्तनों के आलोक में मौजूदा एफआरबीएम अधिनियम, पिछले निष्कर्षों, वैश्विक आर्थिक गतिविधियों, श्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय व्यवहारों की व्यापक समीक्षा करना और भविष्य के वित्तीय ढांचे और देश की योजनाओं की सिफारिश करना शामिल हैं।
  • बाद में, चौदहवें वित्तीय आयोग और व्यय प्रबंधन आयोग की कुछ सिफारिशों के बारे में समिति का मत प्राप्त करने के लिए इसके विचारणीय विषयों बढ़ाया गया। ये विषय मुख्य रूप से वित्तीय मामलों के साथ-साथ बजट में नए पूंजीगत व्यय के साथ जुड़े कुछ वित्तीय मुद्दों पर संस्थागत ढांचे को मजबूत बनाने से संबंधित हैं।
  • समिति ने अनेक हित धारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया। इसे प्रख्यात राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठनों और विशेषज्ञों से भी जानकारी प्राप्त हुई। समिति ने भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के साथ-साथ राज्य सरकारों के साथ भी बातचीत का आयोजन किया।

राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम (एफआरबीएम):

  • एफआरबीएम अधिनियम को केंद्र एवं राज्य सरकारों में वित्तीय अनुशासन बनाए रखने के लिए लाया गया। इस विधेयक को संसद में वर्ष 2000 में प्रस्तुत किया गया, वर्ष 2003 में इसे लोकसभा में पारित किया गया और वर्ष 2004 में इसे लागू कर दिया गया।
  • इस विधेयक में राजस्व घाटे (revenue deficit) व राजकोषीय घाटे (fiscal deficit) को चरणबद्ध तरीके से इस प्रकार कम करना था कि वर्ष 2008–09 में राजकोषीय घाटा (fiscal deficit) 3% तथा राजस्व घाटा(revenue deficit) 0% के स्तर पर लाया जाए। किन्तु अनेक कारणों से यह लक्ष्य प्राप्त नहीं हो पाया बल्कि वर्ष 2008-09 में राजकोषीय घाटा बढ़कर जीडीपी का 6.2 प्रतिशत तक जा पहुंचा था।
  • इस अधिनियम में मौद्रिक नीति के प्रभावी संचालन तथा विवेकपूर्ण ऋण प्रबंधन के प्रभावी संचालन के जरिए जो केन्द्र सरकार के उधारों, ऋण तथा घाटे पर सीमाओं के माध्यम से राजकोषीय निरंतरता बनाए रखने, केन्द्र सरकार के राजकोषीय प्रचालनों में बेहतर पारदर्शिता अपनाने तथा मध्यावधि रुपरेखा में राजकोषीय नीति का संचालन करने और उससे संबद्ध मामलों अथवा आनुषंगिक मामलों के अनुरुप है, पर्याप्त राजस्व अधिशेष प्राप्त कर तथा राजकोषीय अड़चनों को दूर करते हुए राजकोषीय प्रबंधन में अंतर-सामूहिक इक्विटी तथा दीर्घकालिक व्यापक आर्थिक स्थायित्व के सुनिश्चयन हेतु केन्द्र सरकार पर दायित्व डाला गया है।

11वीं शिक्षा पर वार्षिक स्थिति रिपोर्ट (ASER) 2016 जारी:

तमाम दावों के बावजूद सरकारें अपने स्कूलों को सक्षम नहीं बना सकी हैं। उनमें पढ़ाई का स्तर नहीं सुधर रहा। आलम यह है कि आज भी प्राथमिक स्तर पर पचास प्रतिशत बच्चे अपने से तीन क्लास नीचे की किताबें भी ढंग से नहीं पढ़ पाते। इसका खुलासा गैर सरकारी संगठन ‘प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन’ की ‘ऐनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (असर) 2016’ में हुआ है।
रिपोर्ट से जुड़े प्रमुख तथ्य:

  • निजी स्कूलों में 6 से 14 वर्ष के बच्चों के दाखिले की स्थिति मेेंं कोई परिवर्तन नहीं हुआ और यह 2016 में 30.5 प्रतिशत दर्ज किया गया जो साल 2014 में 30.8 प्रतिशत था।
  • रिपोर्ट के अनुसार, निजी स्कूलों में दाखिले में 7 से 10 वर्ष आयु वर्ग और 11-14 आयु वर्ग में लैंगिक अंतर में गिरावट दर्ज की गई है। निजी स्कूलों में 11 से 14 वर्ष आयु वर्ग में लड़के और लड़कियों के दाखिले का अंतर 2014 में 7.6 प्रतिशत था जो 2016 में घटकर 6.9 प्रतिशत दर्ज किया गया।
  • केरल और गुजरात में सरकारी स्कूलों में छात्रों के दाखिले में काफी वृद्धि हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, केरल के सरकारी स्कूलों में 2014 में छात्रों का दाखिला 40.6 प्रतिशत दर्ज किया गया जो 2016 में बढ़कर 49.9 प्रतिशत हो गया।
  • इसी प्रकार से गुजरात के सरकारी स्कूलों में दाखिला 2014 के 79.2 प्रतिशत से बढ़कर 2016 में 86 प्रतिशत दर्ज किया गया। स्कूलों में दाखिले का अनुपात 2009 में 96 प्रतिशत था, वह 2014 में 96.7 प्रतिशत और 2016 में 96.9 प्रतिशत दर्ज किया गया।
  • राष्ट्रीय स्तर पर छात्रों के पुस्तक पढ़ने की क्षमता बेहतर हुई है विशेष तौर पर निजी स्कूल में प्रारंभिक स्तर पर। यह 40.2 प्रतिशत से बढ़कर 42.5 प्रतिशत दर्ज की गई है। अंकगणित में सरकारी स्कूल में प्रारंभिक स्तर के छात्रों का प्रदर्शन बेहतर हुआ है।
  • हालांकि हिमाचल, महाराष्ट्र, हरियाणा और केरल के सरकारी स्कूलों में स्थित कुछ बेहतर हुई है। जहां पांचवीं क्लास के बच्चों में साधारण अंग्रेजी पढ़ने की स्थिति में सुधार हुआ है। लेकिन 8वीं क्लास के बच्चों की स्थिति यहां भी पतली है। साल 2009 में 60.2 फीसदी के मुकाबले साल 2016 में आंकड़ा घटकर 45.2 फीसदी तक आ गया है।
  • रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी स्कूलों की स्थिति निजी स्कूलों के मुकाबले सुधरी है। ग्रामीण भारत में सरकारी स्कूलों में दाखिला निजी स्कूलों के मुकाबले बढ़ा है और निजी स्कूलों की स्थिति जस की तस है।

राष्ट्रीय इस्पात नीति 2017 के मसौदे का लोकार्पण:

चौधरी बीरेंद्र सिंह की अध्यक्षता में इस्पात मंत्रालय ने राष्ट्रीय इस्पात नीति 2017 का मसौदा जारी किया। यह मसौदा दस्तावेज राष्ट्रीय इस्पात नीति, 2005 में कुछ नई धाराएं जोड़कर और पहले से मौजूद धाराओं को बेहतर बनाकर कुछ बदलाव करेगा।

उद्देश्य:

  • वर्ष 2030-31 तक 300 लाख टन कच्चे इस्पात की क्षमता के साथ एक विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी उद्योग का निर्माण करना।
  • वर्ष 2030-31 तक 160 किग्रा प्रति व्यक्ति इस्पात की खपत बढ़ाना।
  • वर्ष 2030-31 तक उच्च ग्रेड ऑटोमोटिव स्टील, इलेक्ट्रिक स्टील, विशेष स्टील्स और सामरिक अनुप्रयोगों के लिए मिश्रित धातु की मांग को पूरा करना।
  • वर्ष 2030-31 वॉश्ड कोकिंग कोयले की घरेलू उपलब्धता को बढ़ाकर इसके आयात पर निर्भरता को 50% तक कम करना।
  • 2025-26 से स्टील का शुद्ध निर्यातक बनना।
  • सुरक्षित और स्थायी तरीके से वर्ष 2030-31 तक स्टील के उत्पादन में विश्व में अग्रणी स्थान पर पहुंचना।
  • घरेलू इस्पात उत्पादों के लिए गुणवत्ता मानकों को विकसित और लागू करना।

इस्पात क्षेत्र का परिदृश्य:

  • वर्ष 2014 में विश्व में क्रूड स्टील का उत्पादन बढ़कर 1665 मिलियन टन हो गया तथा इसमें 2013 से 1% की वृद्धि हुई है।
  • वर्ष 2014 में चीन विश्व का क्रूड स्टील का सबसे बड़ा उत्पादक देश बन गया है। इसके बाद जापान एवं फिर संयुक्त राज्य अमेरिका का स्थान रहा। भारत इस सूची में चौथे स्थान पर था।
  • डब्ल्यूएसए ने प्रक्षेपित किया है कि भारतीय इस्पात की मांग में वर्ष 2015 में 6.2% और वर्ष 2016 में 7.3% की वृद्धि हुई है जबकि इस्पात के वैश्विक उत्पादन में 0.5% और 1.4% की वृद्धि होगी। इन दोनों वर्षों में चीन के इस्पात उपयोग में 0.5 की गिरावट अनुमानित है।

घरेलू परिदृश्य:

  • भारतीय इस्पात उद्योग ऊँची आर्थिक वृद्धि और बढ़ती मांग के चलते 2007-08 से विकास की एक नयी अवस्था में प्रवेश कर चुका है।
  • उत्पादन में तीव्र बढ़ोतरी के चलते भारत विश्व में क्रूड इस्पात का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक राष्ट्र बन गया है। भारत स्पंज आइरन का सबसे बड़ा उत्पादक देश बना गया है।

निजता का अधिकार

    भारतीय संविधान ने अपने नागरिकों को कई प्रकार के मौलिक अधिकार दे रखे हैं। लेकिन शत-प्रतिशत इन्हें लागू नहीं किया जाता है। वर्तमान में निजता के अधिकार को लेकर चल रही चर्चाओं के लिए भी नागरिकों के मन में यही शंका व्याप्त है कि क्या इसे मौलिक अधिकार का दर्जा दिया जा सकेगा? अगर ऐसा होता है, तो क्या इसे शत-प्रतिशत लागू किया जा सकेगा। ऐसा मौलिक अधिकार मिलने के बाद क्या नागरिक सरकार की निगरानी से बच सकेंगे? ऐसे अनेक प्रश्न लोगों के मन में हैं।

    दरअसल निजता के अधिकार का वर्णन संविधान में नहीं किया गया है। परन्तु अगर केवल संविधान के आधार पर ही निजता के अधिकार को देखा जाना है, तो मनमानी करने के विरूद्ध अधिकार एवं प्रेस की स्वतंत्रता जैसे विषय भी समाप्त हो जाने चाहिए। किसी निजी संस्था को अपनी मर्जी से अपने बारे में सूचना देने और सरकार द्वारा नागरिकों को सूचनाएं प्रदान करने की अनिवार्यता में अंतर है। अतः निजता के अधिकार के बारे में निर्णय लेने के लिए स्वयं एपेक्स कोर्ट को भी अग्नि परीक्षा से गुजरना होगा।

    क्या हमारा न्यायालय आज सूचना तंत्र के युग में 1963 और 1973 जैसा सशक्त निर्णय ले सकेगा, जब उसने इंदिरा गांधी सरकार को संविधान में संशोधन करने से रोक दिया था? सन् 1954 के सतीश चंद्र मामले में न्यायालय ने अनुच्छेद 20 (3) के अंतर्गत निजता के अधिकार के प्रावधान को ठुकरा दिया था। कहीं 1963 में खड़क सिंह के मामले में न्यायालय ने इसे स्वीकार किया था। परन्तु फिर भी एक संक्षिप्त चर्चा के बाद न्यायालय ने यही कहा था कि भारत में निजता का कोई अधिकार नहीं है। दूसरी ओर, न्यायाधीश सुब्बाराव ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का एक महत्वपूर्ण अंग माना था।

    निजता का अधिकार दिए जाने के बाद भी सरकार अपने नागरिकों पर कुछ अंकुश लगा सकेगी। निजता के अधिकार का अर्थ इस मामले में पूर्ण अधिकार मिलने से न लगाया जाए। विश्व के धरातल पर इस संदर्भ को देखें, तो पाते हैं कि निजता केअधिकार को खत्म करके न तो राष्ट्रीय सुरक्षा बढ़ाई जा सकी है और न ही आतंकवाद को खत्म किया जा सका है। इससे केवल नागरिकों के व्यक्तिगत निर्णय ले सकने के अधिकार का ही हनन हुआ है।

किसानों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार कौन?

देश में किसानों की स्थिति लगातार गिरती जा रही है। पिछले 20 वर्षों में लगभग तीन लाख किसानों ने आत्महत्या की है। यही कारण है कि आज जगह-जगह किसानों के उग्र आंदोलन छेड़े जा रहे हैं।
किसानों की दुर्दशा के कारण क्या हैं?

  • इसका मुख्य कारण हरित क्रांति और उससे जुड़ी नीतियों को माना जा सकता है। हरित क्रांति ने कृषि की दिशा को रासायनिक खाद, कीटनाशक, बड़े बांधों पर निर्भरता एवं अन्य सिंचाई परियोजनाओं की ओर मोड़ दिया। इन सब प्रयासों से बम्पर पैदावार होने लगी। यही कारण है कि इस काल को ‘‘हरित क्रांति’’ का नाम दिया गया। इस दौरान अनेक संकर बीजों की किस्में आने लगीं।
  • रासायनिक उर्वरक और संकर बीजों की सहायता से उगने वाली फसल में लगने वाले कीड़े कीटनाशक-प्रतिरोधी थे। इन्हें रोकने के लिए कीटनाशकों का अधिक प्रयोग होने लगा। उच्च क्षमता वाले कीटनाशकों के प्रयोग से पैदावार में एक तरह का जहर घुलने लगा। इसे छिड़कने वाले किसानों के स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ने लगा। कीटनाशकों के कारण किसान का खर्च बढ़ गया। दूसरी ओर, भूमि की उर्वरता में कमी आई। इन कीटनाशक में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी थी और ये मिट्टी के सूक्ष्म जीवाणुओं को भी खत्म करने लगे।
  • नहरों से सिंचाई के कारण जल-भराव की समस्या आने लगी। इसके कारण भूमि का कुछ भाग बेकार होने लगा। जहाँ नहरों से सिंचाई नहीं हो पाती थी, वहाँ भूमिगत ट्यूबवेल लगाने से जल स्तर कम होता गया।
  • बड़े-बड़े बांधों के निर्माण को भारत की कृषि के लिए वरदान बताया गया। इसी तर्ज पर गुजरात में सरदार सरोवर परियोजना लाई गई। इस परियोजना में गुजरात के पिछले 50 वर्षों के सिंचाई बजट का 90 प्रतिशत खप गया और अब यह मात्र 2 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई कर पा रहा है। अनुमानित भूमि का यह महज 10 प्रतिशत सिंचित कर रहा है।
  • अगर वर्षा जल की हार्वेस्टिंग में इस परियोजना में लगाई गई राशि का आधा भाग भी खर्च किया जाता, तो गुजरात की कृषि भूमि के हर इंच की सिंचाई हो सकती थी।
  • वर्तमान में जलवायु परिवर्तन के कारण बाढ़ और सूखे की समस्या बढ़ती जा रही है।
  • सरकार ने केवल चावल और गेहूं पर ही न्यूनतम समर्थन मूल्य निश्चित कर रखा है। अन्य फसलों पर यह निश्चित नहीं होता।

स्वामीनाथन समिति ने इसे सभी फसलों के लिए निश्चित किए जाने की सिफारिश की थी। साथ ही इसे किसानों की कुल औसत लागत से 50 प्रतिशत अधिक दिए जाने की बात कही थी। वर्तमान सरकार ने इसे लागू नहीं किया है। बल्कि मनरेगा एवं अन्य योजनाओं की निधि में भी कटौती कर दी है।ऋण संबंधी छूट की घोषणाओं के बाद भी पूर्ण रूप से यह नहीं दिया जाता। सूखे या बाढ़ की चपेट में आई फसलों का हर्जाना नहीं दिया जाता।
दरअसल, ऋण संबंधी छूट वगैरह से कोई स्थायी परिवर्तन नहीं होने वाला। पूरी कृषि नीति को ही बदलने की जरूरत है। हमें जैव खेती, रेन वाटर हार्वेस्टिंग, माइक्रो जल सिंचाई, रासायनिक खाद के बजाय जैव-उर्वरक की ओर बढ़ने की आवश्यकता है। इनसे कीटनाशकों की जरूरत कम हो जाएगी।भारत में आज भी 50 प्रतिशत जनता प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। अगर हमने जल्द ही कोई कदम नहीं उठाया, तो हम अन्न-संकट का सामना करेंगे।

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