UPSC MAINS SPECIAL-I

Bookmark and Share

धर्म , जाति के आधार पर नहीं मांग सकते वोट: सुप्रीम कोर्ट

  • सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक फैसले में कहा कि धर्म के आधार पर वोट देने की कोई भी अपील चुनावी कानूनों के तहत भ्रष्ट आचरण के बराबर है। अब चुनाव के दौरान धर्म के आधार पर वोट नहीं मांगा जा सकता।
  • सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संवैधानिक पीठ ने 2 जनवरी 2017 को दिए ऐतिहासिक फैसले में कहा कि प्रत्याशी या उसके समर्थकों के धर्म, जाति, समुदाय, भाषा के नाम पर वोट माँगना गैर कानूनी है। चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष पद्धति है। धर्म के आधार पर वोट माँगना संविधान की भावना के खिलाफ है। जनप्रतिनिधियों को अपने कामकाज भी धर्मनिरपेक्ष आधार पर ही करने चाहिए।
  • सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि प्रत्याशी और उसके विरोधी एजेंट की धर्म, जाति और भाषा का प्रयोग वोट माँगने के लिए कदापि नहीं किया जा सकता।
  • सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि अगर कोई उम्मीदवार ऐसा करता है तो ये जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत भ्रष्ट आचरण माना जाएगा। यह जनप्रतिनिधित्व कानून 123 (3) के अंतर्गत संबद्ध होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न केवल प्रत्याशी बल्कि उसके विरोधी उम्मीदवार के धर्म, भाषा, समुदाय और जाति का प्रयोग भी चुनाव में वोट माँगने के लिए नहीं किया जा सकेगा।
  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भगवान और मनुष्य के बीच का रिश्ता व्यक्तिगत मामला है। कोई भी सरकार किसी एक धर्म के साथ विशेष व्यवहार नहीं कर सकती तथा एक धर्म विशेष के साथ खुद को नहीं जोड़ सकती।

पृष्ठभूमि

  • सुप्रीम कोर्ट में इस संदर्भ में एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें यह प्रश्न उठाया गया था कि धर्म और जाति के नाम वोट माँगना जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत भ्रष्ट आचरण है या नहीं। जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123(3) के तहत ‘उसके’ धर्म की बात है और इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को व्याख्या करनी थी कि ‘उसके’ धर्म का दायरा क्या है? प्रत्याशी का या उसके एजेंट का भी।
  • विभिन्न राजनीतिक दल धार्मिक ध्रुवीकरण कर वोट लेने के अनुचित प्रयासों में संलग्न रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट के 2 जनवरी 2017 के इस निर्णय से तुष्टिकरण, धार्मिक ध्रुवीकरण इत्यादि से राजनीति को मुक्त करने में मदद मिलेगी। दक्षिण भारत में विशेषकर तमिलनाडु में डीएमके जैसे राजनीतिक दल भाषायी आधार पर वोट माँगते हैं तथा अतीत में भाषायी ध्रुवीकरण का सहारा चुनाव में लेते रहे है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने भाषा के आधार पर वोट माँगने को भी असंवैधानिक घोषित किया है।
  • इसी तरह भारतीय राजनीति के प्रमुख तत्व जाति के आधार पर वोट मांगने की विशिष्ट परंपरा रही है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने इस ऐतिहासिक निर्णय से स्वच्छ करने का प्रयत्न किया। वास्तव में सुप्रीम कोर्ट ने 21वीं शताब्दी के भारत में चुनाव सुधारों को एक नई गति प्रदान की है जिसमें धर्म, संप्रदाय, जाति, भाषा इत्यादि का वोट माँगने में अवश्य ही कोई आधार नहीं होना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र ने 2017 को विकास के लिए स्थायी पर्यटन का अंतरराष्ट्रीय वर्ष के रूप में घोषित किया:

  • संयुक्त राष्ट्र की 70 वीं महासभा ने 2017 को विकास के लिए स्थायी पर्यटन के अंतरराष्ट्रीय वर्ष के रूप में मान्यता प्रदान की है। यह मान्यता अंतरराष्ट्रीय पर्यटन के विकास और विशेष रूप से स्थायी पर्यटन के महत्व को दर्शाता है।
  • यह लोगों के बीच बेहतर समझ को बढ़ावा देने के लिए तथा विभिन्न सभ्यताओं की समृद्ध विरासत के प्रति जागरूकता लाने के लिए और विभिन्न संस्कृतियों के निहित मूल्यों की बेहतर सराहना करने के लिए तथा सबसे महत्वपूर्ण विश्व में शांति को मजबूत बनाने में योगदान करने के लिए किया गया है।
  • स्थायी पर्यटन के विकास के योगदान पर जागरूकता बढ़ाने को विषय बनाया गया है। अंतर्राष्ट्रीय वर्ष का उद्देश्य नीतियों, उपभोक्ता व्यवहार और व्यापार व्यवहार में बदलाव लाने के लिए और अधिक स्थायी पर्यटन क्षेत्र को बनाने के लिए करना है। यह विषय पूरी तरह से वर्ष 2030 के यूनिवर्सल एजेंडा फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट और सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (एसडीजी) के अनुसार है।

अंतर्राष्ट्रीय वर्ष निम्नलिखित क्षेत्रों में पर्यटन की भूमिका को बढ़ावा देगा:

  • समावेशी और सतत आर्थिक विकास.
  • सामाजिक समग्रता, रोजगार और गरीबी में कमी.
  • सांस्कृतिक मूल्य, विविधता और विरासत.
  • संसाधन दक्षता, पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन.
  • आपसी समझ, शांति और सुरक्षा.
  • अंतरराष्ट्रीय वर्ष के निष्पादन की जिम्मेदारी पर्यटन के लिए संयुक्त राष्ट्र की विशेष एजेंसी विश्व पर्यटन संगठन (UNWTO) को दी गयी है। वर्ष 2016 को दलहन के अंतरराष्ट्रीय वर्ष के रूप में नामित किया गया था।

आईएलओ ने प्रवासी श्रमिक रिपोर्ट पर वैश्विक आकलन की विज्ञप्ति जारी की:

    जिनेवा स्थित अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने प्रवासी श्रमिक की रिपोर्ट पर सांख्यिकीय अनुमान जारी किया है। यह सांख्यिकीय अध्ययन दुनिया भर में प्रवासियों की कुल संख्या के बीच में श्रम प्रवासी मजदूरों के अनुपात के बारे में अनुमान प्रदान करता है।

  • यह उन क्षेत्रों और उद्योगों को दर्शाता है जहां अंतरराष्ट्रीय प्रवासी मजदूर स्थापित हो रहे हैं और अद्यतन संख्या के साथ घरेलू काम में प्रवासियों पर विशेष ध्यान देता है।

रिपोर्ट के प्रमुख तथ्य:

  • दुनिया के लगभग 232 मिलियन अंतरराष्ट्रीय प्रवासियों में 150.3 मिलियन प्रवासी श्रमिक हैं। इनमें से 11.5 मिलियन प्रवासी घरेलू श्रमिक हैं।
  • प्रवासी श्रमिक 206.6 मिलियन कामकाजी उम्र वाली प्रवासी आबादी (15 साल और इससे अधिक) में 72.7 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं। इसके विपरीत गैर-प्रवासी 63.9 प्रतिशत का हिस्सा रखते हैं। 83.7 मिलियन पुरुष 66.6 मिलियन महिला प्रवासी श्रमिक हैं।
  • प्रवासी कुल वैश्विक आबादी (15 साल और इससे अधिक) में 3.9 प्रतिशत का हिस्सा रखते हैं। हालांकि, प्रवासी श्रमिक सभी कार्यकर्ताओं में एक उच्च अनुपात (4.4 प्रतिशत) रखते हैं। यह प्रवासियों की श्रम शक्ति में भागीदारी (72.7 प्रतिशत) और गैर- प्रवासियों श्रम शक्ति में भागीदारी (63.9 प्रतिशत) के तुलनात्मक अध्ययन को दर्शाता है।
  • लगभग आधे प्रवासी श्रमिक (48.5 फीसदी), दो व्यापक उपक्षेत्रों में केंद्रित हो रहे हैं, उत्तरी अमेरिका और उत्तरी, दक्षिणी और पश्चिमी यूरोप।
  • इस उपक्षेत्र में सभी महिला प्रवासी मजदूरों का 52.9 प्रतिशत और सभी पुरुष प्रवासी मजदूरों का 45.1 प्रतिशत है।
  • अरब देशों में, इसके विपरीत, लिंग भेद काफी उलट है।
  • अरब देशों में सभी कार्यकर्ताओं के हिस्से के रूप में प्रवासी मजदूरों का अनुपात उच्चतम (35.6 फीसदी) के स्तर पर है। यही अनुपात उत्तरी अमेरिका में 20.2 प्रतिशत है।
  • अरब देशों में 50.8 प्रतिशत पुरुष प्रवासी घरेलू श्रमिक हैं।

जीपीसीआर संकेतन के लिए दवाओं की खोज को आईआईटी कानपुर के द्वारा आसान बनाया गया:

    शोधकर्ताओं ने यह दिखाया है कि नई दवाओं द्वारा जी प्रोटीन कपल्ड रिसेप्टर्स (GPCRs) का विनियमन आम तौर पर सोचे जाने वाले तरीकों से काफी सरल हो गया है। यह केवल रिसेप्टर के अंतिम भाग को लगाकर ही उपयोग में लाया जा सकता है, जिसे कि रिसेप्टर की पूंछ (अंतिम भाग) कहा जाता है।

इन निष्कर्षों का महत्व:

    इसके साथ ही, जी प्रोटीन कपल्ड रिसेप्टर्स (GPCRs) के लिए बाध्यकारी नई दवाओं की खोज, जोकि हमारे शरीर में लगभग हर शारीरिक प्रक्रिया के लिए केंद्रीय है जैसे कि दृष्टि, स्वाद, प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया और हृदय विनियमन को आसान बना देता है।

पृष्ठभूमि:

    वर्तमान में रक्तचाप, दिल की विफलता, मधुमेह, मोटापा, कैंसर और कई अन्य मानव रोगों के उपचार के लिए बाजार में उपलब्ध दवाओं का लगभग 50% GPCR रिसेप्टर्स की ओर लक्षित होता है। यह सभी दवाएं उनसे संबंधित रिसेप्टर्स से बाध्य होती है और या तो उन्हें सक्रिय कर देती हैं या उनके सिगनल बंद कर देती हैं।

जी प्रोटीन कपल्ड रिसेप्टर्स:

    जी प्रोटीन कपल्ड रिसेप्टर्स यूकेरियोट्स में मेम्ब्रेन रिसेप्टर्स के सबसे बड़े और सबसे विविध समूह हैं। ये सेल सरफेस रिसेप्टर्स प्रकाश ऊर्जा, पेप्टाइड्स, लिपिड, शर्करा और प्रोटीन के रूप में संदेशों के लिए एक इनबॉक्स की तरह कार्य करती है।

GPCRs कैसे काम करता है?

  • कोशिका की सतह पर पाए जाने वाले रिसेप्टर्स संकेतों को प्राप्त करते हैं और कोशिकाओं के अंदर उन्हें संचारित (ट्रांसमिट) कर देते हैं। रिसेप्टर का एक हिस्सा कोशिका झिल्ली में सन्निहित होता है। और रिसेप्टर का दूसरा भाग झिल्ली के बाहर और भीतर उभर जाता है।
  • रिसेप्टर्स का भाग जो झिल्ली के बहार उभरा रहता है ,झिल्ली के आकर में परिवर्तन करता है | रिसेप्टर के बहरी भाग में इस परिवर्तन के जवाब में रिसेप्टर के आकर में एक दूरगामी परिवर्तन होता है जो कोशिका के अंदर अवस्थित होता है |
  • रिसेप्टर के आकर में यह परिवर्तन जो कोशिका के अंदर तैनात है अन्य प्रोटीन को बांधता है जिसे प्रभावोत्पादक कहा जाता है | यह प्रभावोत्पादक कोशिका में विशेष प्रभाव को उत्पन्न करता है , व अन्य कोशिका को सिग्नल भेजता है जो हमारे शरीर के शारीरिक परिवर्तन को संचालित करता है |

नए विधि के बारे में

    सामान्य समझ यह है कि प्रभावोत्पादक प्रोटीन को दो स्थानों पर एक साथ काम करना पड़ता है , एक रिसेप्टर के पिछले भाग में व दूसरा रिसेप्टर के केंद्र में | यह कार्य दवा को कोशिका के अंदर रिसेप्टर को अधिक सक्षम बनाने हेतु किया जाता है |
    रिसेप्टर शोधकर्ताओं के विशेष इंजीनियरिंग के माध्यम से मूल रूप से दो बाध्यकारी साइटों में एक जिसका नाम रिसेप्टर का केंद्र है जो इसमें बाधा डालता है |उन्होंने पाया कि दूसरे साइट के बिना भी प्रोटीन रिसेप्टर को कोशिका के अंदर रिसेप्टर के पृष्ठभाग को बांध कर खींचने में समर्थ है |
    कोर में एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है जिसे शोधकर्ताओं ने अनुवांशिक रूप से नष्ट कर दिया है जिसके कारन रिसेप्टर का कोर अप्रभावी बन गया है |

साइबर स्पेस की असुरक्षा

    भारत में एक ओर डिजिटलीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है, तो दूसरी ओर साइबर सुरक्षा पर संकट के बादल मंडराते नजर आ रहे हैं। दूरसंचार, बैंकिग और स्वास्थ्य सेवा जैसे साइबर से जुडे सभी क्षेत्रों पर यह संकट छाया हुआ है। भारत में साइबर सुरक्षा को तकनीकि विशेषज्ञों के भरोसे नही छोड़ा जाता । बडे़-बडे़ उद्यम और इंटरनेट का उपयोग करने वाले लोग कुछ उच्च क्षमता वाले साइबर सुरक्षा उपकरण लगाकर सुरक्षा अपनाना अधिक पसंद करते हैं। लेकिन अब साइबर अटैक में मानव लिप्त हो रहे हैं, और ये किसी खास उद्देश्य को लेकर किसी तरह का वायरस बनाते हैं, जो साइबर कार्यक्रम को बिगाड़ दे या उसे हैक करने के काम आए। स्टक्सनैट एक ऐसा साइबर कीड़ा था, जिसे अमेरिका और इजराइल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम में रुकावट डालने के लिए मिलकर तैयार किया था। इसी प्रकार भारत में कांग्रेस पार्टी, उद्योगपति विजय माल्या और पत्रकार बरखा दत्त के साइबर खातों को हैक करने की जिम्मेदारी ‘लीजन (Legion) नामक संस्था ने ली है। इसने ऐसे लोगों की साइबर सुरक्षा को भेदा है, जो जाने-माने लोग हैं, और संपर्क के लिए सुरक्षित साधनों का उपयोग करते हैं।

    ‘लीजन‘ संस्था ने भारतीय स्टैट बैंक व अन्य बैंकों के डाटा को भी हैक किया है। अगर यह ‘सिक्योर सोकेट लॉकर‘ (SSL) को हैक करने में सफल हो गए, तो भारतीय बैंकों और ग्राहकों को बहुत बड़ा वित्तीय नुकसान हो सकता है। अब, जबकि विमुद्रीकरण के बाद भारतीय जनता ज्यादा से ज्यादा डिजीटल लेन-देन की ओर झुक रही है, अगर ऐसा होता है, तो डिजीटल सुरक्षा पर जनता का विश्वास बिल्कुल खत्म हो जाएगा।

भारत में साइबर सुरक्षा के नाम पर क्या है ?

  • ‘लीजन‘ के साइबर अटैक ने भारत में साइबर सुरक्षा की पूरी पोल खोल दी है। हमारे देश पर हो रहे इस गुप्त और हानिकारक साइबर अटैक के पीछे अनेक संस्थागत, आर्थिक और सामाजिक कारण छिपे हुऐ हैं।
  • हमारी सरकार अति गोपनीय सूचनाओं की सुरक्षा के लिए अपरिहार्य ‘क्रिटिकल इन्फार्मेशन इंफ्रास्ट्रकचर‘ पर अभी तक काम नहीं कर पाई है। सरकार के मेल सर्वर को राष्ट्रीय सूचना-विज्ञान केन्द्र (National Informatics Center) देखता है। इसके अंतर्गत आने वाले उपभोक्ताओं ने अब इसके (Two Factor Authentication) पर भरोसा करने से मना कर दिया है। इसके जरिए ही सरकार की अतिगोपनीय सूचनाओं तक पहुंचा जा सकता है।
  • 2014 में एक राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा संयोजक की नियुक्ति की गई थी, परंतु राज्यों के साथ इनके संपर्क को बनाए रखने के लिए अभी तक अधिकारी नियुक्त ही नहीं किए गए हैं । हमारी कम्प्यूटर इमरजेंसी रिस्पोन्स टीम में भी कर्मचारियों की बहुत कमी है।
  • हमारी साइबर सुरक्षा में सेंध को बचाने और पकड़ने में निजी क्षे़त्र भी बराबर का दोषी है। अगर इंटरपोल की 2015 की रिपोर्ट को देखें, तो पता चलता है कि कम्प्यूटर रिस्पोन्स टीम ने साइबर सुरक्षा के एक लाख से ज्यादा मामलों को सुलझाया। इनमें से 10 से भी कम मामले लॉ एन्फोर्समेन्ट एजेंसियों के पास पंजीकृत हुए थे।

इंटरफेस और ई-कामर्स वेबसाइट के मामले में भी भारत में इलैक्ट्रॉनिक फ्रॉड होता है। हमारे देश में डाटा चोरी होने की स्थिति में रिपोर्ट करने के लिए कोई प्रतिमान तय नही है।एंड्रोयड या आईओएस पर उपलब्ध एप्लीकेशन ऑटोमैटिक अपडेट की अनुमति देते हैं । इससे उपभोक्ता की जानकारी के बिना ही कोई भी अपराध हो सकता है।सबसे बड़ी बात दृष्टिकोण की है। हमारे यहाँ के संभ्रात वर्ग के लोग भी साइबर सुरक्षा को वैकल्पिक समझते हैं । लीजन जैसी संस्था का काम इस प्रकार की लापरवारी से आसान हो जाता है।

साइबर सुरक्षा को लेकर सरकार की उदासीनता ने इसे बढ़ावा ही दिया है। विमुद्रीकरण के बाद सरकार ने उपकरणों और लेन-देन की सुरक्षा बढ़ाए बगैर ही जनता को डिजीटल लेन-देन की मजबूरी पर लाकर खडा कर दिया हैं। यह सब करना तो दूर रहा, उल्टे रिजर्व बैंक ने 2000 तक के ट्रांजैक्शन के लिए पहचान के दो साधन (Two means of Identification 2FA) की जरूरत को भी हटा दिया है। अगर व्यक्ति का फोन या अन्य उपकरण पहले से इंफैक्टेड़ है, तो (2FA)। के अभाव में बड़े लेन-देन को भी हैक किया जा सकता है।

डाटा हैकिंग का सिलसिला इंटरनेट उपभोक्ताओं के विश्वास को तोड़ सकता है। हमारी सरकार के डिजीटल इंडिया स्वप्न के लिए यह बहुत भारी पड़ सकता है।

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*