बी.टी. कॉटन : bt cotton

  • Home
  • बी.टी. कॉटन : bt cotton

बी.टी. कॉटन : bt cotton

बी.टी. कॉटन

देश की पहली आनुवंशिकीय परिवर्तित जीन वाली बीटी (बैसीलसभूरिनजीएनसिस बी.टी.) कपास की तीन प्रजातियों के व्यावसायिक उपयोग की अनुमति भारत सरकार ने 26 मार्च, 2002 को प्रदान कर दी। केन्द्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय की जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमेटी द्वारा मंजूर की गई बीटी कपास की तीन किस्मों में मैक-12, मैक-162 और मैक-184 शामिल हैं। इन किस्मों को बहुराष्ट्रीय कम्पनी मनसांटो की भारतीय अनुषंगी कम्पनी महाराष्ट्र हाइब्रिड सीड कम्पनी (म्हाइको) ने विकसित किया है तथा उसे ही इनके बीजों के व्यावसायिक उपयोग की अनुमति तीन वर्ष को लिये कुछेक शर्तों के साथ प्रदान की गयी है। इन शतों में निम्नलिखित शामिल हैं-

  • बीज अधिनियम की शर्तों को पूरा करना।
  • बीज पर लेबल लगाकर यह सूचित करना कि यह आनुवांशिकीय परिवर्तित बीज है।
  • बीजों के वितरकों एवं बिक्री के आँकड़ों को जीएएसी को उपलब्ध कराना।
  • बोये गये क्षेत्रफल की जानकारी उपलब्ध कराना।
  • विपणन कपनी म्हाइको द्वारा पर्यावरण और किसानों की हित रक्षा के अभिप्राय से वार्षिक आधार पर जांच करना तथा लगातार तीन वर्ष तक यह रिपोर्ट देना कि इन किस्मों में किसी प्रकार की बीमारी के जीवाणु तो पैदा नहीं हो रहे हैं।
  • बीटी कपास वाले प्रत्येक खेत की बाह्य परिधि पर रिफ्यूज यानी आश्रय या शरण नामक एक ऐसी भू-पट्टी बनाई जाए, जिसमें उसी प्रजाति की गैर-बीटी कपास यानी परंपरागत कपास उगाई जाए। यह भू-पट्टी कुल बुआई क्षेत्र का कम से कम 20 प्रतिशत हो या इसमें गैर-बीटी कपास की कम से कम पांच कतारें बनाई जा सक। यह शर्त हवा के माध्यम से दूसरी फसलों या कपास की फसल में ही परागन की निगरानी से संबंधित है।

उपरोक्त शर्तों के पालन से कई लाभ होंगे जैसे- कपास का उत्पादन व्यवस्थित और कई गुना हो सकेगा, उसे अमेरिकी बोलवॉर्म (सुंडी को रोगी वाला कीड़ा) से बचाया जा सकेगा, उत्तम और अधिक कपास से किसानों की आय बढ़ेगी तथा आस-पास के प्राकृतिक पेड़-पौधों को हानि नहीं पहुंचेगी। ज्ञातव्य है कि बीटी कपास में भूमिगत बैक्टीरिया बैसिलस थूरिनजिएनसिस का क्राई नामक जीन डाल दिया जाता है, जिससे पौधा स्वयं ही कीटनाशक प्रभाव पैदा करने लगता है और कीटनाशक दवा छिड़कने की आवश्यकता नहीं पड़ती। बीटों के कुछ विभेद पादप और पशुओं पर निर्भर करने वाले कृमियों, घोघों, प्रोटोजोआ और तिलचट्टों को भी नष्ट कर देता है। इसी विशिष्ट लक्षण के कारण यह बीटी नामक बैक्टीरिया कृषि के क्षेत्र में उपयोगी हैं। उल्लेखनीय है कि म्हाइको ने बीटी कपास की चार किस्मों के लिये आवेदन किया था लेकिन किस्म मैक-915 के संबंध में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् से परीक्षण परिणाम उपलब्ध न होने के कारण जीईएसी ने इसके व्यावसायिक उपयोग की अनुमति प्रदान नहीं की है।

बीटी कॉटन के लाभ

छिड़काव वाले अन्य परंपरागत संश्लेषित कीटनाशकों का उपयोग कर उगाये गये कपास की तुलना में बीटी कपास के लाभ निम्नलिखित हैं-

  • किसानों, खेतों में काम करने वाले मजदूरों और अन्य पेड़-पौधों पर कीटनाशकों का कोई बुरा असर नहीं पड़ता है।
  • कीटनाशकों के उपयोग में कमी से अधिक सुरक्षित पर्यावरण।
  • बारिश में बह जाने या कीटनाशक के खराब हो जाने से फिर से छिड़काव की आवश्यकता नहीं पड़ती।
  • कीटनाशकों के उपयोग से होने वाली दुर्घटनाओं और कानूनी विवाद कम हो जाते हैं।
  • पौधों के सभी हिस्सों में क्रिस्टल प्रोटीन बनाता है तथा यह क्रिस्टल प्रोटीन पूरे मौसम अपना असर दिखाता है।
  • लक्षित महामारी से फसल को खराब होने का खतरा कम हो जाता है।
  • बीटी कपास का उपयोग कीट नियंत्रण की अन्य विधियों को साथ किया जा सकता है।

बीटी काटन से खतरे

  • कीड़े-मकोड़े में प्रतिरोध क्षमता उत्पन्न होने वाली बीटी कपास की उपयोगिता कम हो सकती है।
  • रासायनिक छिड़काव के जरिये अन्य कीड़े-मकोड़ों और महामारियों के नियंत्रण की आवश्यकता के कारण इन कीड़ों को प्राकृतिक रूप से नुकसान पहुंचाना हानिकारक हो सकता है।
  • बीटी कपास के उत्पादन और उपयोग की लागत बहुत अधिक हो सकती है।
  • कीटनाशकों के छिड़काव वाले कपास के खेती के आसपास बीटी कपास उगाने से कीड़े-मकोड़े बीटी कपास के खेती में आ सकते हैं जिससे उत्पादन पर असर पड़ सकता है।
  • प्रतिरोध क्षमता वाली फसल के लिये कोई नये किस्म का हानिकारक कीट विकसित हो सकता है।
  • बीटी कपास का जीन कपास के निकट संबंध वाली किसी फसल या अन्य फसल प्रजाति में पहुंच सकता है।

COMMENTS (2 Comments)

Ishika Jan 28, 2020

Nice

Sanjeev kumar Jan 10, 2019

Very well explained

LEAVE A COMMENT

Notice: Undefined variable: req in /var/www/html/iashindi/wp-content/themes/iashindi/single.php on line 94
/>
Notice: Undefined variable: req in /var/www/html/iashindi/wp-content/themes/iashindi/single.php on line 99
/>

Search