प्रदूषण एवं इसके खतरे…..

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जल प्रदूषण

मानव क्रियाकलापों या प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा जल के रासायनिक , भौतिक ,तथा जैविक गुणों में परिवर्तन को जल प्रदूषण कहते है |

जल प्रदूषण के श्रोत–

जल के शुद्धता और गुणवत्ता को कम करने वाले तत्वों को जल प्रदूषक कहते है | इन प्रदूषकों की प्रकृति के आधार पर जल प्रदूषण के प्रायः दो प्रकार के श्रोत होते है —

प्राकृतिक श्रोत के द्वारा
मृदा अपरदन , भूमि स्खलन ,ज्वालामुखी उदगार व पौधों के सड़ने गलने से तथा मृत जीवों के विघटन व विनियोजन होकर शुद्ध जल में घूलकर शुद्ध जल को प्रदूषित कर देती है |

मानवीय श्रोत के द्वारा

मानवीय क्रिया कलाप के परिणामस्वरूप औद्योगिक नगरीय ,कृषि तथा अन्य सामाजिक क्रिया कलापों से निकले मानवीय अपशिष्ट जल की शुद्धता को नष्ट कर उसमे गंदगी मिला देते है |

मानव जनित जल प्रदूषण के श्रोत निम्न है

औद्योगिक अपशिष्ट

  • औद्योगिक इकाइयों से अपशिष्ट के रूप में विभिन्न प्रकार के रसायनों व घुलनशील गैसों से मिश्रित जल के बाहर निकलने को बहिस्राव कहते है |
    इस प्रकार के अपशिष्ट का किसी झील तालाब या नदियों में मिलने से वहां का जल दूषित हो जाता है |
  • कपडा ,रंगाई ,चीनी के कारखाने , चर्म उद्योग ,आदि तथा खाद्य संसाधनों में काम आने वाले रसायन , कीटनाशक बनाने वाले कारखानों का तरल विषैला अपशिष्ट प्राकृतिक जलश्रोत में पहुच कर उसे प्रदूषित कर रहा है |
  • नगरीय अपशिष्ट

  • कई बार घरों व रसोई का का कूड़ा कचरा ,पॉलीथीन की थैलिया , अनाज व सब्जी मंडियों के सड़े गले पदार्थ को जल श्रोत में डाल दिया जाता है जिससे जल प्रदूषित होता है |
  • कृषि जनित जल प्रदूषण

  • कृषि कार्य में उपयोग किए गए रासायनिक उर्वरकों कीटनाशक ,जीवाणुनाशक ,कवकनाशक आदि वर्षा जल या सिंचाई जल के माध्यम से भूमि में रिश कर भूमिगत जल श्रोत को प्रदूषित करता है |
  • भूमिगत जल श्रोतो जैसे नलकूप हैंडपंप आदि का उपयोग पीने के पानी के लिए किया जाता है |
  • तेल का प्रभाव

  • सागरीय तथा महासागरीय जल में तेल से भरे टैंकरों में कई बार रिसाव होने से तेल निकल कर सागर व महासागर में फ़ैल जाता है जिससे बड़ी संख्या में समुद्री जीव जंतुओं की मृत्यु हो जाती है |
  • कई बार तटीय भागों में पारिस्थितिकीय प्रकोप तथा विनाश की स्थिति उत्पन्न होती है
  • जल प्रदूषण के हानिकारक प्रभाव

  • प्रदूषित जल के उपयोग से ही तपेदिक ,पीलिया ,अतिसार ,मियादी ज्वर ,पैराटायफाइड ,पेचिस आदि जैसा खतरनाक बीमारियां फैलती है |
  • विषाक्त रसायन युक्त जल के सेवन से जलीय पौधों और जंतुओं की मृत्यु हो जाती है |
  • नदियां झीलों तालाबों के प्रदूषित जल द्वारा सिंचाई करने से फसल नष्ट हो जाती है |
  • मिटटी की उर्वरकता काम हो जाती है | अधिक लवणता युक्त जल से सिंचाई करने पर मिटटी में क्षारीयता बढ़ जाती है |
  • जल प्रदूषण पर नियंत्रण

    जल प्रदुषण पर नियन्तण के ली निम्न उपाए करने चाहिए —

  • घरेलू अपशिष्टों को नदी झील व अन्य प्राकृतिक जल श्रोतों में मिलाने पर रोक लगनी चाहिए |
  • कृषि में कीटनाशको व अन्य रसायनों का प्रयोग सिमित मात्रा में होना चाहिए |
  • मृत शरीर और जिव जंतुओं को जल श्रोत में नही डालना चाहिए |
  • औद्योगिक इकाइयों को इस बात के लिए मजबूर किया जाना चाहिए कि वो अपशिष्टों को बिना शोधित किए प्राकृतिक जल श्रोतों में न डालें |
  • सरकार व प्रशासन को जल प्रदूषण नियंत्रण नियमों को प्रदूषण फ़ैलाने वाली इकाई पर कठोरता से लगाने चाहिए |
  • मृदा प्रदूषण

    मृदा के भौतिक जैविक अथवा रासानियक गुणों में अवांछित परिवर्तन या बदलाव जिसका असर जीव-जंतुओं पादपों पर हो तथा जिससे मृदा कि प्राकृतिक गुणवत्ता व उपयोगिता नष्ट हो ,उसे मृदा प्रदूषण कहते है |
    मृदा के गुणवत्ता में अवनयन का तात्पर्य हैं,पवन या जलीय क्रियाओं द्वारा तेज़ी से मृदा का अपरदन व अपक्षय होना ,मिट्टी में रहने वाले सूक्ष्म जीवो में कमी हो जाना ,मिट्टी में नमीं कि मात्रा आवश्यकता से कम या अधिक हो जाना है ,तापमान में अत्यधिक उतार चढाव हो जाना ,मिट्टियों में ह्यूमस कि कमी हो जाना , तथा मिट्टियों में प्रदूषकों की मात्रा बहुत अधिक बढ़ जाना आदि |

    प्राकृतिक स्रोतों द्वारा मृदा प्रदूषण का मुख्य कारण ज्वालामुखी से निकलने वाले पदार्थ अथवा भूस्खलखन व वर्षा है |जबकि मानवीय गतिविधियों में औद्योगिक अपशिष्ट नगरीय अपशिष्ट व अत्यधिक खनन एवम कृषि आदि में अनियंत्रित रसायनों व कीटनाशकों का प्रयोग करना है |

    मृदा प्रदूषण के नियंत्रण के उपाय

    मृदा संसाधन को संचित रखने के लिए निम्न उपाय करने चाहिए —

  • औद्योगिक अपशिष्टों व नगरीय अपशिष्टोंओ को उपचार किए बिना निष्कासित करने पर पाबन्दी लगनी चाहिए |
  • कृषि में उर्वरक व रसायनों के कम से कम प्रयोग व ह्यूमस तथा प्राकृतिक खादों का प्रयोग बढ़ाना होगा |
  • अधिक से अधिक व्रिक्षारोपण तथा जैविक कृषि पद्धति अपनानी होगी , जल संसाधनों का संरक्षण करना होगा ताकि मरुस्थलीय के प्रभाव को रोक जा सके |
  • जल प्रबंधन के प्रभावी उपाए अपना कर जहाँ एक ओर सतही जल को संरक्षित करने व बाढ़ नियंत्रण द्वारा भूमिगत जल स्टार बढ़ने में मदद मिलेगी वहीं बीहड़ों (Ravines) व जल कटाव द्वारा भूतल के विनाश को रोक जा सके |
  • अनियंत्रित खनन पर रोक लगा कर हज़ारों तन चट्टान चूर्ण भूमि पर फैला कर किए जाने वाले नुकसान को रोक जा सकेगा
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    IBPS PO, 2017 7,8,13,14 OCTOBER
    UPSC MAINS 28 OCTOBER(5 DAYS)
    CDS 19 june - 4 FEB 2018
    NDA 22 APRIL 2018
    UPSC PRE 2018 3 JUNE 2018
    CAPF 12 AUG 2018
    UPSC MAINS 2018 1 OCT 18(5 DAYS)


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