बजटीय घाटा

  • Home
  • बजटीय घाटा

बजटीय घाटा

बजटीय घाटा

    जब सरकार राजस्व प्राप्ति से अधिक व्यय करती है, तो इस स्थिति को बजटीय घाटा कहते है.इस घाटे की पूर्ति के लिए कई उपाए किए जाते है, जिनका किसी अर्थव्यवस्था पर अलग अलग प्रभाव पड़ता है.

बजट 2017 -18

  • Revenue Deficit (राजस्व घाटा) – Revenue Expenditure – Revenue Receipt = 1.9%
  • Effective Revenue Deficit (प्रभावी राजस्व घाटा) = Revenue deficit – Grants used for creation of capital assets = .7%
  • Fiscal Deficit (राजकोषीय घाटा)= Total Reciept – Total expenditure + Market Borrowing = 3.2%
  • Primary Deficit (प्राथमिक घाटा)- Fiscal Deficit – Interest Payment on old loans = 0.1%

राजस्व घाटा :

  • राजस्व घाटा सरकार की राजस्व प्राप्तियों के ऊपर राजस्व व्यय के अधिशेष को बताता है .
  • राजस्व घाटा = राजस्व व्यय – राजस्व प्राप्तियां
  • राजस्व घाटे में केवल उन्हीं लेन देनों को शामिल किया जाता है , जिनसे सरकार के वर्तमान आय और व्यय पर प्रभाव पड़ता है.
  • जब सरकार को राजस्व घाटा प्राप्त होता है ,तो इससे संकेत मिलता है की सरकार निर्बचत कर रही है और अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों की बचतों का उपयोग अपने उपभोग संबंधी व्यय के कुछ हिस्सो को पूरा करने के लिए कर रही है.
  • इस स्थिति में ,सरकार को न केवल अपने निवेश के लिए अपनी उपभोग संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भी ऋण ग्रहण करना पड़ेगा.
  • इससे ऋणों और ब्याज दायित्वों का निर्माण होगा और सरकार को अंततोगत्वा अपने व्यय में भी कटौती करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा .
  • चूँकि राजस्व व्यय का एक बड़ा भाग व्यय के लिए प्रतिबद्ध होता है ,इसीलिए इसमें कटौती नही की जाएगी .
  • बहुधा सरकार उत्पादक पूंजीगत व्यय अथवा कल्याण संबंधी व्यय में कटौती करती है .
  • इसके परिणामस्वरूप विकास की गति धीमी होती है और कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है .
  • प्रभावी राजस्व घाटा = राजस्व घाटा – पूंजी परिसंपत्तियों के निर्माण के लिए इस्तेमाल अनुदान

राजकोषीय घाटा

  • राजकोषीय घाटा सरकार के कुल व्यय और ऋण – ग्रहण को छोड़कर कुल प्राप्तियों का अंतर है .
  • सकल राजकोषीय घाटा = कुल व्यय – कुल प्राप्तियाँ + बाजार उधार
  • गैर ऋण से सृजित पूंजीगत प्राप्तियां ऐसी प्राप्तियां है , जो ऋण ग्रहण के अन्तर्गत नही आती हैं,इसीलिए इससे ऋण में वृद्धि नही होती हैं . इसके उदाहरण हैं – ऋणों की वसूली और सार्वजनिक उपक्रमों की बिक्री से प्राप्त राशि .
  • राजकोषीय घाटे का वित्त पोषण ऋण ग्रहण के द्वारा ही किया जाएगा . अतः इससे सभी स्रोतों से सरकार के ऋण ग्रहण संबंधी आवश्यकताओं का पता चलता हैं .वित्तीय पक्ष से —
  • सकल राजकोषीय घाटा = निवल घरेलू ऋण – ग्रहण + भारतीय रिज़र्व बैंक से ऋण – ग्रहण + विदेशों से ऋण – ग्रहण
  • निवल घरेलू ऋण ग्रहण के अन्तर्गत ऋण उपकरणों (उदाहरणार्थ , विविध लघु बचत योजनाएं ) के माध्यम से सीधे जनता से प्राप्त ऋण और वैधानिक तरलता अनुपात (एस एल आर) के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप में व्यवसायिक बैंकों से प्राप्त ऋण आते हैं .
  • सकल राजकोषीय घाटा अर्थव्यवस्था के स्थायित्व और सार्वजनिक क्षेत्र की सुदृढ़ वित्तीय व्यवस्था के लिए एक निर्णायक चर हैं . इस प्रकार सकल राजकोषीय घाटा को मापा जा सकता हैं ,जैसा की देखा गया हैं कि राजस्व घाटा राजकोषीय घाटा का एक भाग हैं .
  • राजकोषीय घाटा = राजस्व घाटा + पूंजीगत व्यय – गैर ऋण से सृजित पूंजीगत प्राप्तियां .
  • राजकोषीय घाटे में राजस्व घाटे का एक बड़ा अंश यह दर्शाता हैं कि उधार का एक बड़ा हिस्सा उपभोग व्यय के लिए उपयोग किया जाता हैं न कि निवेश के लिए .

प्राथमिक घाटा

  • सरकार की ऋण ग्रहण आवश्यकताओं में संचित ऋण पर दायित्व शामिल होते हैं. प्राथमिक घाटे के माप का लक्ष्य वर्तमान राजकोषीय असुंतलन पर प्रकाश डालना है. वर्तमान व्यय के राजस्व से अधिक होने के कारण होने वाले ऋण – ग्रहण के आकलन के लिए हम प्राथमिक घाटे का परिकलन करते है . सरल भाषा में यह वह शेष है , जो राजकोषीय घाटे में से ब्याज अदायगी करने पर शेष राशि आती है .
  • सकल प्राथमिक घाटा = सकल राजकोषीय घाटा – निवल ब्याज दायित्व
  • निवल ब्याज दायित्वों में निवल घरेलू परिदाय पर सरकार द्वारा प्राप्त ब्याज प्राप्तियों से ब्याज अदायगी करने पर शेष राशि आती है, घाटे की वित्त व्यवस्था बजटीय घाटे के लिए वित्त पोषण या तो करारोपण या ऋण अथवा नोट छापकर किया जाना चाहिए .
  • सरकार प्रायः ऋण ग्रहण पर आश्रित रहती है ,जिसे सरकारी ऋण कहते हैं.घाटे और ऋण की संकल्पनाओं में निकट सम्बन्ध होता हैं .घाटा को एक प्रवाह के रूप में समझा जा सकता हैं ,जिससे ऋण के स्टॉक में वृद्धि होती हैं .
  • यदि सरकार का ऋण ग्रहण एक वर्ष के बाद दूसरे वर्ष भी जारी रहता हैं,तो इससे ऋण का संचय होता हैं और सरकार को ब्याज के रूप में अधिक से अधिक भुगतान करना पड़ता हैं .


  • COMMENTS (No Comments)

    LEAVE A COMMENT

    Search


    Exam Name Exam Date
    IBPS PO, 2017 7,8,13,14 OCTOBER
    UPSC MAINS 28 OCTOBER(5 DAYS)
    CDS 19 june - 4 FEB 2018
    NDA 22 APRIL 2018
    UPSC PRE 2018 3 JUNE 2018
    CAPF 12 AUG 2018
    UPSC MAINS 2018 1 OCT 18(5 DAYS)


    Subscribe to Posts via Email

    Enter your email address to subscribe to this blog and receive notifications of new posts by email.