वि-वैश्वीकरण : De-Globalisation

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वि-वैश्वीकरण : De-Globalisation

वि-वैश्वीकरण : De-Globalisation

वि-वैश्वीकरण (De-Globalisation) क्या है?

  • वि-वैश्वीकरण (De-Globalisation) शब्द का उपयोग आर्थिक और व्यापार जगत के आलोचकों द्वारा कई देशों की उन प्रवृत्तियों को उजागर करने के लिये किया जाता है जो फिर से उन आर्थिक और व्यापारिक नीतियों को अपनाना चाहते हैं जो उनके राष्ट्रीय हितों को सबसे ऊपर रखें।
  • ये नीतियाँ अक्सर टैरिफ अथवा मात्रात्मक बाधाओं का रूप ले लेती हैं जो देशों के बीच श्रम, उत्पाद और सेवाओं के मुक्त आवागमन में बाधा उत्पन्न करती हैं।
  • इन सभी संरक्षणवादी नीतियों का उद्देश्य आयात को महँगा बनाकर घरेलू विनिर्माण उद्योगों को रक्षा प्रदान करना और उन्हें बढ़ावा देना है।

वि-वैश्विकरण प्रवृतियों के कारण?

  • वैश्वीकरण के लाभों का असमान वितरण।
  • विकसित देशों में आय की बढ़ती असमानताएँ और रोज़गारों का नुकसान।
  • बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रसार और श्रम के मुक्त आवागमन के कारण विकसित देशों में ऐसी धारणाओं को बल मिला है कि विकासशील देशों के श्रमिकों के कारण विकसित देशों में रोज़गारों का नुकसान हुआ है।
  • इससे विकसित देशों में कठोर वीज़ा व्यवस्था और उद्योगों के स्थानांतरण की मांग को बढ़ावा मिला है।
  • 2008 में आई वैश्विक मंदी ने ऐसी स्थिति को और ज़्यादा गंभीर कर दिया फलस्वरूप पूरे विश्व में संरक्षणवादी नीतियों को अपनाने की मांग में वृद्धि हुई।
  • विभिन्न देशों में लोक-लुभावन राजनीतिक नेतृत्व के उदय से विश्व स्तर पर ऐसी प्रवृत्तियाँ तेज़ी से बढ़ी हैं।
  • ISIS जैसे आतंकवादी संगठनों के उदय, विकसित देशों में आतंकवादी हमलों की बढती घटनाएँ और उभरते नए सुरक्षा खतरों ने प्रवासी संकट को बढ़ावा दिया है।
  • इन कारकों के वैश्विक मंदी के साथ संयुक्त हो जाने से आर्थिक संरक्षणवाद की प्रवृतियाँ देखने को मिल रही हैं।

यह महत्त्वपूर्ण क्यों है?

  • हम अभी भी एक उच्च वैश्वीकृत दुनिया में रहते हैं और ऐसे संरक्षणवादी कदम उन बुनियादी नियमों के विपरीत है जिनके आधार पर वैश्विक विकास का अनुमान लगाया जाता है तथा विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसे संगठन वैश्विक व्यापार को विनियमित करते हैं।
  • जब बड़े, औद्योगीकृत और समृद्ध राष्ट्र वस्तुओं और सेवाओं के प्रवेश को कठिन बनाने के लिये आगे आते हैं तो इससे उनके कई व्यापारिक भागीदारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
  • वैश्विक आर्थिक विकास, मुद्रास्फीति और ब्याज दरों की सभी गणनाओं में फिर से गड़बड़ हो सकती है।
  • उदाहरण के लिये, अमेरिकी अर्थव्यवस्था चीन से बहुत सस्ती विनिर्मित वस्तुओं का आयात करती है। यदि टैरिफ युद्ध में अमेरिका में आयात की लागतें बढ़ती हैं, तो घरेलू मुद्रास्फीति में बहुत तेज़ी से वृद्धि हो सकती है और अमेरिकी ब्याज दरों में तेजी से बढ़ोतरी हो सकती हैं।

भारत पर प्रभाव

  • हाल ही में लिये गए इन टैरिफ निर्णयों का भारत पर ज़्यादा प्रभाव नहीं देखने को मिलेगा क्योंकि अमेरिका, भारत से अपने स्टील और एल्यूमिनियम के कुल आयात का केवल 1% ही प्राप्त करता है।
  • लेकिन सेवाओं और श्रम के संदर्भ में वि-वैश्वीकरण से सेवाओं के निर्यात एवं उच्च शिक्षा तथा नौकरियों के लिये विदेशों में प्रवास करने वाले भारतीय नागरिकों पर नकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकता है।

COMMENTS (2 Comments)

Pratikshamishra Feb 26, 2020

Thanku so much
For this ....

SURAJ KANT AZAD Apr 17, 2018

Nice Article

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