क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP)

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क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP)

क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) से भारत के बाहर निकलने के कारण तथा इससे आने वाली चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए
भूमिका
क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (RCEP) एक व्यापक क्षेत्रीय आर्थिक समझौता है। इसका उद्देश्य आसियान और इसके मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के भागीदार सदस्यों के बीच व्यापार नियमों को उदार एवं सरल बनाना है।समझौते के तहत सदस्य देशों को आयात और निर्यात पर लगने वाले टैक्स को या तो बहुत कम करना होगा या टैक्स से बाहर रखना होगा। इस समझौते की औपचारिक शुरुआत वर्ष 2012 में कंबोडिया के फ़्नोम पेन्ह में शुरू की गई थी।

विश्लेषण
लक्ष्य:
RCEP के का लक्ष्य सदस्य देशों में आर्थिक वृद्धि एवं समान आर्थिक विकास, अग्रिम आर्थिक सहयोग और क्षेत्र में व्यापक एकीकरण को बढ़ावा देना है।इसका उद्देश्य वस्तु एवं सेवा व्यापार, निवेश, आर्थिक तथा तकनीकी सहयोग, बौद्धिक संपदा और विवाद समाधान हेतु कार्य करना है। वर्ष 2017 में इसके 16 हस्ताक्षरकर्त्ता पक्षों (इसमें भारत भी शामिल था) ने 3.4 बिलियन जनसंख्या का प्रतिनिधित्व किया जो कि विश्व की लगभग आधी जनसंख्या के बराबर है, वहीं इनका कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 21.4 ट्रिलियन डॉलर था जो कि विश्व की जीडीपी का 39 प्रतिशत है।

उद्देश्य

आसियान सदस्य राष्ट्रों एवं आसियान के FTA भागीदारों के मध्य एक आधुनिक, व्यापक, उच्च-गुणवत्तापूर्ण तथा पारस्परिक रूप से लाभकारी आर्थिक साझेदारी समझौता करना।

भारत और RCEP

भारत नवंबर 2019 में आसियान + 3 शिखर सम्मेलन के दौरान आरसीईपी से बाहर हो गया है, जिसका मुख्य कारण हैं भारत के व्यापार घाटे में वृद्धि। मुक्त व्यापार समझौते के बाद आसियान, कोरिया एवं जापान के साथ भारत के व्या‍पार घाटे में वृद्धि हुई है। RCEP द्वारा प्रस्तावित भारत की 92% वस्तुएँ अगले 15 वर्षों तक टैरिफ मुक्त होंगी। अतः भारत को मौज़ूदा सभी वस्तुओं में 90% तक तक टैरिफ कम करना पड़ेगा। चूँकि आयात शुल्क भी भारत के लिये राजस्व का एक मुख्य स्रोत है अतः इस रियायत से सीमा शुल्क राजस्व के अनुपात में कमी हो सकती है।चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 53 बिलियन डॉलर है, सीमा शुल्क में अधिक कमी या इसे हटाने से चीन से सस्ते उत्पादों का अधिक आयात होगा।

भारत द्वारा दर्ज की गई आपत्तियाँ:

टैरिफ का आधार वर्ष: RCEP के परिणामस्वरूप सभी सदस्य देशों के टैरिफ में कमी आएगी। चूँकि वार्ता वर्ष 2013 में शुरू हुई थी,अतः समझौते में प्रस्तावित है कि आयात प्रशुल्क को कम करने के लिये 2013 आधार वर्ष होगा। हालाँकि भारत आयात प्रशुल्क को कम करने का आधार बदलकर वर्ष 2019 करना चाहता था। क्यूंकि भारत ने वर्ष 2014 से कई उत्पादों के सीमा शुल्क में वृद्धि की है। जैसे भारत ने वस्त्र, ऑटो उपकरणों एवं इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं जैसे क्षेत्रकों के टैरिफ में औसतन 13% से 17% तक की वृद्धि की है।
ऑटो-ट्रिगर तंत्र: आयात में अचानक उछाल आने पर ऑटो-ट्रिगर तंत्र का उपयोग किया जाता है। यह निर्णय लेने की अनुमति देगा कि कोई देश किन उत्पादों पर समान रियायतें नहीं देना चाहता है।

रैचेट ऑब्लिगेशन: भारत रैचेट ऑब्लिगेशन से मुक्ति चाहता है। रैचेट ऑब्लिगेशन का अर्थ है कि यदि कोई देश किसी अन्य देश के साथ व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करता है एवं टैरिफ हटाता या कम करता है तो वह इस फैसले से वापस नहीं हट सकता है और न ही अधिक प्रतिबंधात्मक उपाय अपना सकता है।

डेटा स्थानीयकरण: RCEP के हिस्से के रूप में भारत चाहता है कि सभी देशों को डेटा की सुरक्षा का अधिकार मिले।

सेवा क्षेत्रक: भारत ने मांग की है कि आसियान देशों को अपने सेवा क्षेत्र को खोलना चाहिये ताकि भारतीय पेशेवर उनके बाज़ार में आसानी से प्रवेश कर सकें। हालाँकि आसियान देश इस क्षेत्र के बारे में बहुत संवेदनशील हैं एवं उन्होंने एक-दूसरे के सामने भी उदारीकरण की पेशकश नहीं की है।
डेयरी: भारतीय घरों में दूध एवं डेयरी आश्रित अन्य उत्पादों की खपत को देखते हुए डेयरी भारत के लिये महत्त्वपूर्ण है। न्यूज़ीलैंड डेयरी उत्पादों का एक निर्यातक है तथा दूध पाउडर एवं वसायुक्त उत्पाद बेचने के लिये इसकी नज़र भारत पर होगी। भारत, दूध एवं दुग्ध उत्पादों के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक है और अभी तक इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर रहा है तथा कभी-कभी अतिरिक्त उत्पादन करता है। न्यूज़ीलैंड का प्रवेश इस परिदृश्य में परिवर्तन ला सकता है।
ऑटोमोबाइल: RCEP के कारण चीन से ऑटोमोबाइल उपकरणों की “बैक-डोर एंट्री” हो सकती है।

आगे की राह

मौज़ूदा समझौतों को सुदृढ़ करना: आसियान, जापान और कोरिया के साथ व्यापार एवं निवेश समझौते, साथ ही मलेशिया एवं सिंगापुर के साथ द्विपक्षीय व्यवस्था को मज़बूत किया जाना चाहिये।
उत्पादों की मार्केटिंग: भारतीय उत्पादों की मौज़ूदा बाजारों के साथ-साथ अन्य देशों जहाँ भारत का कम निर्यात है, वहाँ भी उत्पादों की मार्केटिंग की जानी चाहिये। भारतीय उद्योग जिनका इन बाज़ारों में व्यवसाय है, को लक्षित प्रचार रणनीतियों से लाभ मिल सकता है यदि भारतीय उत्पाद प्रतिस्पर्द्धी हों एवं उन्हें वरीयता दी जाए।
निर्यात विविधता: अफ्रीका एक तेज़ी से विकसित होने वाला महाद्वीप जिसकी निर्यात में हिस्सेदारी लगभग 9% है तथा लैटिन अमेरिका का भी वर्तमान निर्यात मात्र 3% है, यहाँ निर्यात बढ़ाकर भारत लाभान्वित हो सकता है।
व्यापक आर्थिक सुधार: विशेष रूप से भूमि, श्रम और पूंजी बाजारों में आर्थिक सुधार होने चाहिये। यह समग्र विनिर्माण निवेशों को आवश्यक प्रोत्साहन प्रदान करेगा। घरेलू विनिर्माण के लिये व्यापार की लागत कम करना, सही बुनियादी अवसंरचना का निर्माण करना, सीमाओं पर तेज़ी से और अधिक कुशल व्यापार सुविधाएँ सुनिश्चित करना आदि।

निर्यात लक्ष्य में वृद्धि: अपने निर्माताओं और निर्यातकों को बाज़ारों के बारे में जानकारी प्रदान करना, विशेष रूप से छोटे उद्यमों को विपणन प्रयासों के माध्यम से सहायता करना। प्रतिबद्ध एजेंसियाँ बनाना एवं विदेशों में पेशेवर विपणन विशेषज्ञ युक्त कार्यालय स्थापित करना, जो निर्यात को बढ़ावा दें तथा संपूर्ण विश्व के प्रमुख बाज़ारों में भारतीय निर्यातकों के साथ खरीदारों को जोड़ने का काम करें।

निष्कर्ष
भारत को अन्य भौगोलिक क्षेत्रों में नए अवसरों की खोज करते हुए मौज़ूदा समझौतों का बेहतर ढंग से उपयोग करना चाहिए तथा हमारे बाज़ारों के साथ-साथ हमारे निर्यात में भी विविधता लानी चाहिए ।

COMMENTS (1 Comment)

sneha kumari Jun 10, 2020

very relevent topic..and well analysed...thanx sir for providing such materials...

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