कृषक आंदोलन 1857 – 1947

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प्रस्तावना

यहाँ पर मैं ‘राजीव अहीर’ की पुस्तक’आधुनिक भारत का इतिहास’ से कुछ मुख्य बिंदु लिख रहा हूँ ताकि आप अपने दिमाग में एक खाँचा खींच सके |

उपनिवेशवाद के अधीन भारतीय कृषि व्यवस्था
अंग्रेज़ो द्वारा भारतीय कृषि में व्यापक परिवर्तन किए जाने से देश के कृषि जगत में हलचल पैदा हो गई तथा भारतीय कृषक निर्धनता की बेड़ियों से जकड़ गए | उपनिवेशवाद के अधीन भारतीय कृषि की निर्धनता के निम्न प्रमुख कारण थे —

  • उपनिवेशवादी आर्थिक नीतियां |
  • भारतीय हस्तशिल्प के विनाश से भूमि पर अत्यधिक दबाव |
  • नयी भू- राजस्व व्यवस्था तथा उपनिवेशवादी प्रशासनिक एवं न्यायिक व्यवस्था |
  • भारतीय कृषक लगान की ऊंची दरों ,अवैध करों ,भेदभाव पूर्ण बेदखली एवं ज़मींदारी क्षेत्रों में बेगार जैसी बुराइयों से त्रस्त थे |रैयतवाड़ी क्षेत्रों में सरकार किसानों से लगभग 50 % कर लेती थी | इन कठिनाइयों के बोझ से दबे किसान ,अपनी जीविका के एकमात्र साधन को बचाने के लिए महाजनों से ऋण लेने हेतु विवश हो जाते थे | ये महाजन उन्हें अत्यंत ऊंची दरों पर ऋण देकर उन्हें ऋण के जाल में फांस लेते थे | अनेक अवसरों पर किसानों को अपनी भूमि एवं पशु भी गिरवी रखने पड़ते थे |कभी – कभी ये सूदखोर या महाजन किसानों की गिरवी रखी गयी संपत्ति को भी जब्त कर लेते थे |इन सभी कारणों से कृषक धीरे धीरे निर्धन, लगानदाता व मज़दूर बन कर रह गए | बहुत से कृषकों ने कृषि कार्य छोड़ दिया , कृषि भूमि रिक्त पड़ने लगी तथा कृषि उत्पादन कम होने लगा |
    कृषकों पर किए जा रहे शोषण ने उन्हें उपनिवेशवादी ताकत के विरुद्ध विरोध करने के लिए मज़बूर कर दिया |
    कुछ प्रारंभिक कृषक आंदोलन–
    नील आंदोलन
    नील आंदोलन की शुरुआत बंगाल में नदियां जिले के गोविंदपुर गांव में किसानों के द्वारा हुआ | दिगंबर विश्वास एवं विष्णु विश्वास के नेतृत्व में किसानों ने विद्रोह करके इस आंदोलन की शुरुआत की |
    पृष्ठभूमि
    यूरोपीय बाजार के मांग की पूर्ति के लिए नील उत्पादकों ने किसानों को नील की खेती के लिए बाध्य किया|जिस उपजाऊ जमीन पर चावल की अच्छी खेती हो सकती थी ,उस पर किसानों की निरक्षरता का लाभ उठाकर झूठे करार द्वारा नील की खेती करायी जाती थी |करार के समय किसानों को मामूली रकम अग्रिम के रूप में दी जाती थी |यदि किसान अग्रिम वापस करके भी शोषण से मुक्ति का प्रयास करता था तो उसे ऐसा नही करने दिया जाता था |इसी के विरोध में किसानों ने विद्रोह किया|
    विद्रोह का प्रभाव

  • सरकार ने विद्रोह का बलपूर्वक दमन शुरू कर दिया |
  • किसानों ने जमींदारों को लगान अदा करना बंद कर दिया |
  • बंगाल के बुद्धिजीवी खुल कर किसानों के पक्ष में सामने आए |जैसे हरिश्चन्द्र मुख़र्जी के पत्र ‘हिन्दू पैट्रियट’ ने किसानों का पूर्ण समर्थन किया |दीनबंधु मित्र ने ‘नील दर्पण’ के द्वारा गरीब किसान के दयनीय स्थिति का वर्णन किया आदि |
  • सरकार ने नील उत्पादन की समस्यायों पर सुझाव देने के लिए नील आयोग का गठन किया |इस आयोग की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने एक अधिसूचना जारी की ,जिसमे किसानों को यह आश्वासन दिया गया कि उन्हें नील उत्पादन के लिए विवश नही किया जाएगा तथा सभी सम्बंधित विवाद को संवैधानिक तरीके से हल किया जाएगा |
  • पबना विद्रोह

    बंगाल में ज़मींदारों के द्वारा किसानों पर क़ानूनी सीमा से बहुत अधिक करारोपण किया जाता था और मनमानी कारगुजारियां बड़े पैमाने पर किया जाता था |इसके विरोध में 1873 – 76 के बीच में किसान आंदोलन हुआ जिसे पबना विद्रोह के नाम से जाना जाता है |
    पबना जिले के यूसुफशाही परगने में 1873 में किसान संघ कि स्थापना कि गई |इस संघ के अधीन किसान संगठित हुए और उन्होंने लगान हड़ताल कर दी और बढ़ी हुई दर पर लगान देने से मना कर दिया | किसानों कि यह लड़ाई मुख्यतः क़ानूनी मोर्चे पर ही लड़ी गई थी |
    सुरेन्द्रनाथ बनर्जी , आनंद मोहन बोस और द्वारका नाथ गांगुली ने इंडियन एसोसिएशन के मंच से आंदोलनकारियों की मांग का समर्थन किया |


    दक्कन विद्रोह 1875
    पश्चिमी भारत के दक्कन क्षेत्र में प्रारम्भ इस विरोध का मुख्य कारण रैयतवाड़ी बंदोबस्त के अन्तर्गत किसानों पर आरोपित किए गए भारी कर थे |इन क्षेत्रो में भी किसान करो के भारी बोझ से दबे थे तथा महाजनों के कुचक्र में फंसने की विवश थे |
    1864 में अमेरिकी गृह युद्ध के समाप्त हो जाने के बाद कपास की कीमत में भारी गिरावट आई , जिससे महाराष्ट्र के किसान बुरी तरह प्रभावित हुए | और महाजनों के ऋण का दवाब इनपर बढ़ता चला गया |
    इस आंदोलन के अन्तर्गत किसानों ने महाजनों का सामूहिक बहिष्कार प्रारम्भ किया |
    इस आंदोलन के अन्तर्गत किसानों ने महाजनों की दुकानों से खरीदारी करने तथा उनके खेतों में मज़दूरी करने से इंकार कर दिया |नाइयों , धोबियों और चर्मकारों ने भी महाजनों की किसी प्रकार की सेवा करने से इंकार कर दिया |धीरे धीरे यह सामाजिक बहिष्कार कृषि दंगो में परिवर्तित हो गया जिसके फलस्वरूप किसानों ने महाजनों और सूदखोरों के घरों पर हमले किए और ऋण संबंधी कागजात को लुट लिए गए और जला दिए गए |

    1857 के पश्चात किसान आंदोलनों का परिवर्तित रूप —

  • किसान आंदोलन में किसान प्रमुख शक्ति बन कर उभरे तथा अब उन्होंने अपनी मांगों के लिए सीधे लड़ना प्रारम्भ कर दिया |
  • उनकी मांगे मुख्यतः आर्थिक समस्यायों से सम्बद्ध थी |
  • किसानों के मुख्य दुश्मन विदेशी बागान मालिक , जमींदार , महाजन एवं सूदखोर थे |
  • इनके आंदोलन विशिष्ट तथा सीमित उद्देश्यों एवं उनके व्यक्तिगत समस्यायों से सम्बंधित होते थे |
  • इन आंदोलन में उपनिवेशवाद के विरुद्ध आवाज़ नही उठाई गई |
  • इन आंदोलन में निरंतरता तथा दीर्घकालीन संगठन का आभाव था |
  • प्रसार क्षेत्र सीमित थे |
  • दुर्बलताएं

  • इन आंदोलनकारियों में उपनिवेशवाद के चरित्र को समझने का आभाव था |
  • इस समय के किसानों में नई विचारधारा का आभाव था तथा उनके आंदोलन में सामाजिक , राजनितिक व आर्थिक कार्यक्रम सम्मिलित नही किए जाते थे |
  • इन संघर्षों का स्वरुप उग्रवादी था |
  • सकारात्मक दृष्टिकोण का आभाव था |

  • 20 वीं शताब्दी में कृषक आंदोलन

    20 वीं शताब्दी में कृषक विद्रोह ,पिछली शताब्दी के विद्रोहों से अधिक व्यापक ,प्रभावी ,संगठित व सफल थे |इन आंदोलनों ने भारतीय स्वतंत्रा संघर्ष की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई |
    कुछ महत्वपूर्ण किसान आंदोलन—-
    किसान सभा आंदोलन
    होमरूल लीग की गतिविधियों के कारण उत्तर प्रदेश में किसान सभाओं का गठन किया गया | फरवरी 1918 में गौरीशंकर मिश्र ,इंद्रा नारायण द्विवेदी तथा मदन मोहन मालवीय ने उत्तर प्रदेश किसान सभा का गठन किया |इनसे जुड़े कुछ और प्रमुख नेता थे -झिंगुरी सिंह , दुर्गापाल सिंह ,बाबा रामचंद्र , जवाहर लाल नेहरू आदि |इसकी लगभग 500 शाखाएं खोली गई |
    राष्ट्रवादी नेताओं में मतभेद के कारण अक्टूबर 1920 में अवध किसान सभा का गठन किया गया | अवध किसान सभा ने किसानों को बेदखल जमीन न जोतने और बेगार न करने की अपील की |
    एका आंदोलन
    1921 में उत्तर प्रदेश के उत्तरी जिलों हरदोई ,बहराइच तथा सीतापुर में किसान एकजुट होकर आंदोलन पर उतर आए |
    इस बार आंदोलन के निम्न कारण थे —

  • उच्च लगान दर |
  • राजस्व वसूली में जमींदारों के द्वारा अपने गई दमनकारी नीतियां |
  • बेगार की प्रथा |
  • इस एका आंदोलन में किसानों को प्रतीकात्मक धार्मिक रीति रिवाज़ों का पालन करने का निर्देश दिया जाता था |
    इस आंदोलन का नेतृत्व निचले तबके के किसानों – मदारी पासी आदि ने किया |
    मोपला विद्रोह
    मोपला केरल के मालाबार तट के मुस्लिम किसान थे , जहाँ जमींदारी के अधिकार मुख्यतः हिंदुओं के हाथों में थी |
    विद्रोह के मुख्य कारण थे–

  • लगान की उच्च दरे |
  • नजराना एवम अन्य दमनकारी तरीके |

  • बारदोली सत्याग्रह —

    1926 में गुजरात के सूरत में स्थानीय प्रशासन ने भू – राजस्व की दरों में 30 % वृद्धि की घोषणा की | कांग्रेसी नेताओं व स्थानीय लोगों ने इसका तीव्र विरोध किया | विरोध के उपरांत सरकार ने समस्या के समाधान हेतु बारदोली जांच आयोग का गठन किया | आयोग ने अपने रिपोर्ट में कहा कि भू राजस्व के दरों में की गई वृद्धि अन्यायपूर्ण व अनुचित है |
    प्रमुख बिंदु

  • फरवरी 1926 में बारदोली की महिलाओं ने बल्लभ भाई पटेल को सरदार की उपाधि से विभूषित किया |
  • आंदोलन को संगठित करने के लिए बारदोली सत्याग्रह पत्रिका का प्रकाशन किया गया |
  • आंदोलन के समर्थन में के एम मुंशी तथा लालजी नारंजी ने बम्बई विधानपरिषद की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया |
  • बम्बई में रेलवे हड़ताल का आयोजन किया गया |
  • सरकार ने ब्लूमफील्ड व मैक्सवेल के नेतृत्व में समिति बनाई ,जिन्होंने भू राजस्व को घटाकर 6.03% अर दिया |

  • अखिल भारतीय किसान कांग्रेस सभा

    इस सभा की स्थापना 1936 में लखनऊ में की गई | स्वामी सहजानंद सरस्वती इस सभा के अध्यक्ष तथा एन जी रंग सचिव चुने गए |इस सभा ने किसान घोषणा पत्र जारी किया तथा इंदु लाल याज्ञीक के निर्देशन में एक पत्र का प्रकाशन किया गया |

    तेभागा आंदोलन
    यह आंदोलन बंगाल के सबसे प्रमुख कृषक आंदोलनों में से एक था | इस आंदोलन में मांग की गई थी की फसल का दो तिहाई हिस्सा किसानों को दिया जाए |इस आंदोलन में बंगाल किसान सभा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी | यह आंदोलन बटाईदारों के द्वारा जोतदारों के विरुद्ध चलाया गया था | बंगाल की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों –मुफ्फर अहमद ,सुनील सेन तथा मोनी सिंह ने इस आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाई |



    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका, यह भगीरथ प्रयास निःसंदेह हिन्दी माध्यम के प्रतियोगी साथियों का उत्साह बढायेगा …..

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