द्वितीय विश्वयुद्ध: SECOND WORLD WAR

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प्रस्तावना

    प्रथम विश्व युद्ध की विभीषिका से त्रस्त होकर तथा भविष्य में इसे रोकने के लिए 1919 में राष्ट्र संघ की स्थापना की गई थी, परंतु यह द्वितीय विश्वयुद्ध को रोकने में पूर्णत: विफल रहा. 20 वर्षों की छोटी अवधि में ही दूसरा विश्वयुद्ध हुआ जो पहले से भी अधिक प्रलयंकारी था. इस युद्ध के अनेक कारण प्रथम विश्व युद्ध के कारणों से मिलते जुलते हैं. 1939 की स्थिति 1914 से बहुत अधिक भिन्न नहीं थी. यूरोपिय गुटबंदियों,सैन्यवाद तथा साम्राज्यवाद की द्वितीय विश्वयुद्ध में भी अहम भूमिका थी.

द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण

द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे —-
वर्साय की अपमानजनक संधि

    द्वितीय विश्वयुद्ध के बीज वर्साय की संधि मे ही बो दिए गए थे. मित्र राष्ट्रों ने जिस प्रकार का अपमानजनक व्यवहार जर्मनी के साथ किया उसे जर्मन जनमानस कभी भी भूल नहीं सका. जर्मनी को इस संधि पर हस्ताक्षर करने को विवश कर दिया गया. संधि की शर्तों के अनुसार जर्मन साम्राज्य का एक बड़ा भाग मित्र राष्ट्रों ने उस से छीन कर आपस में बांट लिया. उसे सैनिक और आर्थिक दृष्टि से पंगु बना दिया गया. अतः जर्मन वर्साय की संधि को एक राष्ट्रीय कलंक मानते थे. मित्र राष्ट्रों के प्रति उनमें प्रबल प्रतिशोध की भावना जगी. हिटलर ने इस मनोभावना को और अधिक उभारकर सत्ता हथिया ली. सत्ता में आते ही उसने वर्साय की संधि की धज्जियां उड़ा दी और घोर आक्रामक नीति अपना कर दूसरा विश्व युद्ध आरंभ कर दिया.

तानाशाही शक्तियों का उदय

    प्रथम विश्वयुद्ध के बाद यूरोप में तानाशाही शक्तियों का उदय और विकास हुआ. इटली में मुसोलिनी और जर्मनी में हिटलर तानाशाह बन बैठे. प्रथम विश्वयुद्ध में इटली मित्र राष्ट्रों की ओर से लड़ा था परंतु पेरिस शांति सम्मेलन में उसे कोई खास लाभ नहीं हुआ. इससे इटली में असंतोष की भावना जगी इसका लाभ उठा कर मुसोलिनी ने फासीवाद की स्थापना कर सारी शक्तियां अपने हाथों में केंद्रित कर ली. वह इटली का अधिनायक बन गया. यही स्थिति जर्मनी में भी थी. हिटलर ने नाजीवाद की स्थापना की तथा जर्मनी का तानाशाह बन बैठा. मुसोलिनी और हिटलर दोनों ने आक्रामक नीति अपनाई दोनों ने राष्ट्र संघ की सदस्यता त्याग दी तथा अपनी शक्ति बढ़ाने में लग गए. उनकी नीतियों ने द्वितीय विश्वयुद्ध को अवश्यंभावी बना दिया.

साम्राज्यवादी प्रवृत्ति

    द्वितीय विश्वयुद्ध का एक प्रमुख कारण बना साम्राज्यवाद. प्रत्येक साम्राज्यवादी शक्ति अपने साम्राज्य का विस्तार कर अपनी शक्ति और धन में वृद्धि करना चाहता था. इससे साम्राज्यवादी राष्ट्र में प्रतिस्पर्धा आरंभ हुई. 1930 के दशक में इस मनोवृति में वृद्धि हुई. आक्रामक कार्यवाहियां बढ़ गई. 1931 में जापान ने चीन पर आक्रमण कर मंचूरिया पर अधिकार कर लिया. इसी प्रकार 1935 में इटली ने इथोपिया पर कब्जा जमा लिया. 1935 में जर्मनी ने राइनलैंड पर तथा 1938 में ऑस्ट्रिया पर विजय प्राप्त कर उसे जर्मन साम्राज्य में मिला लिया. स्पेन में गृहयुद्ध के दौरान हिटलर और मुसोलिनी ने जनरल फ्रैंको को सैनिक सहायता पहुंचाई. फ्रैंको ने स्पेन में सत्ता हथिया ली.

यूरोपीय गुटबंदी

    जर्मनी की बढती शक्ति से आशंकित होकर यूरोपीय राष्ट्र अपनी सुरक्षा के लिए गुटों का निर्माण करने लगे. इसकी पहल फ्रांस ने की. उसने जर्मनी के इर्द-गिर्द के राष्ट्रों का एक जर्मन विरोधी गुट बनाया. इसके प्रत्युत्तर में जर्मनी और इटली ने एक अलग गुट बनाया. जापान भी इस में सम्मिलित हो गया. इस प्रकार जर्मनी इटली और जापान का त्रिगुट बना. यह राष्ट्र धुरी राष्ट्र के नाम से विख्यात हुए. फ्रांस इंग्लैंड अमेरिका और सोवियत संघ का अलग ग्रुप बना जो मित्र राष्ट्र के नाम से जाना गया यूरोपीय राष्ट्रों की गुटबंदी ने एक दूसरे के विरुद्ध आशंका घृणा और विद्वेष की भावना जगा दी.

हथियार बंदी की होड़

    प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात निरस्त्रीकरण के लिए काफी प्रयास किए गए परंतु यह प्रयास विफल रहा. साम्राज्यवादी प्रतिद्वंदिता और राष्ट्र ग्रुप के निर्माण ने पुनः हथियार बंदी की होड आरंभ कर दी. जर्मनी और फ्रांस इस दिशा में सबसे आगे बढ़ गए. 1932 में जिनेवा निरस्त्रीकरण सम्मेलन आयोजित किया गया परंतु यह सफल नहीं हो सका. 1933 तक संपूर्ण यूरोप में सामरिक वातावरण व्याप्त गया. फ्रांस ने अपनी सीमा पर मैगिनो लाइन का निर्माण किया और जमीन के भीतर मजबूत किलाबंदी दी कि जिससे कि जर्मन आक्रमण को फ्रांस की सीमा पर ही रोका जा सके. इसके जवाब में जर्मनी ने अपनी पश्चिमी सीमा को सुदृढ़ करने के लिए सीजफ्रेड लाइन बनाई. इन सैनिक गतिविधियों ने युद्ध को अवश्यंभावी बना दिया.

विश्व आर्थिक मंदी का प्रभाव

    1929-30 की विश्व आर्थिक मंदी ने भी द्वितीय विश्वयुद्ध में योगदान किया. इसके परिणाम स्वरुप उत्पादन घट गया. बेरोजगारी और भुखमरी बढ़ गई .उद्योग धंधे कृषि व्यापार सब पर आर्थिक मंदी का बुरा प्रभाव पड़ा. जर्मनी की स्थिति सबसे बुरी थी. हिटलर ने इस स्थिति के लिए वर्साय की संधि को उत्तरदाई बताया. इससे उसकी शक्ति में वृद्धि हुई और वह तानाशाह बन बैठा. इसके साथ-साथ अपनी अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने तथा बेरोजगारों को सेना में नौकरी देने के लिए भी युद्ध आवश्यक माना जाने लगा.

तुष्टीकरण की नीति

    तुष्टीकरण की नीति भी द्वितीय विश्वयुद्ध का एक कारण बनी. किसी भी यूरोपियों राष्ट्र ने जर्मनी, इटली की आक्रामक नीति को रोकने का प्रयास नहीं किया. वस्तुतः 1917 की बोल्शेविक क्रांति के बाद साम्यवाद की बढ़ती शक्ति से इंग्लैंड और फ्रांस खतरा महसूस कर रहे थे. दूसरी ओर जर्मनी इटली और जापान धुरी राष्ट्र संवाद के विरोधी थे. इसलिए इंग्लैंड और फ्रांस चाहते थे कि फांसीवादी शक्तियां धुरी राष्ट्र साम्यवाद का विरोध करें और वह सुरक्षित रहें. इस तुष्टीकरण की नीति की प्रतिमूर्ति ब्रिटिश प्रधानमंत्री चेंबरलेन था. इसलिए जर्मनी, इटली, जापान और स्पेन के मामलों में इंग्लैंड और फ्रांस ने हस्तक्षेप नहीं किया. इससे फासीवादी शक्तियों के हौसले बढ़ते गए .

म्यूनिख समझौता

    चेकोस्लोवाकिया पर जर्मनी की निगाहें लगी थी. चेकोस्लोवाकिया जर्मनी के लिए औद्योगिक और सामाजिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण था. इसलिए हिटलर ने चेकोस्लोवाकिया के एक भाग सुडेटनलैंड पर अपना दावा पेश किया. यहां अस्त्र-शस्त्र बनाने का बड़ा कारखाना था. यहां बड़ी संख्या में जर्मन भी निवास करते थे. अतः हिटलर ने यह धमकी दी कि अगर चेकोस्लोवाकिया जर्मनी को सुडेटनलैंड नहीं देता है तो वह चेकोस्लोवाकिया पर आक्रमण कर इसे बलपूर्वक ले लेगा. इस समस्या के समाधान के लिए म्यूनिख समझौता 1938 हुआ. इसमें हिटलर की शर्तें मान ली गई. हिटलर ने सुडेटनलैंड पर अधिकार कर लिया. 1939 में उसने संपूर्ण चेकोस्लोवाकिया हड़प लिया. इससे जर्मनी, इटली के हौसले बढ़ गए.

सामूहिक कार्यवाही तथा जन मोर्चा की विफलता

    फासीवादी शक्तियों की आक्रामक नीति का सामना करने के लिए सोवियत संघ और अन्य राष्ट्रों ने सामूहिक कार्यवाही की योजना बनाई. फ्रांस में जनमोर्चा फासीवादी शक्तियों के विपरीत सफल रहा. परंतु अन्य राष्ट्रों में यह प्रयोग विफल रहा.

राष्ट्र संघ की विफलता

    द्वितीय विश्वयुद्ध का प्रमुख कारण राष्ट्र संघ की विफलता थी. इसकी स्थापना युद्धों की पुनरावृति को रोकने एवं विश्व शांति को बनाए रखने के लिए की गई थी. परंतु यह अपने उद्देश्यों में विफल रहा. यह महाशक्तियों के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं कर सका. अपनी निजी सेना के अभाव, बड़े राष्ट्रों के दबाव तथा अन्य बहुत सी दुर्बलताओं के कारण राष्ट्र संघ की उपयोगिता समाप्त हो गई. जापान, जर्मनी, और इटली राष्ट्र संघ से अलग होकर मनमानी करने लगे. राष्ट्र संघ उन्हें रोक नहीं सका. इस से छोटे राष्ट्रों का विश्वास राष्ट्र संघ से उठ गया.

तत्कालीन कारण

    1939 तक यूरोप पर युद्ध के बादल छा गए थे. अप्रैल 1939 में हिटलर ने पोलेंड से डोजिंग बंदरगाह तथा पोलिस गलियारा जर्मनी को वापस करने की मांग रखी. पोलैंड ने इसे स्वीकार नहीं किया. इससे अंतर्राष्ट्रीय संकट उत्पन्न हो गया. इस समस्या को सुलझाने के काफी प्रयास हुए परंतु वे भी विफल हो गए. इस बीच पोलैंड ने इंग्लैंड और फ्रांस के साथ संधि कर ली. इनके द्वारा पोलैंड को आश्वासन दिया गया कि जर्मनी द्वारा आक्रमण की स्थिति में इंग्लैंड तथा फ्रांस पोलैंड की सैनिक सहायता करेंगे. दूसरी ओर पोलैंड द्वारा वार्ता के लिए जर्मनी की उपेक्षा से क्रुद्ध होकर हिटलर ने 1 सितंबर 1939 को पोलैंड पर आक्रमण कर दिया. 3 सितंबर को इंग्लैंड और फ्रांस ने भी जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी. इस प्रकार द्वितीय विश्वयुद्ध का आरंभ हो गया.

द्वितीय विश्वयुद्ध का उत्तरदायित्व

  • यह विवादास्पद है की द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए उत्तरदाई कौन था. सामान्यता वर्साय की अपमानजनक संधि, राष्ट्र संघ की विफलता ,विश्व आर्थिक मंदी जैसे कारणों को द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए उत्तरदाई माना जाता है.
  • वास्तविकता यह है कि 1938 तक वर्साय की संधि के अनेक आपत्तिजनक प्रावधानों को समाप्त किया जा चुका था, तथा जर्मनी एक शक्तिशाली राष्ट्र के रुप में उभर चुका था.
  • अनेक इतिहासकारों का मानना है कि हिटलर पोलैंड पर अधिकार कर प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी की पराजय का बदला लेना चाहता था. साथ ही पोलैंड और सोवियत संघ पर अधिकार कर वह साम्यवाद के प्रसार को रोकना चाहता था. इसलिए हिटलर की नीतियां ही मुख्य रूप से द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए उत्तरदाई बनी.
  • अनेक विद्वान इंग्लैंड और फ्रांस की तुष्टिकरण की नीति को द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए उत्तरदाई मानते हैं. म्यूनिख समझौता के समय इंग्लैंड के प्रधानमंत्री चेंबरलेन द्वारा चेकोस्लोवाकिया की सहायता नहीं किए जाने से भी हिटलर को सुडेटनलैंड पर अधिकार करने का अवसर मिल गया.
  • कुछ विद्वानों का यह भी विचार है कि सोवियत संघ और जर्मनी की संधि भी युद्ध के लिए उत्तरदाई थी. सोवियत संघ को जर्मनी के साथ संधि करने की जगह पोलैंड और पश्चिमी राष्ट्रों के साथ संधि करनी चाहिए थी. इस से भयभीत होकर हिटलर शांति व्यवस्था को भंग करने का प्रयास नहीं करता.
  • इस प्रकार द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए हिटलर के अतिरिक्त इंग्लैंड फ्रांस और सोवियत संघ भी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से उत्तरदाई थे फिर भी अधिकांश इतिहासकार हिटलर और उसके नाजीवाद को द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए उत्तरदाई मानते हैं.

द्वितीय विश्वयुद्ध की प्रमुख घटनाएं

युद्ध का आरंभ

    1 सितंबर 1939 को को पोलैंड पर जर्मन आक्रमण के साथ ही द्वितीय विश्वयुद्ध का बिगुल बज उठा. शीघ्र ही इंग्लैंड और फ्रांस ने भी जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी. उधर जर्मनी ने पोलैंड पर अधिकार कर लिया. 1 सितंबर 1939 से 9 अप्रैल 1940 तक का काल नकली युद्ध अथवा फोनी वार का काल माना जाता है क्योंकि इस अवधि में युद्ध की स्थिति बने रहने पर भी कोई वास्तविक युद्ध नहीं हुआ. 9 अप्रैल 1940 को जर्मनी ने नॉर्वे तथा डेनमार्क पर आक्रमण कर उन पर अधिकार कर लिया. जून 1940 तक जर्मन सेना ने बेल्जियम और हॉलेंड के अतिरिक्त फ्रांस पर भी अधिकार कर लिया. बाध्य होकर फ्रांस को आत्मसमर्पण करना पड़ा. फ्रांस के बाद इंग्लैंड की बारी आई. जर्मन बमवर्षकों ने इंग्लैंड पर हवाई आक्रमण कर उसे बर्बाद करने की योजना बनाई. परंतु इंग्लैंड की लड़ाई में जर्मनी को सफलता नहीं मिली. वह इंग्लैंड पर अपना अधिपत्य नहीं जमा सका. जून 1941 में जर्मनी ने सोवियत संघ पर आक्रमण कर एक बड़े क्षेत्र पर अधिकार कर लिया परंतु सोवियत संघ ने मास्को की ओर जर्मन सेना को आगे बढ़ने से रोक कर उसे वापस लौटने को विवश कर दिया.

युद्ध का विस्तार

    1941 से यूरोप के अतिरिक्त पूर्वी एशिया भी युद्ध की लपेट में आ गया. 7 दिसंबर 1941 को जापान ने पर्ल हार्बर के अमेरिकी नौसैनिक अड्डे पर आक्रमण कर दिया. फलतः अमेरिका भी युद्ध में सम्मिलित हो गया. जापान ने शीघ्र ही मलाया, वर्मा, इंडोनेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड इत्यादि पर अधिकार कर लिया. भारत पर भी जापानी आक्रमण का खतरा मंडराने लगा. इस प्रकार युद्ध में इंग्लैंड, फ्रांस, सोवियत संघ, अमेरिका, चीन तथा अन्य मित्र राष्ट्र एक पक्ष में तथा दूसरे पक्ष में जर्मनी, इटली, और जापान आ गए. अब युद्ध का प्रसार तेजी से हुआ. मास्को की ओर बढ़ने से रोकने पर जर्मनी ने सोवियत संघ के दक्षिणी भाग पर आक्रमण कर दिया. सितंबर 1942 में जर्मन सेनाएं स्तालिनग्राद तक पहुंच गई. परन्तु स्तालिनग्राद के युद्ध में जर्मनी की पराजय हुई. यहां से जर्मनी की पराजय की प्रक्रिया आरंभ हो गई. सोवियत संघ ने चेकोस्लोवाकिया और रोमानिया जो जर्मनी के नियंत्रण में थे पर अपना आधिपत्य जमा लिया. सोवियत संघ ने जर्मनी के विरुद्ध दूसरा मोर्चा फ्रांस के नारमंडी में खोल दिया. इससे जर्मन सेना को दो मोर्चो पर लड़ना पड़ा. फलतः उसकी शक्ति कमजोर पड़ती गई. अमेरिका के युद्ध में सम्मिलित हो जाने से भी धुरी राष्ट्रों की शक्ति कमजोर पड़ने लगी.

युद्ध का अंत

    1944 में पराजित होकर इटली ने आत्म समर्पण कर दिया. इससे जर्मन शक्ति को आघात लगा. स्तालिनग्राद के युद्ध में जर्मनी को परास्त कर सोवियत सेना आगे बढ़ते हुए बर्लिन जर्मनी तक पहुंच गई. बाध्य होकर 7 मई 1945 को हिटलर को आत्मसमर्पण करना पड़ा. 6 और 9 अगस्त 1945 को अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहर पर परमाणु बम गिरा कर उन्हें पूर्णता नष्ट कर दिया. लाखों की संख्या में निर्दोष व्यक्ति मारे गए बाध्य होकर जापान को भी आत्मसमर्पण करना पड़ा. इस प्रकार विनाशकारी द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हो गया.

द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणाम

द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणाम प्रथम विश्वयुद्ध से अधिक निर्णायक हुए. इसके सिर्फ विनाशकारी प्रभाव ही नहीं हुई, बल्कि कुछ प्रभाव ऐसी भी है जिससे विश्व इतिहास की धारा बदल गई तथा एक नए विश्व का उदय और विकास हुआ. द्वितीय विश्वयुद्ध के निम्नलिखित परिणाम हुए
धन-जन का भीषण संघार

    द्वितीय विश्वयुद्ध में प्रथम विश्वयुद्ध की तुलना में धन-जन की अधिक क्षति हुई. एक अनुमान के अनुसार, इस युद्ध में दोनों पक्षों के 5 करोड़ से अधिक लोग मारे गए जिनमें सर्वाधिक संख्या सोवियतों की थी. लाखों बेघर हो गए. इससे पुनर्वास की समस्या उठ खड़ी हुई. लाखों यहूदियों की हत्या कर दी गई. घायलों की गिनती ही नहीं की जा सकती थी. परमाणु बम से हिरोशिमा और नागासाकी पूरी तरह नष्ट हो गए. इसी प्रकार युद्ध में बेहिसाब संपत्ति भी नष्ट हुई. अनुमान था सिर्फ इंग्लैंड में करीब 2000 करोड़ रुपए मूल्य की संपत्ति नष्ट हुई. सोवियत संघ की संपूर्ण राष्ट्रीय संपत्ति का चौथा भाग युद्ध की भेंट चढ़ गया. इतना विनाशकारी युद्ध पहले कभी नहीं हुआ था.

औपनिवेशिक युग का अंत

    द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सभी साम्राज्यवादी राज्यों को एक-एक कर अपनी उपनिवेशों से हाथ धोना पड़ा. उपनिवेशों में राष्ट्रीयता की लहर तेज हो गई. स्वतंत्रता आंदोलन तेज हो गए. फलतः एशिया के अनेक देश यूरोपीय दासता से मुक्त हो गए. यूरोपीय राष्ट्रों की शक्ति और साधन इतने कमजोर हो गए कि वह उपनिवेशों पर अपना कब्जा जमाए रखने में सक्षम नहीं र.हे इसलिए वर्मा, मलाया इत्यादि स्वतंत्र हो गए. 1947 में भारत भी अंग्रेजी दासता से मुक्त हो गया.

फासीवादी शक्तियों का सफाया

    युद्ध में पराजित होने के बाद धुरी राष्ट्रों के दुर्दिन आ गए. जर्मन साम्राज्य का बड़ा भाग उससे छिन गया. इटली को भी अपने सभी अफ्रीकी उपनिवेश खोने पड़े. जापान को भी उन क्षेत्रों को वापस करना पड़ा जिन पर वह अपना अधिकार जमाए हुए था. इन राष्ट्रों की आर्थिक सैनिक स्थिति भी दयनीय हो गई.

इंग्लैंड की स्थिति का कमजोर पड़ना

    अब तक विश्व राजनीति में इंग्लैंड ब्रिटेन की प्रमुख भूमिका थी. वह एक शक्तिशाली राष्ट्र था. परंतु द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उसकी स्थिति दुर्बल हो गई.भारत सहित उसके सभी उपनिवेश स्वतंत्र हो गए तथा विश्व राजनीति में उस का दबदबा घट गया.

सोवियत संघ और अमेरिका की शक्ति में वृद्धि

    द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात जर्मनी, इटली, इंग्लैंड और फ्रांस के स्थान पर सोवियत संघ और अमेरिका का प्रभाव विश्व राजनीति में बढ़ गया. इन्हीं दोनों देशों के इर्द-गिर्द युद्धोत्तर राजनीतिक घूमने लगी.

साम्यवाद का तेजी से प्रसार

    द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात सोवियत संघ के नेतृत्व में साम्यवाद का तेजी से प्रसार हुआ. पूर्वी यूरोप के अनेक देशों एशियाई देशों चीन. उत्तर कोरिया इत्यादि देशों में साम्यवाद का प्रसार हुआ. साम्यवाद के प्रसार से फासीवादी और साम्राज्यवादी शक्तियों की कमर टूट गई. वह पुनः सिर उठाने लायक नहीं रहे.

विश्व का दो खेमो में विभाजन

    द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात अमेरिका और सोवियत संघ विश्व के 2 महान शक्तिशाली देश बन गए. अमेरिका पूंजीवाद और सोवियत संघ साम्यवाद का समर्थक था. यद्यपि सोवियत संघ को युद्ध में अपार क्षति हुई थी तथापि उसने शीघ्र ही अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ कर ली. अमेरिका की स्थिति पहले से ही मजबूत थी. अतः यूरोपिय और एशियाई देश सहायता के लिए सोवियत संघ एवं अमेरिका की ओर आकृष्ट हुए. दोनों ने और विकसित और विकासशील देशों को अपने प्रभाव में लेना आरंभ कर दिया. फलतः विश्व के राष्ट्र दो खेमों में बंट गए. पूर्वी यूरोप चीन और दक्षिण पूर्व एशिया के राष्ट्र सोवियत संघ के प्रभाव में आए. इसी प्रकार पश्चिमी यूरोप और एशिया के कुछ राष्ट्र पूंजीवादी व्यवस्था के समर्थक बनकर अमेरिका के प्रभाव में चले गए. सोवियत संघ और अमेरिका दोनो अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने में लग गए. इससे शीत युद्ध आरंभ हुआ इसकी समाप्ति सोवियत संघ के विघटन के बाद ही हुई .

गुटनिरपेक्षता की नीति

    इन दो खेमों में जाने की अपेक्षा कुछ एशियाई ,अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों ने अपनी स्वतंत्र स्थिति बनाए रखने का प्रयास किया. इसी प्रकार विश्व राजनीति में एक तीसरी शक्ति के रूप में असंलग्न राष्ट्रों का उदय हुआ. गुटनिरपेक्ष आंदोलन का तेजी से प्रसार हुआ. इस आंदोलन में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

जर्मनी का विघटन

    द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी को दो भागों में विभक्त कर दिया गया. पश्चिमी जर्मनी और पूर्वी जर्मनी. पश्चिमी जर्मनी को इंग्लैंड अमेरिका और फ्रांस तथा पूर्वी जर्मनी को सोवियत संघ के संरक्षण में रखा गया. बर्लिन की दीवार बनाकर इसका विभाजन किया गया. विगत वर्षों में जर्मनी का पुनः एकीकरण कर बर्लिन की दीवार तोड़ दी गई है तथा जर्मनी पर से विदेशी आधिपत्य समाप्त कर दिया गया है.

वैज्ञानिक प्रगति

    द्वितीय विश्वयुद्ध में वैज्ञानिक खोजों में प्रगति हुई. कुछ वैज्ञानिक आविष्कार तो मानव सभ्यता के लिए लाभदायक थे, परंतु कुछ के घातक परिणाम भी हुए .प्राकृतिक रबर के स्थान पर कृत्रिम रबर का विकास किया गया. संक्रामक बीमारियों से रक्षा के नए उपाय खोजे गए. अमेरिका में पेनिसिलिन का उत्पादन बड़े पैमाने पर हुआ.रक्त के प्लाज्मा निकालने की विधि खोजी गई जिससे घाव से होने वाली मृत्यु की संख्या में कमी आई. इसी प्रकार युद्ध के लिए बमवर्षक विमानों, जेट इंजन एवं रॉकेट का निर्माण किया गया. रेडार का भी विकास किया गया. सबसे महत्वपूर्ण था परमाणु बम का निर्माण, जिसका उपयोग अमेरिका ने जापान के विरुद्ध किया. युद्ध की समाप्ति के बाद परमाण्विक हथियारों के निर्माण की दौड़ विश्व में आरंभ हो गई है. इससे विश्व युद्ध का खतरा पुनः बज गया है.

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना

    द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन की आवश्यकता पुनः प्रतीत हुई, जिससे कि विश्व शांति बनाए रखी जा सके एवं विश्व युद्ध की पुनरावृति को रोका जा सके. अमेरिका के पहल पर 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र नामक संस्था की स्थापना की गई.