साइमन कमीशन Simon Commission ,नेहरू रिपोर्ट Nehru Report ,जिन्ना की चौहद सूत्रीय मांगे Fourteen Points of Jinnah

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साइमन कमीशन Simon Commission

  • वर्ष 1919 के एक्ट को पारित करते समय ब्रिटिश सरकार ने यह घोषणा की थी कि वह दस वर्ष पश्चात् पुनः इन सुधारों की समीक्षा करेगी। किन्तु नवंबर 1927 में ही उसने आयोग की नियुक्ति की घोषणा कर दी, जिसका नाम भारतीय विधिक आयोग था। सर जॉन साइमन इसके अध्यक्ष तथा सभी सातों सदस्य श्वेत थे। कालांतर में सर जॉन साइमन के कारण इसे ‘साइमन आयोग’ के नाम से ही जाना जाने लगा।
  • इस आयोग को वर्तमान सरकारी व्यवस्था, शिक्षा के प्रसार तथा प्रतिनिधि संस्थाओं के अध्ययन के पश्चात यह रिपोर्ट देनी थी कि भारत में उत्तरदायी सरकार की स्थापना कहां तक लाजिमी है तथा भारत इसके लिये कहां तक तैयार है।
  • यद्यपि संवैधानिक सुधारों के संबंध में ब्रिटिश सरकार द्वारा अगला कदम 1929 में उठाया जाना था, किन्तु ब्रिटेन की तत्कालीन सत्तारूढ़ पार्टी कंजरवेटिव पार्टी, विपक्षी लेबर पार्टी से भयभीत थी तथा ब्रिटेन के सर्वाधिक बहुमूल्य उपनिवेश के भविष्य के प्रश्न को संभवतः सत्तारूढ़ होने वाली लेबर पार्टी के लिये नहीं छोड़ना चाहती थी।
  • कंजरवेटिव या रूढ़िवादी दल के तत्कालीन सेक्रेटरी आफ स्टेट लार्ड बिरकनहेड का मानना था कि भारत के लोग, संवैधानिक सुधारों हेतु एक सुनिश्चित योजना बनाने में सक्षम नहीं हैं। फलतः इसीलिये उन्होंने साइमन कमीशन की नियुक्ति की।

साइमन कमीशन ने जो संस्तुतियां प्रस्तुत दी, (उन्हें 1930 में प्रकाशित किया गया।) उनमें सुझाव दिया गया था कि-

  • प्रांतीय क्षेत्रों में कानून तथा व्यवस्था सहित सभी क्षेत्रों में उत्तरदायी सरकार-गठित की जाये।
  • केंद्रीय विधान मण्डल का मण्डलों द्वारा अप्रत्यक्ष तरीके से चुने जायें।
  • केंद्र में उत्तरदायी सरकार का गठन न किया जाये क्योंकि इसके लिये अभी उचित समय नहीं आया है।
  • भारत में साइमन कमीशन के विरुद्ध त्वरित तथा तीव्र जनारोष पैदा हो गया। भारतीय जनारोष का प्रमुख कारण किसी भी भारतीय को कमीशन का सदस्य न बनाया जाना तथा भारत में स्वशासन के संबंध में निर्णय, विदेशियों द्वारा किया जाना था। चूंकि भारतवासी यह समझते थे कि भारत का संविधान भारतीयों को ही बनाना चाहिए, अतः कमीशन में किसी भी भारतीय सदस्य को न लिये जाने से उन्होंने यह अनुमान लगाया की अंग्रेज, भारतीयों को स्वशासन क्र योग्य नहीं समझते हैं।

कांग्रेस की प्रतिक्रिया

    कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन (दिसम्बर 1927) में एम.ए. अंसारी की अध्यक्षता में कांग्रेस ने ‘प्रत्येक स्तर एवं प्रत्येक स्वरूप’ में साइमन कमीशन के बहिष्कार का निर्णय किया। इस बीच नेहरू के प्रयासों से अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पारित हो गया। किसान-मजदूर पार्टी, लिबरल फेडरेशन, हिन्दू मह्रासभा तथा मुस्लिम लीग ने कांग्रेस के साथ मिलकर कमीशन के बहिष्कार की नीति अपनायी। जबकि पंजाब में संघवादियों (unionists) तथा दक्षिण भारत में जस्टिस पार्टी ने कमीशन का बहिष्कार न करने का निर्णय किया।

जन प्रतिक्रियाः

  • 3 फरवरी 1928 को साइमन कमीशन बंबई पहुंचा। इसके बंबई पहुंचते ही देश के सभी प्रमुख नगरों में हड़तालों एवं जुलूसों का आयोजन किया गया। जहां कहीं भी कमीशन गया, उसका स्वागत काले झंडों तथा ‘साइमन गो बैक’ के नारों से किया गया। केंद्रीय विधानसभा ने भी साइमन का स्वागत करने से इंकार कर दिया।
  • साइमन कमीशन के विरुद्ध जनारोष का सबसे प्रमुख तथ्य यह था कि इसमें बड़ी संख्या में युवाओं ने भाग लिया तथा पहली बार राजनीतिक भागेदारी का अनुभव प्राप्त किया।
  • युवाओं में विरोध प्रदर्शन की चेतना उभरने से मौलिक समजवादी विचारों के अंकुरण एवं विकास को उर्वर भूमि प्राप्त हुई जिसका प्रभाव पंजाब नौजवान सभा, मजदूर एवं किसान दल तथा हिन्दुस्तानी सेवा समिति (कर्नाटक) जैसे संगठनों में परिलक्षित हुआ।

पुलिस का दमनः

    पुलिस ने साइमन कमीशन के विरुद्ध प्रदर्शनकारियों पर दमन का चक्र चलाया तथा कई स्थानों पर उसने लाठियां बरसायीं। यहां तक कि उसने वरिष्ठ नेताओं को भी नहीं बख्शा। जवाहरलाल नेहरू तथा जी.बी. पंत को लखनऊ में बुरी तरह पीटा गया। लाहौर में प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व कर रहे लाला लाजपत राय पर तो लाठियों के संघातिक प्रहार किये गये कि वे बुरी तरह जख्मी हो गये तथा 17 नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु हो गयी।

साइमन कमीशन की नियुक्ति का प्रभावः
भारतीय राजनीति में साइमन कमीशन की नियुक्ति के प्रभाव को मुख्य दो रूपों में देखा जा सकता है-

  • इसने मौलिक राष्ट्रवादी ताकतों को, जो पूर्ण स्वराज्य के साथ समाजवादी आधार पर सामाजिक-आर्थिक सुधारों की मांग कर रहीं थीं, और उत्तेजित कर दिया।
  • इसने लार्ड बिरकनहैड की इस चुनौती को कि भारतीय सर्वसम्मत संविधान का निर्माण करके दिखाएं, मुहंतोड़ जवाब दिया। इससे, भारतीयों की इस अवसर पर असाधारण एकता प्रदर्शित हुई।

नेहरू रिपोर्ट Nehru Report

    1928 में तत्कालीन भारत सचिव लार्ड बिरकनहेड ने भारतीयों को ऐसे संविधान के निर्माण को चुनौती दी जो सभी गुटों एवं दलों को मान्य हो। इस चुनौती को स्वीकार कर फरवरी एवं मई 1928 में, देश के विभिन्न विचारधाराओं के नेताओं का एक सर्वदलीय सम्मेलन बुलाया गया। यह सम्मेलन पहले दिल्ली फिर पुणे में आयोजित किया गया। सम्मेलन में भारतीय संविधान का मसविदा तैयार करने हेतु मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक उप-समिति का गठन किया गया। अली इमाम, सुभाष चंद्र बोस, एम. एस. एनी, मंगल सिंह, शोएब कुरैशी, जी. आई. प्रधान तथा तेजबहादुर सप्रू उप-समिति के अन्य सदस्य थे। देश के संविधान का प्रारूप तैयार करने की दिशा में भारतीयों का यह पहला बड़ा कदम था। अगस्त 1928 में इस उप-समिति ने अपनी प्रसिद्ध रिपोर्ट पेश की, जिसे नेहरु रिपोर्ट के नाम से जाना जाता है। इस रिपोर्ट की सभी संस्तुतियों को एकमत से स्वीकार कर लिया गया। रिपोर्ट में भारत को डोमिनियन स्टेट्स का दर्जा दिये जाने की मांग पर बहुमत था लेकिन राष्ट्रवादियों के एक वर्ग को इस पर आपत्ति थी। वह डोमिनियन स्टेट्स के स्थान पर पूर्ण स्वतंत्रता का समर्थन कर रहा था। लखनऊ में डा. अंसारी की अध्यक्षता में पुनः सर्वदलीय सम्मेलन हुआ, जिसमें नेहरू रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया गया।



नेहरू रिपोर्ट की मुख्य सिफारिशें

    1- भारत को पूर्ण औपनिवेशिक स्वराज्य का दर्जा मिले तथा उसका स्थान ब्रिटिश शासन के अधीन अन्य उपनिवेशों के समान ही हो।
    2- सार्वजनिक निर्वाचन प्रणाली को समाप्त कर दिया जाये, जो कि अब तक के संवैधानिक सुधारों का आधार था; इसके स्थान पर संयुक्त निर्वाचन पद्धति की व्यवस्था हो; केंद्र एवं उन राज्यों में जहां मुसलमान अल्पसंख्यक हों, उनके हितों की रक्षा के लिये कुछ स्थानों को आरक्षित कर दिया जाये (लेकिन यह व्यवस्था उन प्रांतों में नहीं लागू की जाये जहां मुसलमान बहुसंख्यक हों जैसे-पंजाब एवं बंगाल)।
    3- भाषायी आधार पर प्रांतों का गठन
    4- संघ बनाने की स्वतंत्रता तथा वयस्क मताधिकार जैसी मांगें सम्मिलित थीं।
    5- केंद्र तथा राज्यों में उत्तरदायी सरकार की स्थापना की जाये।

    • केंद्र में भारतीय संसद या व्यवस्थापिका के दो सदन हों- निम्न सदन (हाउस आफ रिप्रेजेंटेटिव) की सदस्य संख्या 500 हो; इसके सदस्यों का निर्वाचन वयस्क मताधिकार द्वारा प्रत्यक्ष चुनाव पद्धति से हो। उच्च सदन (सीनेट) की सदस्य संख्या 200 हों; इसके सदस्यों का निर्वाचन परोक्ष पद्धति से प्रांतीय व्यवस्थापिकाओं द्वारा किया जाये। निम्न सदन का कार्यकाल पांच वर्ष तथा उच्च सदन का कार्यकाल सात वर्ष हो; केंद्र सरकार का प्रमुख गवर्नर-जनरल हो, जिसकी नियुक्ति ब्रिटिश सरकार द्वारा की जायेगी; गवर्नर-जनरल, केंद्रीय कार्यकारिणी परिषद की सलाह पर कार्य करेगा, जो कि केंद्रीय व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होगी।
    • प्रांतीय व्यवस्थापिकाओं का कार्यकाल पांच वर्ष होगा। इनका प्रमुख गवर्नर होगा, जो प्रांतीय कार्यकारिणी परिषद की सलाह पर कार्य करेगा।

    6- मुसलमानों के धार्मिक एवं सांस्कृतिक हितों को पूर्ण संरक्षण
    7- पूर्णधर्म निरपेक्ष राज्य की स्थापना, राजनीति से धर्म का प्रथक्करण।
    8- कार्यपालिका को विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी बनाया जाये
    9- केंद्र और प्रांतों में संघीय आधार पर शक्तियों का विभाजन किया जाये किन्तु अवशिष्ट शक्तियां केंद्र को दी जायें।
    10- सिन्ध को बम्बई से पृथक कर एक पृथक प्रांत बनाया जाये
    11- उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत की ब्रिटिश भारत के अन्य प्रांतों के समान वैधानिक स्तर प्रदान किया जाये।
    12- देशी राज्यों के अधिकारों एवं विशेषाधिकारों को सुनिश्चित किया जाये। उत्तरदायी शासन की स्थापना के पश्चात ही किसी राज्य की संघ में सम्मिलित किया जाए।
    13- भारत में एक प्रतिरक्षा समिति, उच्चतम न्यायालय तथा लोक सेवा आयोग की स्थापना की जाये।

मुस्लिम एवं हिन्दू साम्प्रदायिक प्रतिक्रियाः

    नेहरू रिपोर्ट के रूप में देश के भावी संविधान के रुपरेखा का निर्माण ,राष्ट्रवादी नेताओं की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। यद्यपि प्रारंभिक अवसर पर रिपोर्ट के संबंध में उन्होंने प्रशंसनीय एकता प्रदर्शित की किन्तु सांप्रदायिक निर्वाचन के मुद्दे को लेकर धीरे-धीरे अनेक विवाद उभरने लगे।
    प्रारंभ में दिसम्बर 1927 में मुस्लिम लीग के दिल्ली अधिवेशन में अनेक प्रमुख मुस्लिम नेताओं ने भाग लिया तथा एक प्रस्ताव पारित किया। इस प्रस्ताव में सम्मिलित 4 मांगों को उन्होंने संविधान के प्रस्तावित मसौदे में सम्मिलित किए जाने की मांग की। दिसम्बर 1927 के कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन में इन मांगों को स्वीकार कर लिया गया तथा इसे दिल्ली प्रस्ताव की संज्ञा दी गयी। ये चार मांगें इस प्रकार थीं-

  • पृथक निर्वाचन प्रणाली को समाप्त कर संयुक्त निर्वाचन पद्धति की व्यवस्था की जाये, जिसमें कुछ सीटें मुसलमानों के लिये आरक्षित की जायें।
  • केंद्रीय विधान मंडल में मुसलमानों के लिये एक-तिहाई स्थान आरक्षित किये जायें।
  • पंजाब और बंगाल के विधान मंडलों में जनसंख्या के अनुपात में मुसलमानों के लिये स्थान आरक्षित किये जायें।
  • सिंध, बलूचिस्तान एवं उत्तर-पश्चिमी सीमांत नामक 3 मुस्लिम बहुल प्रान्तों का गठन किया जाये।
    यद्यपि हिन्दू मह्रासभा ने तीन मुस्लिम बहुल प्रांतों के गठन तथा पंजाब एवं बंगाल जैसे मुस्लिम बहुत प्रांतों में मुसलमानों के लिये सीटें आरक्षित किये जाने के प्रस्ताव का तीव्र विरोध किया। मह्रासभा का मानना था कि इस व्यवस्था से इन प्रांतों की व्यवस्थापिकाओं में मुसलमानों का पूर्ण वर्चस्व स्थापित हो जायेगा। उसने सभी के लिये समान व्यवस्था किये जाने की मांग भी की। किंतु हिन्दू मह्रासभा के इस रवैये से यह मुद्दा अत्यंत जटिल हो गया। दूसरी ओर मुस्लिम लीग, प्रांतीय तथा मुस्लिम बहुल प्रांतों में मुसलमानों के लिये सीटों के आरक्षण के मुद्दे पर अड़ी हुई थी। इस प्रकार दोनों पक्षों के अड़ियल रवैये के कारण मोतीलाल नेहरू तथा रिपोर्ट से जुड़े अन्य नेता असमंजस में पड़ गये। उन्होंने महसूस किया कि यदि मुस्लिम साम्प्रदायवादियों की मांगे मान ली गयीं तो हिन्दू साम्प्रदायवादी अपना समर्थन वापस ले लेंगे तथा यदि हिन्दुओं की मांगे मान ली गयीं तो मुसलमान इस प्रस्ताव से अपने को पृथक कर लेंगे।
    बाद में नेहरू रिपोर्ट में एक समझौतावादी रास्ता अखितयार कर निम्न प्रावधान किये गये-

  • सीटें उन्हीं स्थानों पर आरक्षित की जायेंगी जहां वे अल्पमत में है।
  • डोमिनियन स्टेट्स की प्राप्ति के बाद ही सिंध को बम्बई से पृथक किया जायेगा।
  • एक सर्वसम्मत राजनीतिक प्रस्ताव तैयार किया जायेगा।

जिन्ना की मांगे

    नेहरु रिपोर्ट में जिन्ना द्वारा प्रस्तुत संशोधन प्रस्ताव
    दिसम्बर 1928 में नेहरू रिपोर्ट की समीक्षा के लिये एक सर्वदलीय सम्मेलन का आयोजन कलकत्ता में किया गया। इस सम्मेलन में मुस्लिम लीग की ओर से मुहम्मद अली जिन्ना ने रिपोर्ट के संबंध में तीन संशोधन प्रस्ताव प्रस्तुत किये

  • केंद्रीय विधान मंडल में एक-तिहाई स्थान मुसलमानों के लिये आरक्षित किये जायें।
  • वयस्क मताधिकार की व्यवस्था होने तक पंजाब एवं बंगाल के विधानमंडलों में जनसंख्या के अनुपात में मुसलमानों के लिये सीटें आरक्षित की जायें।
  • प्रांतों के लिये अवशिष्ट शक्तियों की व्यवस्था की जाये।
  • मतदान होने पर सम्मेलन में जिन्ना के ये प्रस्ताव ठुकरा दिये गय। परिणामस्वरूप मुस्लिम लीग सर्वदलीय सम्मेलन में अलग हो गई तथा जिन्ना, मुहम्मद शफी एवं आगा खां के धड़े से मिल गये। इसके पश्चात मार्च 1929 में जिन्ना ने अलग से चौदह सूत्रीय मांगें पेश कीं, जिसमें मूलतः नेहरु रिपोर्ट के बारे में उन्होंने अपनी आपत्तियां दुहरायीं।


जिन्ना की चौहद सूत्रीय मांगे-

    1. संविधान का भावी स्वरूप संघीय हो तथा प्रांतों की अवशिष्ट शक्तियां प्रदान की जायें।
    2. देश के सभी विधानमण्डलों तथा सभी प्रांतों की अन्य निर्वाचित संस्थाओं में अल्पसंख्यकों को पर्याप्त एवं प्रभावी नियंत्रण दिया जाये।
    3. सभी प्रांतों को समान स्वायत्तता प्रदान की जाये।
    4. साम्प्रदायिक समूहों का निर्वाचन, पृथक निर्वाचन पद्धति से किया जाये।
    5. केंद्रीय विधानमंडल में मुसलमानों के लिये एक-तिहाई स्थान आरक्षित किये जाय।
    6. सभी सम्प्रदायों को धर्म, पूजा, उपासना, विश्वास, प्रचार एवं शिक्षा की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की जाये।
    7. भविष्य में किसी प्रदेश के गठन या विभाजन में बंगाल, पंजाब एवं उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत की अक्षुणता का पूर्ण ध्यान रखा जाये।
    8. सिन्ध को बम्बई से पृथक कर नया प्रांत बनाया जाये।
    9. किसी निर्वाचित निकाय या विधानमंडल में किसी सम्प्रदाय से संबंधित कोई विधेयक तभी पारित किया जाए, जब उस संप्रदाय के तिन-चौथाई सदस्य उसका समर्थन करें।
    10. सभी सरकारी सेवाओं में योग्यता के आधार पर मुसलमानों को पर्याप्त अवसर दिया जाये।
    11. अन्य प्रांतों की तरह बलूचिस्तान एवं उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत में भी सुधार कार्यक्रम प्रारंभ किये जायें।
    12. सभी प्रांतीय विधानमण्डलों में एक-तिहाई स्थान मुसलमानों के लिये आरक्षित किये जायें।
    13. संविधान में मुस्लिम धर्म, संस्कृति, भाषा, वैयक्तिक विधि तथा मुस्लिम धार्मिक संस्थाओं के संरक्षण एवं अनुदान के लिए आवश्यक प्रावधान किए जाएं।
    14. केंद्रीय विधानमण्डल द्वारा भारतीय संघ के सभी राज्यों के सहमति के बिना कोई संवैधानिक संशोधन न किया जाये।

नेहरू रिपोर्ट की संस्तुतियों से न केवल हिन्दू मह्रासभा, लीग एवं सिख समुदाय के लोग अप्रसन्न थे बल्कि जवाहरलाल नेहरू एवं सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाला कांग्रेस का युवा वर्ग भी इससे खिन्न था। कांग्रेस के युवा वर्ग का मानना था कि रिपोर्ट में डोमिनियम स्टेट्स की मांग स्वतंत्रता प्राप्ति की दिशा में एक नकारात्मक कदम है। इसीलिये सर्वदलीय सम्मेलन में इन्होंने रिपोर्ट के इस प्रावधान पर तीव्र आपत्ति जताई। जवाहरलाल नेहरू एवं सुभाष चंद बोस ने कांग्रेस के इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया तथा संयुक्त रूप से ‘भारतीय स्वतंत्रता लीग’ का गठन कर लिया।

Previous Year Questions —

1.साइमन कमीशन के आने के विरुद्ध भारतीय जन आंदोलन क्यों हुआ ?

    (a) भारतीय 1919 के अधिनियम की कार्यवाही का पुनरीक्षण कभी नही चाहते थे
    (b)साइमन कमीशन ने प्रान्तों में द्विशासन की समाप्ति की संस्तुति की थी
    (c) साइमन कमीशन में कोई भी भारतीय सदस्य नही था
    (d)साइमन कमीशन ने देश के विभाजन का सुझाव दिया था

2.भारतीयों ने साइमन कमीशन का बहिष्कार किया था क्योंकि –

    (a)इसे भारत विभाजन हेतु बनाया गया था
    (b)इसमें लेबर पार्टी का कोई प्रतिनिधि नही था
    (c)इसका कोई सदस्य भारतीय नही था
    (d) जनरल डायर इसके अध्यक्ष थे

3.साइमन कमीशन के सिफारिशों के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन सा एक कथन सत्य है ?

    (a)इसने प्रान्तों में द्वैध शासन को उत्तरदायी शासन द्वारा प्रतिस्थापित किया
    (b)इसने गृह विभाग के अधीन अंतर प्रांतीय परिषद् स्थापित करने का सुझाव दिया
    (c)इसने केंद्र में द्विसदन विधायिका के उन्मूलन का सुझाव दिया
    (d)इसने भारतीय पुलिस सेवा इस प्रावधान के साथ सृजित करने की संस्तुति की , कि ब्रिटिश भर्ती का , भारतीय भर्ती कि तुलना में वेतन व भत्ता अधिक होगा .

4.भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के कल के सन्दर्भ में नेहरू रिपोर्ट में निम्नलिखित में से किसकी / किस किस की अनुशंसा की गई थी ?

    1 भारत के लिए पूर्ण स्वतंत्रता
    2 अल्पसंख्यकों हेतु आरक्षित स्थानों के संयुक्त निर्वाचन – क्षेत्र
    3 संविधान में भारतीयों के लिए मौलिक अधिकारों का प्रावधान
    निम्नलिखित कूटों के आधार पर सही उत्तर चुनिए
    (a) केवल 1 (b) केवल 2 और 3
    (c) केवल 1 और 3 (d) 1 ,2 और 3

5.कांग्रेस दल की उग्र शाखा ने ,जिसके एक प्रमुख नेता जवाहरलाल नेहरू थे ,’इंडिपेंडेंस फॉर इंडिया लीग’ की स्थापना की | वह लीग किसके विरोध में स्थापित हुई थी ?

    (a) गांधी – इरविन समझौता (b)होमरूल आंदोलन
    (c) नेहरू रिपोर्ट (d) मांटफोर्ड सुधार

स्रोत – आधुनिक भारत का इतिहास द्वारा राजीव अहीर



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