कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन

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कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन

कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन

  • 1928 में कांग्रेस का अधिवेशन मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में कलकत्ता में हुआ।
  • इस अधिवेशन में नेहरु रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया गया लेकिन कांग्रेस के युवा नेतृत्व, मुख्यतः जवाहरलाल नेहरु, सुभाष चन्द्र बोस एवं सत्यमूर्ति ने डोमिनियन स्टेट्स (औपनिवेशिक स्वराज्य) को कांग्रेस द्वारा अपना मुख्य लक्ष्य घोषित किये जाने पर गहरा असंतोष व्यक्त किया। इसके स्थान पर उन्होंने मांग की कि ‘पूर्ण स्वराज्य’ या ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ को कांग्रेस अपना लक्ष्य घोषित करें।
  • इस अवसर पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जैसे- महात्मा गांधी तथा मोतीलाल नेहरू का मत था कि डोमीनियन स्टेट्स की मांग को इतनी जल्दबाजी में अस्वीकार नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि बड़ी मुश्किल से इस पर आम सहमति बन सकी है। उन्होंने सुझाव दिया कि डोमिनियन स्टेट्स की मांग को मानने के लिये सरकार को दो वर्ष की मोहलत दी जानी चाहिए। बाद में युवा नेताओं के दबाव के कारण मोहलत की अवधि दो वर्ष से घटाकर एक वर्ष कर दी गयी।
  • इस अवसर पर कांग्रेस ने यह प्रतिबद्धता जाहिर की कि डोमिनियन स्टेट्स पर आधारित संविधान को सरकार ने यदि एक वर्ष के अंदर पेश नहीं किया तो कांग्रेस न केवल ‘पूर्ण स्वराज्य’ को अपना लक्ष्य घोषित करेगी बल्कि इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु वह सविनय अवज्ञा आंदोलन भी प्रारंभ करेगी।

वर्ष 1929 की राजनीतिक घटनायें

  • जनता को सीधे राजनीतिक संघर्ष के लिये तैयार करने हेतु वर्ष 1929 में गांधीजी ने पूरे देश का सघन दौरा किया। विभिन्न स्थानों पर उन्होंने सभाओं को संबोधित किया तथा युवाओं से नये राजनीतिक संघर्ष हेतु तैयार रहने का आग्रह किया। 1929 की यात्राओं से पहले जहां गांधीजी का मुख्य जोर रचनात्मक कार्यों पर होता था, उसकी जगह पर अब उन्होंने जनता को सीधी राजनीतिक कार्रवाई के लिये तैयार करना प्रारंभ कर दिया।
  • जनता द्वारा बहिष्कार का आक्रामक कार्यक्रम अपनाने तथा विदेशी कपड़ों की सार्वजानिक होली जलाने के लिए कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति ने ‘विदेशी कपड़ा बहिष्कार समिति’ का गठन किया।
  • गांधीजी ने इस अभियान को पूर्ण समर्थन प्रदान कर लोगों को सक्रियता से भाग लेने के लिये प्रोत्साहित किया। लेकिन मार्च 1929 में कलकत्ता में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उनकी गिरफ्तारी से पूरे देश में उत्तेजना फैल गयी तथा लोगों ने सरेआम विदेशी वस्त्रों की होली जलाई।
  • वर्ष 1929 की ही कुछ अन्य घटनाओं से स्थिति और विस्फोटक हो गयी तथा पूरे राष्ट्र के लोगों में अंग्रेज विरोधी भावनायें जागृत हो उठीं। इन घटनाओं में-मेरठ षड़यंत्र केस (मार्च माह), भगत सिंह एवं बटुकेश्वर दत्त द्वारा केंद्रीय विधान सभा में बम विस्फोट (अप्रैल माह) तथा मई माह में इंग्लैण्ड में रैमजे मैक्डोनाल्ड की लेबर पार्टी का सत्ता में आना प्रमुख थीं।

लार्ड इरविन की घोषणा 31 अक्टूबर 1929

    • “महारानी की ओर से मुझे स्पष्ट रूप से यह कहने का आदेश हुआ है कि सरकार के निर्णय में 1917 की घोषणा में यह बात निहित है कि भारत के विकास के स्वाभाविक मुद्दे उसमें दिये गये हैं, उनमें डोमीनियन स्टेट्स (अधिशासित स्वराज्य) की प्राप्ति जुड़ी हुई है’।

 

    लार्ड इरविन ने यह भी वायदा किया कि जैसे ही साइमन कमीशन अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर देगा, एक गोलमेज सम्मेलन बुलाया जायेगा।

दिल्ली घोषणा-पत्र

    • 2 नवंबर 1929 को देश के प्रमुख नेताओं का एक सम्मलेन बुलाया गया और एक घोषणा पत्र जारी किया गया, जिसे दिल्ली घोषणा-पत्र के नाम से जाना जाता है। इसमें मांग रखी गयी कि-

    • यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए गोलमेज सम्मेलन का उद्देश्य इस बात पर विचार-विमर्श करना नहीं होगा कि किस समय डोमिनयन स्टेट्स दिया जाये बल्कि इस बैठक में इसे लागू करने की योजना बनायी जानी चाहिए।
    • इस बैठक में कांग्रेस का बहुमत में प्रतिनिधित्व होना चाहिए।
    • राजनीतिक अपराधियों को क्षमादान दिया जाये तथा सहमति की एक सामान्य नीति तय की जाये।

23 दिसम्बर 1929 को वायसराय इरविन ने इन मांगों को अस्वीकार कर दिया। इस प्रकार भिड़त का दौर प्रारंभ होने की तैयारी हो गयी।

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